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रविवारीय स्तम्भ

मतांतर: उपन्यास की जन्मभूमि

महेंद्र राजा जैन ‘उपन्यास की कला’ पर विचार करते हुए अशोक वाजपेयी ने (कभी-कभार, 22 मार्च) लिखा है कि ‘‘उपन्यास का विधागत विवेक, उसकी...

मतांतर: एकांगी मूल्यांकन

विकास सिंह मौर्य रघु ठाकुर के लेख ‘गांधी निंदा के नए प्रयोग’ (3 अप्रैल) में गांधी को लेकर उनकी जानकारी और विश्लेषण शैली सराहनीय...

परिदृश्य: विस्थापन का विकास

प्रमोद मीणा पर्यावरण एवं वन मंत्रालय पिछले कुछ सालों से विवादों के केंद्र में रहा है। इस पर जहां कुछ उद्योगपतियों और मंत्रियों ने...

कभी-कभार: विलाप समय का

अशोक वाजपेयी   एक आकाशहीन संसार में, जमीन हो जाती है एक रसातल। और कविता समवेदना के उपहारों में से एक। और हवा का...

पुस्तकायन: आलोचना का रचनात्मक पाठ

नंदकिशोर नवल की पुस्तक हिंदी कविता: अभी, बिल्कुल अभी समकालीन हिंदी कविता-आलोचना का नया रचनात्मक पाठ है। रचना के साथ ‘सहयात्री’ बनने का भाव...

पुस्तकायन: रूढ़ छवियों को तोड़ते हुए

माधव हाड़ा की पुस्तक पचरंग चोला पहर सखी री मीरां के जीवन और उनके समकालीन समाज के विषय में अब तक अनुत्तरित प्रश्नों के,...

निनाद : आप और पाप

कुलदीप कुमार क्या ‘आप’ (आम आदमी पार्टी) भी ‘पाप’ (पारंपरिक पार्टी) की राह पर चल पड़ी है? क्या उसमें भी एक नेता का निर्विरोध...

प्रसंग : असहमति से असहज

सुधांशु रंजन असहनशीलता लगातार बढ़ रही है। असहमति के लिए स्थान सिकुड़ता जा रहा है। धर्म के मामले में विरोध तो दूर, असहमति की...

अप्रासंगिक : धर्मनिरपेक्ष जिम्मेदारियां

अपूर्वानंद उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ ने भारत के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू को खत लिख कर गुड फ्राइडे के दिन न्यायाधीशों का...

परिदृश्य : सियासी खोमचे में

कृष्णा सोबती मुसलमीन और मसीही भाइयो! आप लोगों की घर वापसी का वक्त सिर पर आ गया है। आपकी हिफाजत करना हमारा इनसानी फर्ज...

मतांतर : संस्कृति के स्वयंभू सिपाही

प्रताप दीक्षित तरुण विजय की टिप्पणी ‘जनधन, जनमन’ (29 मार्च) में भारत को आस्था का प्रथम बिंदु कहने पर प्रत्यक्ष रूप से किसी को...

मीडिया : अंकुश और आजादी

वीरेंद्र जैन सर्वोच्च न्यायालय के आइटी अधिनियम की धारा 66 ए को निरस्त करने के फैसले पर जो बहस सामने आई, उसमें अभिव्यक्ति को...

समांतर संसार : पुरुष समाज में अकेली स्त्री

सय्यद मुबीन ज़ेहरा पिछले सप्ताह से इस खबर को पढ़ कर बेचैन हूं कि मिस्र में एक महिला को अपना घर चलाने के लिए...

दक्षिणावर्त : जनधन, जनमन

तरुण विजय अगर हम गरीब हमेशा से ही थे तो हमें लूटने और आक्रमण करने क्यों लोग आए? अगर हम अंगरेजों के आने के...

शिक्षा : जड़ता के परिसर

रमेश दवे राजनीतिक दल सत्ताधारी होते ही अधिकार प्रमत्त हो जाते हैं। शिक्षा में, जो संस्कार और विचार की प्रतीक है, अहंकार की गंध...

स्मृतिशेष : तुझे हम वली समझते…

कुलदीप कुमार अगस्त 1973 में मैंने इतिहास में एमए करने के लिए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। सबसे पहले जिनसे भेंट और मित्रता...

निनाद : ‘आप’ और हम

कुलदीप कुमार इतिहास अपने को बार-बार दुहराता है। कब वह प्रहसन होता है और कब त्रासदी, कहना मुश्किल है। लेकिन यह जरूर कहा जा...

अभिमत : आलोचना का विवेक

मणींद्र नाथ ठाकुर गांधी की मूर्ति लंदन में लगी। भारतीयों में बेहद उत्साह था। हम इस खुशी में अभी झूम ही रहे थे कि...