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रविवारीय स्तम्भ

विवाद : संवाद की पगडंडी

अर्चना वर्मा वीरेंद्र यादव ने ‘पार्टनर’ की ‘पालिटिक्स’ पर सवाल उठाते हुए अपनी तरफ से यह तो साफ कर दिया है कि ‘‘इस चर्चा...

विवाद : नकली क्रांति मुद्राओं का अश्लील प्रदर्शन

नरेश सक्सेना रायपुर साहित्य समारोह पर वीरेंद्र यादव की टिप्पणी (जनसत्ता, 21 दिसंबर) सफेद को काला करने और प्रतिष्ठित रचनाकारों सहित अपने प्रगतिशील साथियों...

खुला खिला उर्वर इलाका

दिनेश कुमार हिंदी में उपन्यास ही एक ऐसी विधा है, जिसमें पिछले कुछ सालों से निरंतरता बनी हुई है। कहानी, आलोचना आदि अन्य गद्य...

केंद्र में उपेक्षित अस्मिता

राजेंद्र उपाध्याय यह वर्ष कविता के लिए कई दृष्टियों से शुभ रहा। वर्ष के शुरू में ही साहित्य अकादेमी की ओर से दो विश्व...

संवाद : प्रतिवादी तर्क का औचित्य

सवाईसिंह शेखावत कुलदीप कुमार का आलेख ‘शब्द छल के सहारे’ (14 दिसंबर) भाजपा के कुनबे की कथित राष्ट्रवादी हरकतों का जायजा लेते हुए उसके...

विवाद : पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है

वीरेंद्र यादव ‘‘खड़े क्या हो बिजूके से नरेश/ इससे पहले कि गिर जाए समूचा वजूद/ एकबारगी/ तय करो अपना गिरना/ अपने गिरने की सही...

समांतर संसार : फरिश्तों के कातिल

सय्यद मुबीन ज़ेहरा उठो बेटा स्कूल को देर हो रही है। नहीं अम्मा आज ठंड हो रही है, नहीं जाऊंगा। स्कूल नहीं जाओगे तो...

दक्षिणावर्त : नाहक वितंडा

तरुण विजय जिनका देश, समाज, उसके चिंतन और गरीबी में पल रहे करोड़ों भारतीयों की हालत सुधारने से कोई सरोकार नहीं, वे अचानक बदजुबानी...

कभी-कभार : संगीत और चित्रबद्ध कविता

अशोक वाजपेयी मुंबई की एशियाटिक सोसायटी के दरबार हॉल में जब दो खंडों में प्रकाशित पुस्तक ‘कालजयी कुमार गंधर्व’ (राजहंस और वाणी प्रकाशन) का...

साहित्य : शब्दजीवियों के शब्दाडंबर

रमेश दवे प्राय: हर कलाकार अपने अंदर प्रतियोगिता जीता है। यह प्रतियोगिता वह समकालीनों से तो करता ही है, अतीत और संभावनाओं से भरे...

पुस्तकायन : आकाश नापती स्त्री

अनिल पुष्कर उर्मिला जैन के संग्रह गुनगुनी धूप का एक कतरा की कविताएं स्त्री वेदना को स्वर देती हैं। यहां स्त्री दुनिया के रचे...

पुस्तकायन : मध्यवर्ग का मानस

अनंत विजय उन्नीस सौ सत्तावन में नई कहानी पर टिप्पणी करते हुए हरिशंकर परसाई ने कहा था- ‘जहां तक कहानी के शिल्प और तंत्र...

अप्रासंगिक : संकीर्णता की सांकल

अपूर्वानंद हिंदुओं को आत्मनिरीक्षण की आवश्यकता है। अपने भीतर झांकने की, खुद को टटोलने की। यह बात अधिकतर हिंदुओं को अटपटी जान पड़ती है,...

निनाद : शब्द-छल के सहारे

कुलदीप कुमार जिन लोगों को यह मुगालता था कि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े अनेक संगठन...

मतांतर : पराजित नहीं हुआ समाजवाद

असीम सत्यदेव अरुण माहेश्वरी के लेख ‘अवाम से क्यों दूर हुआ वाम’ (26 नवंबर) में रोग से ज्यादा दवा की आलोचना कर शायद मौजूदा...

मतांतर : प्रकाशक खुद को बदलें

महेंद्र राजा जैन शंकर शरण की टिप्पणी ‘पाठक से दूरी का सच’ (26 अक्तूबर) पुस्तकें ‘बिकने’ और ‘न बिकने’ की कड़वी सच्चाई बयान करती...

कभी-कभार : भाषा से सुलूक

अशोक वाजपेयी नया निजाम जब से आया है, तब से किसी न किसी रूप में भाषा का मुद्दा उठता रहता है। उस पर ऐसे...

सिनेमा : राजनीतिक फिल्मों की विदा वेला

प्रमोद मीणा भारत में राजनीतिक फिल्मों के निर्माण और वैकल्पिक सिनेमा का नाभिनाल संबंध रहा है। इसलिए अगर वर्तमान परिदृश्य में राजनीतिक सिनेमा का...