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रविवारीय स्तम्भ

किताबें मिलीं:सुरंग के उस पार, कर्मवीर खांडू और चौराह

कथाकार अशोक गुप्ता आठवें दशक से कहानी लेखन के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं। उनकी कहानियां विषय वैविध्य और भाषा के खिलंदड़ापन के कारण...

बारादरी: लोकप्रिय हुआ तो लुगदी का ठप्पा लगा दिया

गल्पकार सुरेंद्र मोहन पाठक का कहना है कि टीवी और इंटरनेट की बढ़ती तकनीक ने उनके वे पाठक छीन लिए हैं, जो फुर्सत मिलते...

दूसरी नजर: एकांगी सोच का राज

भाजपा-राजग सरकार ने ‘टैक्स लगाओ और खर्चो’ की रणनीति अख्तियार की। वर्ष 2014-15 से 2016-17 के बीच सरकारी खर्चे तेजी से बढ़े। यह मान...

बाखबर: बाबा रे बाबा

टीवी के जनतंत्र की बलिहारी कि इस ‘बलात्कारी बाबा’ के भी पक्षधर कम न रहे और एकाध तो इतना सांप्रदायिक दिमाग का रहा, जो...

प्रसंगवश: नकल का बाजार

अब निजी विद्यालय ऐसे वैश्विक बाजार का हिस्सा हैं, जहां शिक्षा एक बिकाऊ माल की तरह है। शिक्षा के इस निजी बाजार में विद्याार्थी...

वक्त की नजर: नफरत के सहारे

विकास और परिवर्तन की जगह मुसलमानों को मोदी के राज में मिली है नफरत और गोरक्षकों के हमले। सो, एक बात जो अभी से...

किताबें मिलीं: कविता का शहर, समकालीन हिंदी पत्रकारिता और कहीं कुछ नहीं

‘खामोशी और कोलाहल के बीच की किसी जगह पर वह कहीं खड़ा है और इस खेल का मजा ले रहा है। क्या सचमुच खामोशी...

बाखबर: जैसे इनके दिन फिरे

इस बीच नकद नारायण एटीएम से गायब हो गए। आठ राज्य कैश की किल्लत में रहे। चैनलों को नोटबंदी के दिन याद आए। फिर...

वक्त की नजर: छवि बिगाड़ने की चालें

इस बदलते माहौल को देखते ही मोदी को बदनाम करने के लिए कांग्रेस अपनी चालें चल रही है, ताकि अगले आम चुनाव तक प्रधानमंत्री...

तीरंदाज: मुक्त इच्छा से मुक्ति

निजी जीवन हो, धर्म हो, व्यवसाय हो या फिर लोकतंत्र, मुक्त-इच्छा के त्याग में मोक्ष प्राप्ति निहित नहीं हो सकती है, क्योंकि भक्ति अपने...

दूसरी नजर: अपराध और दंड-मुक्ति

उत्तर प्रदेश के उन्नाव में, जून 2017 में, सत्रह वर्षीय पीड़िता के साथ बलात्कार का आरोप सार्वजनिक जीवन में रहे एक व्यक्ति (भाजपा विधायक)...

सूचना के संजाल में छीजती संवेदना

समाज में साहित्य के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है। प्राय: ऐसा प्रतीत होता है कि समाज को साहित्य की कोई जरूरत...

किताबें मिलीं

कुछ सत्य कुछ सुंदर

युवाओं की साहित्य विमुखता

आज की युवा पीढ़ी के बारे में कहा जाता है कि साहित्य से उसे कोई लगाव नहीं है।

किताबें मिलींः मैं कहूं जगबीती, हिंदी गजल की नई चेतना और ख्वाहिशों के खांडववन

जब हम जग की बात करते हैं तो जग में ही सम्मिलित होते हैं। उसमें हर कोई समाहित रहता है। इस संग्रह में गिरिराज...

बाखबरः दलित कथा ललित कथा

दलित युवाओं के इस आक्रोश का सीधा प्रसारण इस कदर जबर्दस्त था कि चैनलों में कोई दूसरी खबर अंटती ही न थी।

तीरंदाजः भाषा भेद न कीजै

महात्मा गांधी ने कहा था राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। यह बात सच है। राष्ट्रीय स्तर पर अभिव्यक्ति के लिए एक भाषा का...

वक्त की नब्जः जाना था कहीं, पहुंच गए कहीं

भारतीय राजनीति भी विचित्र है। जिस मकसद को लेकर चलते हैं हमारे राजनीतिक दल और राजनेता, उसका कई बार बिलकुल उलटा हो जाता है।