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दूसरी नजर: बिगड़ते हालात और सरकार की अनिच्छा

पांच करोड़ डॉलर तक का कर्ज और एक साल की अवधि, यह एक तरह से ब्रिज लोन यानी कार्यशील पूंजी वाले कर्ज होते हैं। कर्जदार ऐसा कर्ज लेने को तभी मजबूर होगा जब वह भारतीय बैंकों या भारत के बाजार तक पहुंच नहीं पाएगा।

Author September 23, 2018 1:46 AM
प्रतिकात्मक तस्वीर।(Express Photo by Praveen Khanna/Files)

सरकार ने इस बात को मौन रूप से स्वीकार कर लिया है कि अर्थव्यवस्था को संकटों का सामना करना पड़ रहा है। ‘संकट मोचक’ इस महीने की 14 तारीख को प्रधानमंत्री से मिले। देर शाम हुई इस बैठक में रिजर्व बैंक के गवर्नर को भी बुलाया गया था। उनकी मौजूदगी को लेकरदो गलत बातें हुर्इं; बैठक को लेकर हुआ प्रचार और बैठक के बाद हुर्इं घोषणाएं। रुपए में सुधार के लिए उठाए जाने वाले कदमों को लेकर घोषणा अगर सरकार को ही करनी है और वह भी वित्तमंत्री को, तो गवर्नर (जिन्हें अधिकार विहीन कर दिया है) को क्यों रखा है? खैर जो हो, मैं यहां उन पांच उपायों की चर्चा कर रहा हूं जो ‘रुपए को मजबूत’ कर सकते हैं। इन पांच उपायों का मकसद देश में दस अरब अमेरिकी डॉलर तक विदेशी मुद्रा लाना है, ताकि देश से बाहर जाने वाली विदेशी मुद्रा के साथ संतुलन बनाया और रुपए के अवमूल्यन को रोका जा सके। समस्या यह है कि किसी भी देश में विदेशी निवेश का आना या बाहर जाना उस देश की सरकार के हाथ में नहीं रहता है। विदेशी निवेश का फैसला उसके मालिकों या प्रबंधकों पर निर्भर करता है कि वे किस देश में कितना पैसा लगाना चाहते हैं। अब मैं इन पांच उपायों पर चर्चा कर रहा हूं और पूछता हूं कि क्या ऐसा हो पाएगा?

1- ढांचागत क्षेत्र की परियोजनाओं के कर्जों के लिए अनिवार्य सुरक्षा शर्तों की समीक्षा की जाएगी।
जब कोई कर्जदार विदेशी मुद्रा में कर्ज लेता है, तो उसे उसी मुद्रा में कर्ज लौटाना होता है। ढांचागत क्षेत्र की परियोजनाओं के कर्ज आमतौर पर लंबी अवधि के होते हैं और कर्ज लेने वाले को इस बात का पता नहीं होता कि उस अवधि में रुपए का मूल्य बढ़ेगा या घटेगा। इसलिए उसे सुरक्षा की सलाह दी जाती है। उसे इसकी थोड़ी-सी लागत चुकानी होगी, लेकिन अगर रुपए का अवमूल्यन होता है तो ऐसी सूरत में उसे फायदा होगा। मुझे आश्चर्य है कि ऐसा कौन नासमझ कर्जदार होगा जो बिना किसी सुरक्षा के ढांचागत क्षेत्र की परियोजना के लिए लंबी अवधि का कर्ज लेगा। अगर रुपए का अवमूल्यन होता है तब क्या विनिमय दर का जोखिम सरकार उठाएगी या फिर आरबीआइ पुरानी दर पर कर्जदारों को डॉलर देगा? चूंकि ऐसा कुछ नहीं होगा, और ढांचागत परियोजनाओं वाले कर्ज के ज्यादातर कर्जदार सुरक्षित रहेंगे।

2- विनिर्माण क्षेत्र की कंपनियों को तीन साल की जगह एक साल के लिए पांच करोड़ डॉलर तक विदेशों से कर्ज लेने की अनुमति होगी।
पांच करोड़ डॉलर तक का कर्ज और एक साल की अवधि, यह एक तरह से ब्रिज लोन यानी कार्यशील पूंजी वाले कर्ज होते हैं। कर्जदार ऐसा कर्ज लेने को तभी मजबूर होगा जब वह भारतीय बैंकों या भारत के बाजार तक पहुंच नहीं पाएगा। आर्थिक माहौल में अनिश्चितता की समस्या को न तो कर्ज का आकार हल कर पाएगा, न ही छोटी अवधि। मुझे संदेह है कि इस खिड़की के जरिए भारत में काफी पैसा आ जाएगा।

3- एक कारपोरेट समूह, कंपनी या संबंधित इकाई के लिए एफपीआइ के कारपोरेट बांड पोर्टफोलियो में बीस फीसद निवेश की सीमा को हटाया जाएगा, और कारपोरेट बांडों के किसी भी इश्यू के पचास फीसद की सीमा की समीक्षा की जाएगी।
ये सीमाएं आरबीआइ ने अप्रैल 2018 में लगाई थीं, ताकि किसी कंपनी या कारपोरेट समूह का कर्ज अकेले एक ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआइ) के हाथ में न चला जाए। इस सीमा को हटाने से एएए-रेटिंग वाली कंपनियों को जानकार निवेशक से और कर्ज जुटाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, देश की व्यापक आर्थिक स्थिरता को लेकर कर्जदाता की जो धारणा बनी हुई है, उस पर इसका कोई असर नहीं पड़ने वाला। निवेशक और विश्लेषक अपनी राय वित्तीय घाटे, चालू खाते के घाटे, केंद्रीय बैंक की दरों, बांड यील्ड, महंगाई दर के आंकड़ों के आधार पर ही बनाते हैं।

4- वित्त वर्ष 2018-19 में जारी किए गए मसाला बांड इश्यू को विदहोल्डिंग टैक्स से छूट मिलेगी और मसाला बांडों सहित ऐसे ही अन्य बांडों में भारतीय बैंकों के बाजार बनाने पर लगा प्रतिबंध हटाया जाएगा, जिसमें ऐसे बांडों के अंडरराइटिंग पर पाबंदी भी शामिल है।
यह विशुद्ध रूप से एक अस्थायी कदम है, जो 31 मार्च 2019 तक ही वैध होगा। इसका मकसद यही है कि कॉरपोरेट कंपनियां भारतीय मुद्रा में विदेशों से कर्ज जुटा सकें। अगर विदहोल्डिंग टैक्स हटा लिया जाता है तो इसका नतीजा यह होगा कि कर्जदाता को रिटर्न तो ज्यादा मिल जाएगा, लेकिन अगर उसकी कर देनदारी है तो वह वही बनी रहेगी। यह तो एक छोटा-सा पहलू हुआ। मसाला बांड में इस जोखिम का प्रमुख कारण तुलनात्मक यील्ड और विनिमय दर होती है और विनिमय दर का जोखिम कर्जदाता के साथ जुड़ा होता है। ऐसे में अगर ये दो कारण अनिश्चितता लिए हों या इनमें जोखिम हो, तो दर के अंतर-प्रवाह में कोई बड़ा बदलाव नहीं आने वाला।

5- गैर-जरूरी वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध और निर्यात को प्रोत्साहन देना।
जिस सरकार के पिछले चार साल में कारोबारी निर्यात की वृद्धि दर शून्य से नीचे रही है, वह ऐसी बड़ी बात कर रही है। मुक्त व्यापार में सरकार का जरा भी भरोसा नहीं रह गया है। सरकार पहले ही कई तरह के संरक्षणवादी कदम उठा चुकी है। बाजार ऐसे कदमों को पचा नहीं पाते। इसके अलावा, निर्यात बढ़ाना बहुत ही कष्टप्रद काम है। इसलिए अगले छह महीने में कोई चामत्कारिक नतीजे सामने नहीं आने वाले। रुपए का कारोबारी बाजार विशालकाय है। रोजाना करीब साठ अरब अमेरिकी डॉलर का कारोबार घरेलू बाजार में और इतना ही विदेशी बाजार में होता है। सरकार के इन पांच कदमों को लेकर बाजार की प्रतिक्रिया अच्छी से लेकर बुरी तक हो सकती है। घोषणा के दिन से लेकर शुक्रवार 21 सितंबर तक विनिमय दर या बांड यील्ड में कोई सुधार नहीं आया है। बाहरी कारण जैसे- कच्चे तेल के बढ़ते दाम, अमेरिकी ब्याज दरें और बढ़ता व्यापार युद्ध भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर असर डाल रहे हैं। हालात एकदम खराब हो चुके हैं। सरकार अपने बजट अनुमानों को लेकर ऐसे अड़ी है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं है। वृद्धि दर, सरकारी खर्च, एनपीए का समाधान और कर संबंधी कदमों को लेकर सरकार कुछ भी करने की इच्छुक नजर नहीं आ रही। लगता है कि सरकार ने ठान लिया है कि हालात और बिगड़ने दिए जाएं, उसके बाद ही इस पर काबू पाया जाएगा।

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