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रविवारीय स्तम्भ

प्रसंग : अथ भूमि विमर्श

मृणाल पाण्डे राजधानी की एक किसान रैली में एक किसान की आत्महत्या ने दो कतई अलग-अलग मुद्दों- हाशिए के किसानों में गहराती हताशा और...

मतांतर : पतिव्रत की पैरोकारी

चारु सिंह मिथक हमेशा लोक नहीं रचता, वे पौराणिक भी होते हैं। पतिव्रताओं का मिथक भी कुछ ऐसा ही है। इनकी रचना रामायण और...

समांतर संसार : उखड़ती सांसें

सय्यद मुबीन ज़ेहरा बहुत पहले मुजफ्फर अली ने अपनी फिल्म ‘गमन’ में बड़े शहरों में रहने वाले लोगों की कशमकश को व्यक्त करते हुए...

दक्षिणावर्त : ऊंची जाति नीची जाति

तरुण विजय अपनी जाति को ऊंचा कहने वालों के चेहरे जरा ध्यान से देखिए। इस बात के प्रति वे नितांत आश्वस्त होते हैं कि...

पुस्तकायन: स्मृति और रिश्तों की जमीन

दिविक रमेश का नया काव्य-संग्रह है- मां गांव में है। इससे पहले ‘गेहूं घर आया है’, ‘हल्दी चावल और अन्य कविताएं’ आदि को देखा...

पुस्तकायन: बेहतर इंसान बनने में मददगार

नीलिमा चौहान और अशोक कुमार पाण्डेय के संपादन में आई बेदाद ए इश्क रूदाद ए शादी में प्रेम-पीर और विवाह-कथा के आख्यानों से गुजरते...

पत्रकारिता: सिकुड़ता दायरा

हिंदी पत्रकारिता को यह गौरव प्राप्त है कि वह न सिर्फ इस देश की आजादी की लड़ाई का मूल स्वर रही, बल्कि उसने हिंदी...

मतांतर: मर्जी का मतलब

दीपिका पादुकोण और अन्य निन्यानबे नामक वीडियो को लेकर उठे विवाद पर मृणाल पांडे (19 अप्रैल) को पढ़ना बेहद सुखद लगा। पर उनकी कुछ...

प्रसंग: अस्मिता और वितंडा

महाराष्ट्र सरकार ने फैसला किया कि मुंबई में छह से नौ बजे के प्राइम टाइम में मल्टीप्लेक्सों को एक मराठी फिल्म दिखानी होगी। इस...

कभी-कभार: मौन का अस्फुटन

यों तो कला और कलारचना के अनेक लक्ष्य और प्रक्रियाएं होती हैं, मोटे तौर पर उनमें यह सामान्य विभाजन किया जा सकता है: कला...

निनाद: पुत्र का मोह

वर्ष 2012 में किए गए एक अध्ययन से पता चला है कि गर्भस्थ शिशु के लिंग का निर्धारण करने वाले परीक्षणों के कारण विश्व...

पुस्तकायन: कुंवर नारायण को गुनते हुए

कुंवर नारायण उन यशस्वी कवियों में हैं, जिनकी कविता में मिथक और इतिहास, परंपरा और आधुनिकता, पूर्व और पश्चिम की काव्यात्मक परंपरा, कलात्मक औदात्य,...

अप्रासंगिक: संवाद बनाम लफ्फाजी

पिछले दिनों राहुल गांधी का संसद में भाषण चर्चा में रहा। उसके पहले दिल्ली में किसानों की सभा के उनके संबोधन को लेकर मीडिया...

पुस्तकायन: उन्माद के साए में

जीवन एक नदी के समान है, जिसमें प्रवाह जरूरी है। जब भी इसकी राह में धर्म, अंधविश्वास, महत्त्वाकांक्षा, कुंठा, क्षोभ के अवरोध आते हैं,...

अनन्तर : बदलाव के लिए

ओम थानवी छब्बीस वर्ष पहले आतंकवाद के चरम दौर में जब जनसत्ता का चंडीगढ़ संस्करण संभालने गया, तब भी मित्रों ने कुछ ऐेसे ही...

निनाद : घाटी में बिखराव के बीज

कुलदीप कुमार जम्मू-कश्मीर में क्या खेल खेला जा रहा है? सुपर राष्ट्रवादी भारतीय जनता पार्टी की शिरकत से चल रही मुफ्ती मुहम्मद सईद की...

अप्रासंगिक : तुच्छता का परिवेश

अपूर्वानंद तुच्छता या क्षुद्रता क्या मानवीय स्वभाव का अनिवार्य अंग है? या कुछ लोग स्वभावत: क्षुद्र होते हैं और उनकी क्षुद्रता मौका मिलते ही...

प्रसंग : आखिर यह मर्जी है किसकी

मृणाल पाण्डे दीपिका पादुकोण और निन्यानबे अन्य (पहले इस तरह का प्रचार हमने दारा सिंह की फिल्मों के संदर्भ में ही सुना था) सशक्तीकृत...