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रविवारीय स्तम्भ

पुस्तकायन: उम्मीद का स्वर

सुखप्रीत कौर जनसत्ता 5 अक्तूबर, 2014: लाल सिंह दिल पंजाबी के चर्चित कवियों में हैं। उनकी चर्चा हिंदी में बहुत कम हुई है। हिंदी...

पुस्तकायन: आलोचना के वैज्ञानिक औजार

रमेश दवे जनसत्ता 5 अक्तूबर, 2014: प्रसिद्ध आस्ट्रियन दार्शनिक विटगेन्स्टाइन ने ‘द इनर’ नाम से अभ्यंतर का विचार रचा, जो बताता है कि मनुष्य...

दक्षिणावर्त: वह छुटकी-सी माताराम

तरुण विजय जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: वह नाराजगी और गुस्सा। वह चिड़चिड़ापन और ‘मैं न मानूं’ का अतिरेकी बालहठ। जब मन में आए सोना,...

समांतर संसार: चमक और उदास चेहरे

सय्यद मुबीन ज़ेहरा जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: मंगल ग्रह पर भारत की दस्तक की तस्वीरों के बीच कुछ तस्वीरें सबसे आकर्षक थीं। वे महिला...

टेलीविजन: लोकप्रियता का भ्रामक पैमाना

सतीश सिंह जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: आज टेलीविजन रेटिंग पॉइंट यानी टीआरपी शब्द का प्रयोग आम हो गया है, पर इसके वास्तविक तंत्र से...

मतांतर: हकीकत से उलट

दीपशिखा जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: आजकल हमारे राजनीतिक और बुद्धिजीवी तबके में स्त्रियों का पहनावा और उनकी जीवन-शैली बहस का मुद्दा बना हुआ है।...

प्रसंग: आदिवासी विमर्श के रोड़े

केदार प्रसाद मीणा जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: हिंदी का सबसे नया विमर्श आदिवासी विमर्श है। हालांकि हिंदी में आदिवासियों पर लंबे समय से लिखा...

कभी-कभार: लेखक के समकालीन

अशोक वाजपेयी जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग ने रवींद्रनाथ ठाकुर और उनके यशस्वी समकालीनों पर दो दिनों का...

पुस्तकायन: घेरे में स्त्री

नीलाप्रसाद जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: बर्बर दामिनी बलात्कार कांड और उस घटना के प्रतिक्रियास्वरूप आम जनमानस में उपजे आक्रोश के परिप्रेक्ष्य में मूल्यमंथन की...

पुस्तकायन: जीवंत कल्पना लोक

पूरन सरमा जनसत्ता 28 सितंबर, 2014: किसी विधा के लेखन में सोद्देश्यता उसकी पहली शर्त मानी जाती रही है। बिना कथ्य के लिखने का...