ताज़ा खबर
 

रविवारीय स्तम्भ

दक्षिणावर्त : शहीद की बेटी

तरुण विजय अलका छठी कक्षा में पढ़ती है। अपने पिता की शहादत पर रुलाई को बहुत कड़ाई से थामते हुए वह चिल्ला कर बोली...

समांतर संसार : गुम होती लड़कियां

सय्यद मुबीन ज़ेहरा गणतंत्र दिवस के मौके पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने राजपथ पर भारत की स्त्रीशक्ति को देखा, प्रभावित हुए और सीरीफोर्ट सभागार के...

प्रसंग : वर्चस्व की व्यथा

संजीव चंदन पिछले दिनों आंबेडकर की विरासत पर कब्जे के लिए भारतीय जनता पार्टी कुछ उतावली दिखी। लोकसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी ने...

मतांतर : बंद कपाट

जसविंदर सिंह जो समाज अपने सोच की खिड़कियां बंद कर लेता है, वह न तो स्वस्थ समाज हो सकता है और न ही समय...

निनाद : आस्था और असहमति

कुलदीप कुमार पेरिस में व्यंग्य पत्रिका ‘शार्ली एब्दो’ पर हुए आतंकी हमले के बाद हिंदुत्व की प्रयोगशाला चलाने वालों को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता...

अप्रासंगिक : गांधी का आखिरी विद्रोह

अपूर्वानंद जनवरी में सवाल किया जाना चाहिए कि आखिर हम किस गांधी को याद करना चाहते हैं। या कि उन्हें हम किस तरह याद...

कला : अनादृत का अभिषेक

प्रभु जोशी यह अत्यंत विचारणीय तथ्य है कि भारत के अलावा दुनिया के किसी भी देश में ऐसा दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण नहीं मिलता, जहां अपनी...

शिक्षा : कौशल विकास के निहितार्थ

राजकुमार केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, अब उनकी निगाह में शिक्षा का उद्देश्य आर्थिक और सामाजिक विकास करना है। बारहवीं पंचवर्षीय योजना की...

विवाद : उपयोग या उपभोग

कुमार अंबुज किसी भी समस्या के निदान के लिए समन्वयवादी तरीका एक आसान रास्ता है, पर वह कितना सही है, विचार होना चाहिए। प्राय:...

विवाद : खूब परदा है

विनीत कुमार वीरेंद्र यादव के लेख ‘पार्टनर, तुम्हारी पालिटिक्स क्या है’ (21 दिसंबर) पर बात करने से पहले उन्हें औपचारिक बधाई देना जरूरी है।...

समांतर संसार : कचरा बटोरता बचपन

सय्यद मुबीन ज़ेहरा नए वर्ष के आगमन पर सबने थोड़ा-बहुत जश्न मनाया होगा। उसके बाद घर का कूड़ेदान कुछ अधिक भरा नजर आया होगा।...

दक्षिणावर्त : तिरुवल्लुवर कहना तो सीखो

तरुण विजय सिर्फ मैं श्रेष्ठ और बाकी सब मेरा अनुसरण करें, यह दंभ बहुत घातक होता है। अगर भारत केवल तुलसी और वाल्मीकि ही...

कभी-कभार : वर्षारंभ पर

अशोक वाजपेयी जाहिर है कि ये बातें हाशिये से कही जा रही हैं: लगभग हमेशा की तरह साहित्य और कलाएं हाशिये पर हैं। केंद्र...

प्रसंग : अविचारित कार्रवाई

गोपेश्वर सिंह रमेशचंद्र शाह को साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला तो हिंदी की आभासी दुनिया में हंगामा हो गया। बधाइयां कम मिलीं, लानत-मलामत ज्यादा हुई।...

सरोकार की लय

अजेय कुमार निर्मला गर्ग के संग्रह दिसंबर का महीना मुझे आखिरी नहीं लगता की कविताएं वामपंथी दर्शन से प्रेरित हैं। पुस्तक का समर्पण पृष्ठ...

पुस्तकायन : वैचारिक शून्यता के विरुद्ध

पूनम सिन्हा भगवानदास मोरवाल के नए उपन्यास नरक मसीहा में गैर-सरकारी संगठनों द्वारा समाज के विकास की आड़ में मजबूती से जड़ जमा चुके...

निनाद : सक्रिय संघ और मोदी का मौन

कुलदीप कुमार वर्ष समाप्ति की ओर बढ़ रहा है और देश अजीब किस्म की अफरातफरी की ओर। जिस सुशासन का वादा किया गया था,...

अप्रासंगिक : स्मृति की नैतिकता

अपूर्वानंद ‘क्या भूलूं क्या याद करूं’, यह सिर्फ किसी एक व्यक्ति की आत्मकथात्मक दुविधा नहीं। समाज और राष्ट्र अक्सर इस प्रश्न से जूझते हैं।...