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रविवारीय स्तम्भ

पुस्तकायन : हूक और कूक

कृष्णा शर्मा शमशेर बहादुर सिंह से प्रेरणा लेकर काव्य-लेखन में पदार्पण करने वाली शोभा सिंह की उनचास कविताओं का संग्रह अर्द्ध विधवा जहां नई...

पुस्तकायन : आदिवासी का दर्द

केदार प्रसाद मीणा रणेंद्र का उपन्यास गायब होता देश उनके पहले उपन्यास ‘ग्लोबल गांव के देवता’ की तरह विस्थापित होते, टूटते-बिखरते और लगातार गायब...

स्मृतिशेष : जिनसे सबने कुछ पाया

प्रयाग शुक्ल बहुतों के लिए अब कोलकाता वही नहीं रह गया (या नहीं रह जाएगा) जो अशोक सेकसरिया के रहते हुए उनके लिए था...

समांतर संसार : यातना के दुश्चक्र में

सय्यद मुबीन ज़ेहरा अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो पढ़ी-लिखी और सभ्य समाज में रहने वाली महिलाओं की हालत देख कर लगता है कि इनकी...

दक्षिणावर्त : जिद और जड़ता

तरुण विजय चिढ़ है। झुंझलाहट है। कुंठा में डूबा गुस्सा है। गुस्सा भी ऐसा करना है कि लगे वे सक्रिय हैं। इसलिए छत्तीसगढ़ में...

कभी-कभार : अशोकांत

अशोक वाजपेयी अशोक सेकसरिया का अकस्मात देहावसान स्तब्धकारी है; उनके गिरने और पैर की सर्जरी जरूरी होने की खबर थी और यह भी कि...

सूचना तकनीक : बहुभाषिक बनाम डिजिटल भारत

अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी आज बाजार ने हमारी चेतना में इस बोध को लगभग स्थापित कर दिया है कि किसी उत्पाद की विकास प्रक्रिया से...

पुस्तकायन : स्त्री को रचते हुए

कौमुदिनी मकवाड़ा युवा कवयित्री रेनू शुक्ला का कविता संकलन चुरइल कथा अनेक स्त्री-प्रश्नों से टकराने का मौका देता है। कहा जाता है कि स्त्री...

पुस्तकायन : महाभारत के अनछुए पहलू

रमेश दवे प्रभाकर श्रोत्रिय अपनी हर रचना को उसके अंतिम रूप तक पहुंचाने के पहले इतना मांजते हैं कि रचना निखर उठती है, चाहे...

मतांतर : हिंदी का हीनताबोध

के विक्रम राव विष्णु नागर ने (24 नवंबर) अंगरेजी भाषाई अखबारों की उचित ही भर्त्सना की है। उनकी समाचार-निरपेक्षता, चलताऊ सोच और सरोकारहीन मानसिकता...

संस्कृति : परिधान और पहरा

सवाईसिंह शेखावत इधर स्त्रियों के साथ कुछ भी गलत घटने पर उनके कपड़े-लत्तों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराने और दूसरी ओर ऐसा मानने वालों...

अप्रासंगिक : संकीर्ण भारतीयता

अपूर्वानंद तिरंगी टोपी पहने याकूब नमाज पढ़ रहा है। सफेद और काली टोपी पहने एक दूसरा ‘बदमाश’ मुसलमान उसे पैसे के बदले बम-विस्फोट करने...

निनाद : अंदर की असमानता

कुलदीप कुमार जाति-व्यवस्था आज भी कितनी मजबूत है और आजादी मिलने के सड़सठ साल बाद भी देश में छुआछूत का अभिशाप किस हद तक...

कभी-कभार : पटना में भारतीय कविता

अशोक वाजपेयी दशकों पहले हमने भारत भवन में कविभारती नाम से एक वार्षिक आयोजन शुरू किया था, जिसमें अनेक भाषाओं के कवि शिरकत करते...

प्रसंग : मजहबी दीवारें

शंभुनाथ फ्रांसीसी यात्री बर्नियर 1656 में भारत आया था। उसने पुरी की उस जमाने की रथयात्रा का वर्णन करते हुए लिखा है, ‘जिस समय...

पुस्तकायन : राजकमल का संसार

ओमप्रकाश झा देवशंकर नवीन की नई पुस्तक राजकमल चौधरी- जीवन और सृजन राजकमल चौधरी का समग्र पता देती है। राजकमल चौधरी हाल के वर्षों...

पुस्तकायन : मिथक में वर्तमान के रंग

रीतारानी पालीवाल सुप्रसिद्ध कवि, आलोचक, नाटककार नंदकिशोर आचार्य के संपूर्ण नाटकों का संग्रह है रंग-यात्रा। लगभग तीन दशक की इस रंग-यात्रा में उन्होंने इतिहास,...

प्रसंग : भाषा के पहरुए

 हरजेंद्र चौधरी मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने केंद्रीय विद्यालयों में तृतीय भाषा के रूप में जर्मन की जगह संस्कृत पढ़ाने का निर्णय किया तो...