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दूसरी नजर: अर्थव्यवस्था खतरे में

अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन के कारणों में पहला कारण तो यह है कि प्रधानमंत्री को वृहद अर्थशास्त्र के बारे में कुछ नहीं मालूम और वे इस बारे में कुछ सीखना भी नहीं चाहते।

Author May 12, 2019 4:59 AM
वित्त वर्ष 2016-17, 2017-18 और 2018-19 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 8.2 से 7.2 और फिर सात फीसद पर आ गई।

नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनावों में अर्थव्यवस्था को लेकर बहुत ही विचारहीन टिप्पणी की थी। उसका मैंने यह कहते हुए जवाब दिया था कि ‘श्री मोदी को अर्थशास्त्र की जितनी समझ है उसे एक डाक टिकट के पीछे लिखा जा सकता है।’ यह एक उचित ही टिप्पणी थी। लेकिन मेरा मानना है कि मोदी ने उस टिप्पणी के लिए मुझे माफ नहीं किया है। कोई बात नहीं, लेकिन वक्त ने साबित कर दिया कि मैं सही था। मोदी सरकार के पांच साल पूरे होने पर हम सरकार की भूल-चूक का एक लंबा आरोपपत्र तैयार कर सकते हैं। मेरे विचार से इसमें सबसे ऊपर अर्थव्यवस्था का प्रबंधन होगा। अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन के कारणों में पहला कारण तो यह है कि प्रधानमंत्री को वृहद अर्थशास्त्र के बारे में कुछ नहीं मालूम और वे इस बारे में कुछ सीखना भी नहीं चाहते। दूसरा कारण यह कि व्यापार, कारोबार, निवेशक और उपभोक्ता नीतिगत बदलावों को किस तरह से लेंगे, इसकी भविष्यवाणी कर पाने में वित्तमंत्री की अक्षमता, और तीसरी वजह यह कि सरकार में अर्थशास्त्रियों को नजरअंदाज किया जाना और नौकरशाहों पर जरूरत से ज्यादा भरोसा।

एक अलग लीग
भारत की सरकार को चलाना राज्य सरकार चलाने से काफी अलग है। एक मुख्यमंत्री को विनिमय दर या चालू खाते का घाटा या मौद्रिक नीति या बाह्य घटनाओं (जैसे-अमेरिका और चीन के बीच दरों को लेकर युद्ध या ईरान पर अमेरिकी पाबंदियां) के बारे में कोई चिंता नहीं करनी पड़ती। अगर एक मुख्यमंत्री राज्य के राजस्व का प्रबंधन और खर्च पर नियंत्रण कर लेता है, केंद्र सरकार से बड़ी मदद मिल जाती है और राज्य में पर्याप्त निजी निवेश को आकर्षित कर लेता है तो वह आर्थिक प्रबंधन में काफी अच्छा कर ले जाएगा। कई मुख्यमंत्रियों ने ज्यादा औपचारिक शिक्षा के बिना भी अपने राज्य की अर्थव्यवस्था के प्रबंधन में खासा श्रेय हासिल किया है। भारत की अर्थव्यवस्था का प्रबंधन एक अलग लीग में खेलने जैसा है। सफल मुख्यमंत्री भी इसमें तब लड़खड़ा गए, जब उन्हें वित्तमंत्री बनाया गया। दूसरी ओर, बिना राजनीतिक अनुभव वाले डॉक्टर मनमोहन सिंह एक शानदार वित्तमंत्री थे, क्योंकि वृहद अर्थशास्त्र में माहिर थे और मशहूर अर्थशस्त्रियों के साथ लगातार विमर्श करते रहते थे। बिना डॉ. सिंह के न कोई उदारीकरण हो पाता, न अन्य सुधार, जो उन्होंने किए।

एक के बाद एक गलती
जब अर्थशास्त्र का प्रबंधन किसी नौसिखिए या निरंकुश के हाथ में सौंप दिया जाता है, तो उसके नतीजे भी जल्दी ही सामने आने लगते हैं। नोटबंदी इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है। किसी इंटरपास अर्थशास्त्री ने भी प्रधानमंत्री को चलन में जारी मुद्रा का छियासी फीसद हिस्सा अवैध घोषित करने की सलाह नहीं दी होगी। फिर भी ऐसा किया गया। चूंकि अरुण जेटली ने कभी भी सार्वजनिक रूप से इस बात की जिम्मेदारी नहीं ली, इसलिए यही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि यह प्रधानमंत्री का फैसला था। उनको श्रेय देने के बजाय प्रधानमंत्री ने ही जिम्मेदारी अपने पर ले ली, लेकिन उन्होंने यह मानने से इनकार कर दिया कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था पटरी से उतर गई, छोटे और मझोले उद्योग खत्म हो गए, नौकरियां चली गर्इं और कृषि क्षेत्र में संकट गहरा गया।
नोटबंदी के बाद और कई गलत फैसले होते गए। जो बजट बनाए जाते रहे उनमें कहीं भी इंसान के आर्थिक व्यवहार की समझ की झलक नजर नहीं आती। जीएसटी बहुत ही खामियों से भरा हुआ बनाया गया और बहुत ही जल्दबाजी में लागू कर दिया गया, एनपीए के मामले निपटाने में भी बहुत ही अकुशलता रही, राजस्व लक्ष्य बिल्कुल अव्यावहारिक रखे गए और इन्हें हासिल करने के लिए निरंकुश शक्तियों और अनुचित तरीकों का इस्तेमाल किया गया, और बुनियादी आर्थिक समस्याओं के लिए नौकरशाही के चलताऊ तरीके खोजे गए।

रिपोर्ट कार्ड निराशजनक
वित्त मंत्रालय के आर्थिक मामलों के विभाग ने पांच वित्त वर्ष पूरे होने के मौके पर एक रिपोर्ट कार्ड तैयार किया है। इसमें नोटबंदी के बाद वर्षों जो 2016-17 के बाद शुरू हुए, के आंकड़े दिए गए हैं। रिपोर्ट के कुछ खास शीर्षकों के बारे में मैं आपको बताता हूं-
– वित्त वर्ष 2016-17, 2017-18 और 2018-19 में वास्तविक जीडीपी वृद्धि 8.2 से 7.2 और फिर सात फीसद पर आ गई। 2018-19 की चौथी तिमाही में यह वृद्धि साढ़े छह फीसद थी।
– सकल वित्तीय घाटा जीडीपी का 3.5, 3.5 और 3.4 फीसद रहा। 2018-19 के लिए आखिरी आंकड़ा संदेहास्पद है, क्योंकि कर संग्रह में संशोधित अनुमान के मुकाबले ग्यारह फीसद की कमी आई है।
– पूंजीगत खर्च स्थिर बना रहा, 2018-19 में यह जीडीपी का 1.7 फीसद रहा और यही 2015-16 में था।
– जीडीपी अपस्फीति, जो महंगाई का ही दूसरा रूप है, 3.1 से बढ़ कर 4.2 फीसद हो गई।
– चालू खाते का घाटा जीडीपी के 0.6 फीसद से बढ़ कर 1.9 और फिर 2.6 फीसद तक पहुंच गया।
– निजी उपभोग खर्च और सरकारी उपभोग खर्च दोनों ही स्थिर बने रहे।
– निवेश दर 28.2 और 28.9 फीसद के बीच ही बनी रही, जो 2011-12 में हासिल 3.3 फीसद से काफी नीचे है।
– कृषि क्षेत्र में सकंट गहराने की वजह से जीवीए की वृद्धि दर तेजी से घटती हुई 6.3 से 5.0 और फिर 2.7 फीसद पर आ गई।
– उद्योग में जीवीए की दर स्थिर बनी रही, सेवाओं में जीवीए की दर घटती हुई 8.4 से 8.1 और फिर 7.4 फीसद पर आ गई।
– वित्त वर्ष 2018-19 में पोर्टफोलियो निवेश ऋणात्मक हो गया।

भाजपा की शेखियां हवा हो गई हैं। अर्थव्यवस्था की हालत को लेकर हमें जो डर सता रहा था, वह सही साबित हुआ। और, केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ जो कि कई अर्थशास्त्रियों की नजर में पहले ही से संदिग्ध है) भी संदेह के घेरे में आ चुका है। एनएसएसओ, जिसने पिछले पैंतालीस साल में बेरोजगारी की दर सबसे ज्यादा होने की बात कही है, ने कारपोरेट मंत्रालय के (एमसीए 21) डाटाबेस, जिसे सीएसओ ने इस्तेमाल किया, की हवा निकाल कर रख दी है। इसने बताया है कि एमसीए 21 डाटाबेस की छत्तीस फीसद कंपनियां या तो बंद हो गई हैं, या उनका कोई अता-पता नहीं है!
पिछले कई वर्षों में भारत की अर्थव्यव्स्था आज सबसे कमजोर हालत में है। इसलिए मोदी आर्थिकी को छोड़ कर दूसरी बातें कर रहे हैं। जो लोग 12 मई और 19 मई को वोट डालेंगे, उनके लिए यह खतरे की घंटी है।

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