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रविवारीय स्तम्भ

कानून: मृत्युदंड बनाम जीवन का अधिकार

अरविंद कुमार पिछले दिनों मृत्युदंड से जुड़े तीन मामलों पर व्यापक चर्चा चली। पहला मामला है, ईरान की छब्बीस वर्षीय रेहना जब्बारी का, जिसे...

कभी-कभार: अनुपस्थित श्रोता

अशोक वाजपेयी दिल्ली में अंगरेजी का बोलबाला है यह तो जगजाहिर है। अलबत्ता यहां के चिकने-चुपड़े लोग जब-तब सूफियाना संगीत आदि में दिलचस्पी लेते...

पुस्तकायन: सन्नाटे को भेदते हुए

ज्योति चावला ‘शब्द वहां ज्यादा हैं जहां उनकी जरूरत नहीं है/ और जहां होनी चाहिए थी भाषा की मजबूत उपस्थिति/ वहां दूर तक फैली...

पुस्तकायन: मुसलिम समाज का सच

सुनील यादव एम फीरोज खान की पुस्तक मुसलिम विमर्श: साहित्य के आईने में वैज्ञानिक तरीके से मुसलिम समाज की सरंचना, उसके रीति-रिवाज और मान्यताओं...

भाषा: जय हिंद् (ई)

लक्ष्मीधर मालवीय जनसत्ता 9 नवंबर, 2014: अकेली हिंदी को लेकर बहस हो कि हिंदी बनाम अंगरेजी पर, सारी बहस धूल की रस्सी बटने के...

दक्षिणावर्त: एक कंधा भीगता सा

तरुण विजय जनसत्ता 9 नवंबर, 2014: सिर्फ शोर और अपने कर्तृत्व का अंधकार। कान बंद करें या आंखें, फिर भी कोलाहल भीतर तक समा...

समांतर संसार: भूख बनाम भोजन की बर्बादी

सय्यद मुबीन ज़ेहरा जनसत्ता 9 नवंबर, 2014: दुनिया में एक तिहाई खाना बर्बाद हो जाता है, जबकि एक अरब से अधिक लोग भूखे रहते...

प्रसंग: सुनने की सिकुड़ती जगहें

विवेक कुमार मिश्र जनसत्ता 9 नवंबर, 2014: आधुनिकता अपने तकनीकी संजाल के साथ जिस दौर से गुजर रही है, उसमें हम पूरी दुनिया की...

कभी-कभार: कालजयी की कालातीत उपस्थिति

अशोक वाजपेयी जनसत्ता 9 नवंबर, 2014: यह तो हम बरसों से जानते रहे हैं कि जिस एक शहर में कुमार गंधर्व की बड़ी प्रतिष्ठा...

पुस्तकायन: मनुष्यता का राग

दुर्गा प्रसाद गुप्त जनसत्ता 9 नवंबर, 2014: मंगलेश डबराल का कविता संग्रह नए युग में शत्रु एक दशक से भी अधिक समय बाद आया...

पुस्तकायन: खरी खरी आपबीती

आदर्श सक्सेना जनसत्ता 9 नवंबर, 2014: आत्मकथा लेखन की अनेक चुनौतियां हैं। उन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रख कर हरदर्शन सहगल ने अपनी आत्मकथा...

निनाद: पाकिस्तान के विरोधाभास

कुलदीप कुमार   जनसत्ता 19 अक्तूबर, 2014: जम्मू-कश्मीर में आई भीषण प्राकृतिक आपदा के बावजूद पाकिस्तानी सेना ने अंतरराष्ट्रीय सीमा और नियंत्रण रेखा पर...

अप्रासंगिक: आज्ञाकारिता की संस्कृति

जनसत्ता 19 अक्तूबर, 2014: कुछ वक्त पहले देश के एक बड़े शिक्षा संस्थान की विद्वत परिषद ने कोई एक साल पहले पाठ्यक्रम में की...

प्रसंग: दूर का ढोल

शंभुनाथ जनसत्ता 19 अक्तूबर, 2014: रोलां बार्थ ने पूंजी-आधारित व्यवस्था के बारे में दशकों पहले कहा था कि यह अपनी सुरक्षा के लिए ‘संकेतों...

मतांतर: नाहक आरोप

रवींद्र त्रिपाठी जनसत्ता 19 अक्तूबर, 2014: विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘हैदर’, सिद्धार्थ आनंद की ‘बैंग बैंग’ के साथ ही रिलीज हुई। व्यवसाय के नजरिए...

नोबेल: गांधी के रास्ते चलते हुए

गिरिराज किशोर जनसत्ता 19 अक्तूबर, 2014: नोबेल पुरस्कार पंचायत ने शांति के खाते में पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई और भारत के समाजसेवी कैलाश सत्यार्थी...

कभी-कभार: लोकतंत्र में विश्वास

अशोक वाजपेयी जनसत्ता 19 अक्तूबर, 2014: पिछले दिनों ‘लोकतंत्र और साहित्य’ पर एक बहस के दौरान एक क्षुब्ध युवती ने उठ कर यह टिप्पणी...

पुस्तकायन: समय और समाज की परतें

प्रांजल धर जनसत्ता 19 अक्तूबर, 2014: कुसुम खेमानी का उपन्यास लावण्यदेवी सिर्फ अपने समय और समाज की परिक्रमा नहीं करता, बल्कि इसमें अपने इतिहासबोध...