ताज़ा खबर
 

रविवारीय स्तम्भ

ताक पर मर्यादा

सलमान रुश्दी विश्व प्रसिद्ध अंगरेजी लेखक हैं। अपने लेखन, व्यक्तित्व और बयानों से विवादों में बने रहने वाले। ये वही सलमान रुश्दी हैं, जिनकी...

कभी-कभार: राजनीति का अतियथार्थ

यूरोप में जब कला में अतियथार्थ की अवधारणा और व्यवहार की शुरुआत हुई थी तो यह माना या कम से कम दावा किया गया...

पुस्तकायन: स्त्री और कांच की दुनिया

कृष्ण कुमार की पुस्तक चूड़ी बाजार में लड़की हर लिहाज से एक अध्यापक की पुस्तक है। अमूमन समाजशास्त्र, समाजविज्ञान या साहित्य के क्षेत्रों में...

पुस्तकायन: तलाश में भटकाव

प्रदीप सौरभ का नया उपन्यास है और सिर्फ तितली। यह शिक्षा की समस्या पर केंद्रित है। उपन्यास में तितली के बारे में कहा गया...

अप्रासंगिक : ओबामा का गांधी-स्मरण

अपूर्वानंद ‘भारत में पिछले कुछ समय में हर प्रकार के मतावलंबियों को मात्र उनके विश्वास के कारण दूसरे मत के लोगों द्वारा निशाना बनाया...

निनाद : विद्वेष के बूते सियासत

कुलदीप कुमार ‘‘महात्माजी, जो कुछ उम्मीद है, बाला साहब देवरस से है। वे जो करेंगे वही आपके लिए होगा। वैसे काम चालू हो गया...

प्रसंग : मछली बाजार में संविधान

अशोक लाल खुद रामलला के वकील, हमारे कानून मंत्री, रविशंकर प्रसादजी ने मन को एक नूतन दिव्य प्रकाश से धन्य किया है। उन्होंने कहा...

मतांतर : भाषाई उपेक्षा और असमानता

गणपत तेली वीरेंद्र जैन ने ‘गुलामी का नाहक भय’ (1 फरवरी) लेख में बताया है कि अभी भाषिक गुलामी की स्थिति हमारे यहां आई...

कभी-कभार : शास्त्रीयता की नई पहचान

अशोक वाजपेयी यह लगभग अभूतपूर्व है, कम से कम हमारे आधुनिक समय में: प्रसिद्ध उद्योगपति नारायणमूर्ति के बेटे ने अपनी संपदा में से एक...

मीडिया : चुनावी चटुल पटकथा

क्षमा शर्मा चुनाव के दिनों में जितने व्यस्त राजनीतिक पार्टियों के नेता-कार्यकर्ता होते हैं, उससे कम अखबार या टीवी वाले नहीं होते। हर वक्त...

पुस्तकायन : निरपेक्ष नजर की परख

छबिल कुमार मेहरे रमेश दवे स्थितप्रज्ञ आलोचक हैं। वादों-विवादों, खेमेबाजी, नारेबाजी और विचारधारागत पूर्वग्रहों, पुरस्कार-सम्मानों की आकांक्षा से हमेशा दूर रहते आ रहे दवेजी...

पुस्तकायन : दो दुनियाओं के बीच सेतु

प्रताप दीक्षित कथाकार शैलेंद्र सागर के संग्रह ब्रंच तथा अन्य कहानियां में वर्तमान के कोलाहल के बीच उगे-फैलते मरुथल में संवेदना की तलाश और...

दक्षिणावर्त : शहीद की बेटी

तरुण विजय अलका छठी कक्षा में पढ़ती है। अपने पिता की शहादत पर रुलाई को बहुत कड़ाई से थामते हुए वह चिल्ला कर बोली...

समांतर संसार : गुम होती लड़कियां

सय्यद मुबीन ज़ेहरा गणतंत्र दिवस के मौके पर अमेरिकी राष्ट्रपति ने राजपथ पर भारत की स्त्रीशक्ति को देखा, प्रभावित हुए और सीरीफोर्ट सभागार के...

प्रसंग : वर्चस्व की व्यथा

संजीव चंदन पिछले दिनों आंबेडकर की विरासत पर कब्जे के लिए भारतीय जनता पार्टी कुछ उतावली दिखी। लोकसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी ने...

मतांतर : बंद कपाट

जसविंदर सिंह जो समाज अपने सोच की खिड़कियां बंद कर लेता है, वह न तो स्वस्थ समाज हो सकता है और न ही समय...

निनाद : आस्था और असहमति

कुलदीप कुमार पेरिस में व्यंग्य पत्रिका ‘शार्ली एब्दो’ पर हुए आतंकी हमले के बाद हिंदुत्व की प्रयोगशाला चलाने वालों को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता...

अप्रासंगिक : गांधी का आखिरी विद्रोह

अपूर्वानंद जनवरी में सवाल किया जाना चाहिए कि आखिर हम किस गांधी को याद करना चाहते हैं। या कि उन्हें हम किस तरह याद...