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नेता और अध्यक्ष

कांग्रेस पार्टी के आंतरिक चुनावों को लेकर एक असाधारण-सी दिलचस्पी, बल्कि बाधा पहुंचाने वाली, देखने को मिल रही है। दो साल पहले जब जेपी नड्डा भाजपा के अध्यक्ष ‘चुने’ गए थे, तब भाजपा के सामान्यजन सहित भारत में किसी ने भी, और पक्के तौर पर कांग्रेस पार्टी के किसी सदस्य ने रत्तीभर भी इसे तवज्जो नहीं दी थी।

नेता और अध्यक्ष
'भारत जोड़ो यात्रा' में कांग्रेस नेता राहुल गांधी। (फोटो- पीटीआई)

किसी ने भी मतदाता सूचियों के बारे में जानने की जहमत नहीं उठाई। किसी को नहीं पता था कि कौन पीठासीन अधिकारी है या नड्डा ने अपना ‘परचा’ भर दिया है। हालांकि भाजपा सत्तारूढ़ पार्टी थी और दुनिया में सबसे ज्यादा सदस्यों वाली राजनीतिक पार्टी होने की शेखी बघारती रही और नड्डा का चुनाव कोई घटना नहीं बनी।

कांग्रेस पार्टी के चुनावों को लेकर भाजपा और मीडिया ने जिस तरह की अति-दिलचस्पी दिखाई है, वह दो तथ्यों का प्रमाण है- एक, कांग्रेस मुक्त भारत एक मिथक और एक मरीचिका है, ऐसा कभी नहीं होगा। दूसरा यह कि भारत जोड़ो यात्रा ने अपनी शालीनता से भाजपा को हिला दिया है और मीडिया, जो आमतौर पर कांग्रेस की परवाह नहीं करता है, वह उठने-बैठने और ध्यान देने के लिए मजबूर हो गया है।

पार्टी और गांघी परिवार
कांग्रेस अक्तूबर में अपना नया अध्यक्ष चुनेगी। यह कौन होगा, मैं कह नहीं सकता। कुल मिलाकर बड़े पैमाने पर जनसामान्य तो यही चाहता है कि राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष का पद संभालना चाहिए, जो उन्होंने जुलाई 2019 में छोड़ दिया था। यह उनका अधिकार है। हालांकि राहुल गांधी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोबारा कांग्रेस अध्यक्ष बनने की उनकी कोई इच्छा नहीं है।

राहुल गांधी को अपना मानस बदलने के लिए पार्टी नेता अपनी आखिरी बड़ी कोशिश कर सकते हैं, लेकिन अगर वे नहीं माने तो उन्हें उनकी इच्छाओं का सम्मान करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। निर्वाचक मंडल को किसी दूसरे व्यक्ति को अध्यक्ष चुनना चाहिए और अंतरिम अध्यक्षता का मामला खत्म होना चाहिए। मेरे विचार से, गैर-गांधी कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने का मतलब यह नहीं होगा कि पार्टी ने गांधी परिवार को या गांधी परिवार ने पार्टी को छोड़ दिया है।

इतिहास के सबक
कांग्रेस पार्टी का इतिहास महत्त्वपूर्ण सबकों से भरा है। भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में महात्मा गांधी के पदार्पण के बाद, उन्हें कांग्रेस पार्टी के नेता के रूप में स्वीकार कर लिया गया था। कई बड़े नेताओं में उनका कद सबसे ऊंचा था।

1921 से 1948 के दौरान चौदह लोगों ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली थी और इनमें सीआर दास, सरोजिनी नायडू, एस श्रीनिवास आयंगर, एमए अंसारी, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, राजेंद्र प्रसाद, सुभाष चंद्र बोस, अब्दुल कलाम आजाद और आचार्य कृपलानी जैसे दिग्गज नेता शामिल थे।

पार्टी के सामान्य सदस्य-कार्यकर्ता और यहां तक कि गैर-सदस्य भी इस बारीकी को समझते थे, पर महत्त्वपूर्ण फर्क यह था कि महात्मा गांधी ‘कांग्रेस के नेता’ थे और दूसरे लोग ‘कांग्रेस के अध्यक्ष’। एक पद/व्यक्ति ने दूसरे पर हावी होने की कोशिश नहीं की थी।

ऐसी ही व्यवस्था 1948 से 1964 के बीच हुई थी। जवाहरलाल नेहरू को कांग्रेस के नेता के तौर पर स्वीकार किया गया था, जबकि इस दौरान सात लोगों ने कांग्रेस अध्यक्ष का पद संभाला। 1965 से 1984 के बीच भी ऐसा होता रहा। इंदिरा गांधी को कांग्रेस की नेता के रूप में स्वीकार किया गया, जबकि आठ लोगों ने कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी संभाली।

एक बड़े देश के बड़े राजनीतिक दल में व्यवस्थाएं महत्त्वपूर्ण अर्थ निर्धारित करती हैं। नेता का काम लोगों को नेतृत्व देना होता है, उनके साथ दृष्टिकोण को साझा करना होता है और उन्हें पार्टी को वोट देने के लिए प्रेरित करना होता है। अध्यक्ष का मुख्य काम पार्टी संगठन को दुरुस्त करना और इसे एक अच्छी चुनावी मशीन का रूप देना होता है।

ये दोनों काम एक-दूसरे के पूरक हैं। अगर पार्टी किसी व्यक्ति को इन दोनों कार्यों के लिए उपयुक्त पाती है, तो वह पार्टी भाग्यशाली है, अगर पार्टी दो लोगों के बीच जिम्मेदारियों को बांट देती है, तो वह पार्टी व्यावहारिक और बुद्धिमान होती है।

प्रेरणा, पुनर्निर्माण
जैसा कि मैंने कहा, नेता प्रेरित करने वाला होना चाहिए। महात्मा गांधी ने अहिंसा, असहयोग, नागरिक अवज्ञा और अंतत: भारत छोड़ो आंदोलन के अपने आदर्श राजनीतिक सिद्धांत से ऐसा किया था। जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्षता, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जैसे शानदार विचारों से ऐसा किया।

इंदिरा गांधी ने राष्ट्र से बड़े सपने देखने को कहा और बैंकों के राष्ट्रीयकरण तथा सबको घर मुहैया कराने जैसे साहसिक कदम उठाए। अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वर्ण चतुर्भुज जैसी महत्त्वाकांक्षी परियोजनाओं से राष्ट्र को नई दिशा दी। प्रेरणा पैदा करने वाले मुहावरे (भाग्य के साथ कोशिश करें) या गरीबी हटाओ जैसे करंट पैदा करने वाले नारे या इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत जैसी बहुमूल्य दृष्टि नेता को ऊंचाइयों तक ले जा सकती है।

इसके उलट, एक पार्टी अध्यक्ष को जमीन से जुड़ा, दल को सुरक्षा देने और मजबूत करने वाला और सख्त फैसले करने वाला होना चाहिए। कांग्रेस पार्टी का तंत्र पुराना पड़ चुका है और गंभीर स्थिति में है, जिसे तत्काल दुरुस्त करने की जरूरत है। इसके लिए पार्टी को सड़कों पर उतरना होगा और पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ भी पूरा वक्त लगाना होगा।

पार्टी अध्यक्ष को बूथ से लेकर ब्लाक, जिला और राज्य स्तर पर हर इकाई के कामकाज पर करीब से नजर रखनी चाहिए। अध्यक्ष को चाहिए कि वे पार्टी कार्यकर्ताओं को लाड़-प्यार के साथ दंडित भी करें, नेताओं को इनाम के साथ सजा भी दी जाए और पार्टी की मशीन में पुराने पड़ चुके या खराब हो चुके हर पुर्जे को बदल दिया जाए।

यह साल भर (सिर्फ अध्यक्ष के जन्मदिन को छोड़ कर!) चौबीसों घंटे चलते रहने वाला काम है। एक बहुदलीय लोकतंत्र और सजीव संसद के लिए कांग्रेस जरूरी और महत्त्वपूर्ण है। कांग्रेस की गैरहाजिरी से हम एक दलीय व्यवस्था वाले देश में तब्दील हो सकते हैं और लोकतंत्र का मुगालता बना रह सकता है।

कांग्रेस को एक नेता सह अध्यक्ष मिलेगा या फिर एक नेता और एक अध्यक्ष, इसका पता अगले छह दिन में चल जाएगा। कांग्रेस पार्टी के साथ ही देश के लिए भी यह हफ्ता निर्णायक है। देश के लिहाज से, कांग्रेस पार्टी के आंतरिक चुनावों में असाधारण रूप से और बाधा पैदा करने वाली जिस तरह की दिलचस्पी दिखाई जा रही है, उसे पूरी तरह से अनुचित नहीं कहा जा सकता।

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First published on: 25-09-2022 at 04:41:00 am
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