रविवारीय स्तम्भ

पुस्तकायन: मनुष्यता का राग

दुर्गा प्रसाद गुप्त जनसत्ता 9 नवंबर, 2014: मंगलेश डबराल का कविता संग्रह नए युग में शत्रु एक दशक से भी अधिक समय बाद आया...

पुस्तकायन: खरी खरी आपबीती

आदर्श सक्सेना जनसत्ता 9 नवंबर, 2014: आत्मकथा लेखन की अनेक चुनौतियां हैं। उन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रख कर हरदर्शन सहगल ने अपनी आत्मकथा...

निनाद: पाकिस्तान के विरोधाभास

कुलदीप कुमार   जनसत्ता 19 अक्तूबर, 2014: जम्मू-कश्मीर में आई भीषण प्राकृतिक आपदा के बावजूद पाकिस्तानी सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर...

अप्रासंगिक: आज्ञाकारिता की संस्कृति

जनसत्ता 19 अक्तूबर, 2014: कुछ वक्त पहले देश के एक बड़े शिक्षा संस्थान की विद्वत परिषद ने कोई एक साल पहले पाठ्यक्रम में की...

प्रसंग: दूर का ढोल

शंभुनाथ जनसत्ता 19 अक्तूबर, 2014: रोलां बार्थ ने पूंजी-आधारित व्यवस्था के बारे में दशकों पहले कहा था कि यह अपनी सुरक्षा के लिए ‘संकेतों...

मतांतर: नाहक आरोप

रवींद्र त्रिपाठी जनसत्ता 19 अक्तूबर, 2014: विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘हैदर’, सिद्धार्थ आनंद की ‘बैंग बैंग’ के साथ ही रिलीज हुई। व्यवसाय के नजरिए...

नोबेल: गांधी के रास्ते चलते हुए

गिरिराज किशोर जनसत्ता 19 अक्तूबर, 2014: नोबेल पुरस्कार पंचायत ने शांति के खाते में पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई और भारत के समाजसेवी कैलाश सत्यार्थी...

कभी-कभार: लोकतंत्र में विश्वास

अशोक वाजपेयी जनसत्ता 19 अक्तूबर, 2014: पिछले दिनों ‘लोकतंत्र और साहित्य’ पर एक बहस के दौरान एक क्षुब्ध युवती ने उठ कर यह टिप्पणी...

पुस्तकायन: समय और समाज की परतें

प्रांजल धर जनसत्ता 19 अक्तूबर, 2014: कुसुम खेमानी का उपन्यास लावण्यदेवी सिर्फ अपने समय और समाज की परिक्रमा नहीं करता, बल्कि इसमें अपने इतिहासबोध...

पुस्तकायन: विसंगतियों के बिंब

उषा बंदे जनसत्ता 19 अक्तूबर, 2014: राजेंद्र उपाध्याय के संग्रह पत्तियों की अज्ञात स्वरलिपि में की कविताएं मानवीय प्रतिबद्धता, प्रकृति और संस्कृति के प्रति...

सिनेमा: नैतिक रूप से दुविधाग्रस्त

अपूर्वानंद जनसत्ता 12 अक्तूबर, 2014: ‘एकतरफा, स्त्री विरोधी और अतिसरलीकृत सपाट दिमागी… रूपात्मक और सौंदर्यात्मक दृष्टि से भी ‘हैदर’ एक लचर और बोरिंग मसाला...

सिनेमा: घाटी की हकीकत

पुण्य प्रसून वाजपेयी जनसत्ता 12 अक्तूबर, 2014: दिन में पहरा। रात में ताले। हाथों में पहचान-पत्र। मौत का खौफ। झेलम का प्रेम। डल झील...

दक्षिणावर्त: छोटी छोटी खुशियां

तरुण विजय जनसत्ता 12 अक्तूबर, 2014: जिंदगी सिर्फ उन बड़े कामों के लिए बीत जाती है, जिन्हें हम जीने के लिए जरूरी मानते हैं।...

नोबेल पुरस्कार: नोबेल प्रतिभाओं के घोर अभाव में

राजकिशोर जनसत्ता 12 अक्तूबर, 2014: नोबेल शांति पुरस्कार कई बार अपने को लज्जित कर चुका है। बहुत संक्षेप में कहा जाए तो उसने महात्मा...

दस्तावेज: संघ पर जेपी की राय

जनसत्ता 12 अक्तूबर, 2014: प्रश्न: आपके आंदोलन में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और भारतीय मजदूर संघ ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जनसंघ के साथ...

कभी-कभार: आवाज और खामोशी

अशोक वाजपेयी जनसत्ता 12 अक्तूबर, 2014: हममें से अधिकतर लोग यह नहीं समझ पाते कि कब आवाज उठानी चाहिए और कब खामोश रहना चाहिए।...

पुस्तकायन: मनुष्य होने का अधिकार

कुमार प्रशांत जनसत्ता 12 अक्तूबर, 2014: सत्य नारायण साबत की किताब भारत में मानवाधिकार सब कुछ लिखती है, लेकिन दो सौ पृष्ठों की किताब...

पुस्तकायन: आत्मीयता की जमीन

राजेश राव जनसत्ता 12 अक्तूबर, 2014: विवेक मिश्र के कहानी संग्रह पार उतरना धीरे से में आत्मिक धरातल को समझने का भाव प्रबल है।...