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दूसरी नजर: गुजरात के भूमिपुत्र

प्नधानमंत्री में अपने चुनाव प्रचार का आरंभ यह कहते हुए किया कि वे ‘गुजरात के बेटे’ हैं, और चेतावनी दी कि कोई भी गुजरात आता है और यहां के भूमिपुत्र के खिलाफ आरोप लगाता है तो उसे राज्य की जनता माफ नहीं करेगी।

Author Updated: December 3, 2017 12:56 AM
गुजरात में रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (एक्सप्रेस फोटो)

प्नधानमंत्री ने भुज (गुजरात) में अपने चुनाव प्रचार का आरंभ यह कहते हुए किया कि वे ‘गुजरात के बेटे’ हैं, और चेतावनी दी कि कोई भी गुजरात आता है और यहां के भूमिपुत्र के खिलाफ आरोप लगाता है तो उसे राज्य की जनता माफ नहीं करेगी। गुजरात में भाजपा का शासन 1995 से है। नरेंद्र मोदी अक्तूबर 2001 में मुख्यमंत्री बने थे, और 2014 में उनके कुर्सी छोड़ने के बाद, उनकी पसंद से दो मुख्यमंत्री बने। इनमें पहला नाम आनंदी बेन पटेल का है, जो मुसीबत साबित हुर्इं। दूसरा नाम विजय रूपाणी का है, जिन्होंने निराश किया है। ऐसे में मोदी के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे खुद को मुद्दा बनाएं और अपने नाम पर वोट मांगें। मेरे खयाल से प्रधानमंत्री का ऐसा करना असामान्य है।

गुजरात अपवाद नहीं
पिछले सत्तावन वर्षों में अन्य राज्यों की तरह गुजरात ने भी प्रगति की है। यह 1991 में शुरू हुए उदारीकरण से लाभ उठाने वाले राज्यों में से एक है। पर गुजरात अपवाद नहीं है।
सितंबर 2013 में डॉ रघुराम राजन की अध्यक्षता वाली एक समिति ने केंद्रीय कोष के आबंटन का तरीका तय करने के मकसद से अट्ठाईस राज्यों की बाबत पिछड़ेपन का एक सूचकांक तैयार किया था। सूचकांक में 0.79 अंक के साथ सबसे कम विकास वाला राज्य ओड़िशा था, और सबसे ज्यादा विकास वाले राज्य थे गोवा (0.05) और केरल (0.15)। गुजरात को 0.50 अंक मिला था, सूचकांक में बीच के स्थान पर, कर्नाटक की लगभग बराबरी करते हुए। ‘इंस्टीट्यूट फॉर कंपटीटिवनेस ऐंड सोशल प्रोग्रेस इंपरेटिव’ द्वारा उनतीस राज्यों की बाबत जारी किए गए सामाजिक प्रगति सूचकांक में गुजरात को ठीक बीच में स्थान मिला है (पंद्रहवां स्थान), चौदह राज्य उससे ऊपर हैं और चौदह राज्य उससे नीचे। ‘बुनियादी मानवीय जरूरतों’ के लिहाज से गुजरात शीर्ष पांच में शामिल है, मगर ‘जन कल्याण की कसौटी’ पर इसे नीचे से पांच में स्थान मिला है, और ‘अवसरों’ के मामले में नीचे से नौवां स्थान।

जन असंतोष

हर राज्य की तरह, गुजरात में भी कई तबके असंतुष्ट हैं। किसान खासकर नाराज हैं। सरदार सरोवर बांध कुशासन की एक मिसाल है। इस परियोजना के तहत 18.45 हेक्टेयर के लक्ष्य के एक चौथाई से भी कम जमीन को सिंचाई के लिए पानी मिल पाया है। तीस हजार किलोमीटर से ज्यादा की नहरों का निर्माण अभी बाकी है। अंतरराष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान के वरिष्ठ फैलो तुषार शाह लिखते हैं: ‘‘पैंतीस साल तक काम होने, 48000 करोड़ रुपए खर्च होने, 45000 परिवारों के विस्थापन, 245 गांवों के डूब जाने और 2,50,000 हेक्टेयर जमीन के अधिग्रहण के बाद भी सरदार सरोवर परियोजना गुजरात के लिए अभी एक वायदा ही है।’’  दूसरे तबकों के अपने-अपने असंतोष हैं। पाटीदार अपने समुदाय के लिए नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में आरक्षण चाहते हैं। दलित और अनुसूचित जनजातियों के लोगों को लगता है कि न सिर्फ उनकी उपेक्षा हो रही है, बल्कि उन्हें हिंसा व उत्पीड़न का शिकार भी बनाया जा रहा है। अल्पसंख्यकों की शिकायत है कि उनके प्रति भेदभाव हो रहा है और उन पर बहुसंख्यकवादी एजेंडा थोपा जा रहा है।

गुजरात में नोटबंदी का समर्थन करने वाले भी मिल जाएंगे और विरोधी भी। जीएसटी के दोषपूर्ण क्रियान्वयन के प्रति उदार रुख रखने वाले लोग भी है, और ऐसे लोग भी- खासकर लघु उद्योग क्षेत्र में, कपड़ा उद्योग और हीरा व्यवसाय में- जो जीएसटी की खामियों और जीएसटी को हड़बड़ी में लागू किए जाने से कुपित हैं। गुजरात सरकार द्वारा की गई नई भर्तियों में शिक्षकों समेत जगह पाने वाले लोग अनुबंध पर नियुक्त किए गए हैं- बहुत कम और वृद्धि-रहित तनख्वाह पर, जो कि संविधान के अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन है। ये असंतोष गुजरात में नए नहीं हैं। इन्हें आवाज देने वाले आंदोलन, संगठन और नेता उभरेंगे। लोकतंत्र इसी तरह से काम करता है। हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवानी और अल्पेश ठाकोर नए नेतृत्व के तौर पर उभरे हैं। उन्हें लोगों से समर्थन मांगने और मौजूदा सरकार का विरोध करने का हक है। वे और किसान, व्यापारी तथा सरकारी कर्मचारी एक भूमिपुत्र के खिलाफ आरोप मढ़ने के लिए ‘गुजरात नहीं आए हैं’। वे भी गुजरात के भूमिपुत्र हैं, जिस प्रकार नरेंद्र मोदी।

असल मुद््दों की अनदेखी

मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं। उन्होंने अच्छे दिन का वायदा किया था। उन्होंने विदेशों में जमा काला धन देश में लाने और हर भारतीय के खाते में पंद्रह लाख रुपए जमा करने का वायदा किया था। उन्होंने हर साल दो करोड़ रोजगार देने का वायदा किया था। उन्हें इन वायदों पर बोलना चाहिए। उन्हें गुजरात की जनता से ताल्लुक रखने वाले मुद््दों पर बोलना चाहिए- सरदार सरोवर बांध पर, उना कांड पर, शहरों और कस्बों में एक खास समुदाय के लोगों पर बंदिशें थोपे जाने पर, गुजरात पेट्रोलियम निगम की वित्तीय स्थिति पर, नैनो कार परियोजना पर, कुपोषित बच्चों पर, स्त्री-पुरुष अनुपात पर, और शराब के अवैध कारोबार के फलने-फूलने पर। उन्हें उन मुद््दों पर भी बोलना चाहिए, जो सारे भारत से ताल्लुक रखते हैं, जैसे किसानों की मुसीबतों पर, दलितों के उत्पीड़न पर, अल्पसंख्यकों के प्रति हो रहे भेदभाव पर, अनुसूचित जनजातियों को वनाधिकार और अन्य अधिकारों से वंचित किए जाने पर, बेरोजगारी पर, महंगाई पर, छोटे उद्यमों के संकट पर, आरक्षण पर, बहुसंख्यकवाद पर, असहिष्णुता पर, तथाकथित नैतिकता या हिंदुत्व के नाम पर होने वाले उत्पात पर, राफाल रक्षा सौदे पर, और जीडीपी की वृद्धि दर पर।

किसी ने भी गुजरात की अस्मिता (गरिमा) को चोट नहीं पहुंचाई है। किसी को भी गुजरात या गुजरातियों से नफरत नहीं है। मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बहुत पहले ही, भारत के लोगों और केंद्र की सरकारों (कांग्रेस की सरकारों सहित) ने महात्मा गांधी से लेकर असंख्य गुजरातियों के योगदान को पहचाना था। गांधीजी एक भारतीय और गुजरात के एक सपूत थे; उन्हें राष्ट्रपिता का दर्जा मिला; और कांग्रेस पार्टी को माध्यम बना कर ही उन्होंने आजादी की लड़ाई की अगुआई की। नेहरू और पटेल हाथ से हाथ मिला कर चलने वाले साथी थे, और यही रिश्ता सरदार के असामयिक निधन तक बना रहा। मोरारजी देसाई, गुलजारीलाल नंदा, विक्रम साराभाई, झवेरचंद मेघानी, त्रिभुवनदास पटेल, आइजी पटेल, और भी कई लोग- गुजराती बोलने वाले पारसियों के अलावा- सम्मानित और प्रसिद्ध लोग थे।

 

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