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रविवारीय स्तम्भ

प्रसंग : सृजन और शिक्षण

सत्यपाल सहगल पुरानी उक्ति है- ‘विफल लेखक आलोचक बन जाता है’। क्या यह पंक्ति किसी कुढ़े हुए कलमनवीस ने रची या फिर किसी हताश...

पुस्तकायन : समन्वय का सेतु

अमरनाथ तुलसी और गांधी अपने-अपने क्षेत्र के महान व्यक्तित्व हैं। इन दोनों पर अनेक ग्रंथ लिखे गए हैं, तरह-तरह से उनका मूल्यांकन किया गया...

पुस्तकायन : बस्तर में शेक्सपियर की धूनी

अजित कुमार अनामिका का उपन्यास बिल्लू शेक्सपियर पोस्ट बस्तर अनोखे तेवर और खासी चुनौती भरे अंदाज में लिखा गया है। विशेष उद्देश्य यह है...

अवलोकन : हवा में विमर्श

रमेश दवे स्त्री-विमर्श बीसवीं सदी की संतान है। बीसवीं सदी ने विमर्श तो रचा, विश्व स्त्री सम्मेलन किए, राजनीतिक पद दिए, स्त्री के संतान...

अप्रासंगिक : जहरीली नींद के खिलाफ

अपूर्वानंद तीस्ता सीतलवाड़ के जेल जाने के मायने हैं भारत की आत्मा को कैद करना। यह कोई काव्योक्ति नहीं है। आत्मा कोई भौतिक यथार्थ...

निनाद : लोकतंत्र पर हमले

कुलदीप कुमार इन दिनों बार-बार रघुवीर सहाय की कविता ‘राष्ट्रीय प्रतिज्ञा’ दिमाग में कौंध रही है। कविता यों है: ‘हमने बहुत किया है/ हम...

इंटरनेट : प्रेम जो हाट बिकाय

क्षमा शर्मा एशले मेडिसन एक वेबसाइट है, जिसका नारा है- जीवन छोटा है, एक अफेयर हो जाए (लाइफ इज शॉर्ट, लेट अस हैव एन...

समांतर संसार : मौसम, मनुष्य और बेईमानी

सय्यद मुबीन ज़ेहरा पिछले कुछ समय से जिस तरह मौसम की मार मनुष्य पर पड़ने लगी है, उसे देख कर लगता है कि हमने...

मतांतर : संघर्ष का पैमाना

नीलम कुमारी अमरनाथ ने ‘दलित विमर्श की सीमाएं’ (12 जुलाई) में लिखा है कि ‘दलित साहित्य भटकाव का शिकार तो है ही, वह अमीरी-गरीबी...

सिनेमा : क्षेत्रीयता का सिकुड़ता दायरा

कुलदीप मिश्रा जब चैतन्या तम्हाणे निर्देशित मराठी फिल्म ‘कोर्ट’ (2015) को राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चुना गया, तो फिल्म समीक्षक हैरान नहीं हुए, क्योंकि...

कभी-कभार : विस्मृति का वितान

अशोक वाजपेयी यों तो साहित्य के क्षेत्र में स्मृति एक केंद्रीय तत्त्व है: भाषा स्वयं स्मृति का एक संग्रहालय होती है। साहित्य भाषा में...

भाषा : भाषाई आग्रह और दुराग्रह

प्रभु जोशी वक्त ज्यादा नहीं गुजरा और यह होने लगा कि आखिरकार धीरे-धीरे हिंदी की वह परत झड़ने लगी, जो हमारे प्रधानमंत्री की भाषा...

पुस्तकायन : पेचीदा रास्ते

निवेदिता एम हनीफ मदार का संग्रह बंद कमरे की रोशनी पढ़ते हुए मुझे अफ्रीकी साहित्य के विद्वान जिरामूल्ड की बात याद आई। वे कहते...

पुस्तकायन : रिक्शे पर किताबें

कुमार प्रशांत धर्मवीर भारती के एक निबंध संग्रह का नाम है ‘ठेले पर हिमालय’। राजेंद्र रवि ने रिक्शे पर लाद कर जब सात किताबें-...

दक्षिणावर्त : जिन्हें दूसरों के दुख ने मथा

तरुण विजय इस बार कैलास मानसरोवर हम नाथू-ला से गए। वहां अम्मा, बाबूजी की याद आई। और याद आई रज्जू भैया और यतिजी की।...

अप्रासंगिक : पेशेवर की नैतिकता

अपूर्वानंद प्रफुल्ल बिदवई की मौत के सदमे के बीच मैं उनके काम के बारे में सोचने की कोशिश कर रहा हूं। कुछ महीने पहले...

निनाद : आपातकाल का मानस

कुलदीप कुमार आपातकाल की चालीसवीं वर्षगांठ आई और चली गई। इस अवसर पर वे सभी रस्मी बातें की गर्इं, जो ऐसे अवसरों पर हमेशा...

मतांतर : बेवजह बौखलाहट

महेश जायसवाल हिंदी का संबंध सदा भारतीय जीवन की मिश्रणशीलता से रहा है। इसलिए साहित्य में शुद्धतावाद न पहले कभी था और न आज...