ताज़ा खबर
 

रविवारीय स्तम्भ

दक्षिणावर्त : नाहक वितंडा

तरुण विजय जिनका देश, समाज, उसके चिंतन और गरीबी में पल रहे करोड़ों भारतीयों की हालत सुधारने से कोई सरोकार नहीं, वे अचानक बदजुबानी...

कभी-कभार : संगीत और चित्रबद्ध कविता

अशोक वाजपेयी मुंबई की एशियाटिक सोसायटी के दरबार हॉल में जब दो खंडों में प्रकाशित पुस्तक ‘कालजयी कुमार गंधर्व’ (राजहंस और वाणी प्रकाशन) का...

साहित्य : शब्दजीवियों के शब्दाडंबर

रमेश दवे प्राय: हर कलाकार अपने अंदर प्रतियोगिता जीता है। यह प्रतियोगिता वह समकालीनों से तो करता ही है, अतीत और संभावनाओं से भरे...

पुस्तकायन : आकाश नापती स्त्री

अनिल पुष्कर उर्मिला जैन के संग्रह गुनगुनी धूप का एक कतरा की कविताएं स्त्री वेदना को स्वर देती हैं। यहां स्त्री दुनिया के रचे...

पुस्तकायन : मध्यवर्ग का मानस

अनंत विजय उन्नीस सौ सत्तावन में नई कहानी पर टिप्पणी करते हुए हरिशंकर परसाई ने कहा था- ‘जहां तक कहानी के शिल्प और तंत्र...

अप्रासंगिक : संकीर्णता की सांकल

अपूर्वानंद हिंदुओं को आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है। अपने भीतर झांकने की, खुद को टटोलने की। यह बात अधिकतर हिंदुओं को अटपटी जान पड़ती है,...

निनाद : शब्द-छल के सहारे

कुलदीप कुमार जिन लोगों को यह मुगालता था कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े अनेक संगठन...

मतांतर : पराजित नहीं हुआ समाजवाद

असीम सत्यदेव अरुण माहेश्वरी के लेख ‘अवाम से क्यों दूर हुआ वाम’ (26 नवंबर) में रोग से ज्यादा दवा की आलोचना कर शायद मौजूदा...

मतांतर : प्रकाशक खुद को बदलें

महेंद्र राजा जैन शंकर शरण की टिप्पणी ‘पाठक से दूरी का सच’ (26 अक्तूबर) पुस्तकें ‘बिकने’ और ‘न बिकने’ की कड़वी सच्चाई बयान करती...

कभी-कभार : भाषा से सुलूक

अशोक वाजपेयी नया निजाम जब से आया है, तब से किसी न किसी रूप में भाषा का मुद्दा उठता रहता है। उस पर ऐसे...

सिनेमा : राजनीतिक फिल्मों की विदा वेला

प्रमोद मीणा भारत में राजनीतिक फिल्मों के निर्माण और वैकल्पिक सिनेमा का नाभिनाल संबंध रहा है। इसलिए अगर वर्तमान परिदृश्य में राजनीतिक सिनेमा का...

पुस्तकायन : हूक और कूक

कृष्णा शर्मा शमशेर बहादुर सिंह से प्रेरणा लेकर काव्य-लेखन में पदार्पण करने वाली शोभा सिंह की उनचास कविताओं का संग्रह अर्द्ध विधवा जहां नई...

पुस्तकायन : आदिवासी का दर्द

केदार प्रसाद मीणा रणेंद्र का उपन्यास गायब होता देश उनके पहले उपन्यास ‘ग्लोबल गांव के देवता’ की तरह विस्थापित होते, टूटते-बिखरते और लगातार गायब...

स्मृतिशेष : जिनसे सबने कुछ पाया

प्रयाग शुक्ल बहुतों के लिए अब कोलकाता वही नहीं रह गया (या नहीं रह जाएगा) जो अशोक सेकसरिया के रहते हुए उनके लिए था...

समांतर संसार : यातना के दुश्चक्र में

सय्यद मुबीन ज़ेहरा अपने आसपास नजर दौड़ाएं तो पढ़ी-लिखी और सभ्य समाज में रहने वाली महिलाओं की हालत देख कर लगता है कि इनकी...

दक्षिणावर्त : जिद और जड़ता

तरुण विजय चिढ़ है। झुंझलाहट है। कुंठा में डूबा गुस्सा है। गुस्सा भी ऐसा करना है कि लगे वे सक्रिय हैं। इसलिए छत्तीसगढ़ में...

कभी-कभार : अशोकांत

अशोक वाजपेयी अशोक सेकसरिया का अकस्मात देहावसान स्तब्धकारी है; उनके गिरने और पैर की सर्जरी जरूरी होने की खबर थी और यह भी कि...

सूचना तकनीक : बहुभाषिक बनाम डिजिटल भारत

अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी आज बाजार ने हमारी चेतना में इस बोध को लगभग स्थापित कर दिया है कि किसी उत्पाद की विकास प्रक्रिया से...