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रविवारीय स्तम्भ

प्रतिक्रिया : लेखक एक दरख्त है

गिरिराज किशोर राजकुमार कुंभज का लेख ‘क्या निराला हिंदूवादी थे’ (7 जून) पढ़ कर लगा कि हिंदुत्व की राजनीति द्वारा साहित्य को आत्मसात करने...

पुस्तकायन : आलोचकीय उड़ान की अकुलाहट

सुनील कुमार पाठक राजीव रंजन गिरि की पुस्तक अथ- साहित्य: पाठ और प्रसंग के लेखों से उनके अध्ययन की गहराई, वैचारिक प्रौढ़ता; समय, समाज...

पुस्तकायन : पत्रकारिता का विद्यार्थी युग

उर्मिलेश सुपरिचित लेखक, कवि और काव्यानुवादक सुरेश सलिल ने लगभग बीस सालों की कड़ी मेहनत से विचारक और पत्रकार शहीद गणेशशंकर विद्यार्थी के जीवन...

परिदृश्य : समाज विज्ञान का बिजूका

शंभुनाथ इधर सबाल्टर्न अध्ययन से प्रेरित लेखन को लोकप्रिय बनाने के प्रयास हो रहे हैं, जबकि यह अध्ययन शृंखला 2010 में बंद हो गई...

कभी-कभार : मुक्तिबोध के उजाले में

अशोक वाजपेयी हालांकि मुक्तिबोध से अधिक शायद ही किसी और ने हमारे समय के अंधेरे को लिखा हो, उनसे जिन बहुतों को साहित्य और...

भाषा : भाषाओं से खेलती सत्ताएं

अरिमर्दन कुमार त्रिपाठी सत्ता की अपनी भाषा होती है, जो ध्वनित हुए बिना भी अधिक प्रभावशाली होती है। कभी-कभी उसका अर्थ तुरंत स्पष्ट हो...

मतांतर : शिक्षा के तकाजे

सविता झा खान अपूर्वानंद का लेख ‘खामोश सुबकियां’ (17 मई) पढ़ कर ऐसा क्यों लगा कि अब भी गरीबों के संदर्भ में तमाम उपक्रम...

प्रसंग : क्या निराला हिंदूवादी थे

राजकुमार कुंभज यह अनायास नहीं है कि प्रखर छायावादी और मूलत: प्रगतिशील कवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ को अब से ‘हिंदूवादी कवि’ माना जाएगा। अब...

समांतर संसार : भूखे बनाम अघाए

सय्यद मुबीन ज़ेहरा हम जिस मैगी के दीवाने थे, उसके बारे में अब पता चला है कि वह इस लायक थी ही नहीं कि...

दक्षिणावर्त : अखरोट का पेड़

तरुण विजय श्रीनगर के शेखपुरा इलाके में बने फ्लैट एक भुतहा अतीत का डर ओढ़े हुए, सहमे-सहमे से खड़े हैं। हमने सोचा था श्रीनगर...

अप्रासंगिक : विवादास्पद का पक्ष

अपूर्वानंद आइआइटी-मद्रास में आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल (एपीसीएस) की मान्यता रद्द करने के प्रशासन के निर्णय पर बहस हो रही है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय...

निनाद : फासिज्म की आहट

कुलदीप कुमार फासिज्म एक सर्वसत्तावादी राजनीतिक विचार है। फासिस्ट व्यवस्था में सब कुछ एक व्यक्ति, एक विचारधारा और एक पार्टी द्वारा नियमित और संचालित...

प्रसंग : ढोल और मुसीबतें

क्षमा शर्मा महानगरों, कस्बों, गांवों में चैनलों और कुछ अखबारों के जरिए शोर मचा है कि अच्छे दिन आ गए। सरकार ने एक साल...

प्रसंग : क्या बदला बयालीस सालों में

वीणा भाटिया कुछ दिनों पहले बासठ साल की अरुणा रामचंद्र शानबाग की बयालीस वर्षों तक लगातार कोमा में रहने के बाद मृत्यु हो गई।...

पुस्तकायन : विडंबना की परतें

पल्लव स्वयं प्रकाश ऐसे कथाकार हैं, जो कहानी में कथ्य की संप्रेषणीयता के लिए लगातार प्रयोगशील रहे। प्रगतिशील-जनवादी कथाकारों में इस लिहाज से वे...

पुस्तकायन : रवींद्र प्रणति की सुखद परिणति

रणजीत साहा रवींद्रनाथ ठाकुर की डेढ़ सौवीं जयंती के अवसर पर इंद्रनाथ चौधुरी के प्रधान संपादकत्व में रवींद्रनाथ टैगोर रचनावली नाम से उनकी रचनाओं...

साहित्य : समीक्षा की साख

गोपेश्वर सिंह हिंदी में जिस विधा की सर्वाधिक दुर्गति हुई है, वह है पुस्तक समीक्षा। फिलहाल पुस्तक समीक्षा लिखने-लिखाने का आलम प्राय: जुगाड़ उद्योग-सा...

कभी-कभार : हुआ यह है…

अशोक वाजपेयी हुआ यह है कि अपनी जिंदगी के इस मुकाम पर आकर अपने कुछ विश्वासों पर संदेह होने लगा है। यह तो सही...