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दूसरी नजर: भाजपा शासन के बाईस साल बाद गुजरात

1995 से एक के बाद एक भाजपा की सरकारों के बारे में है कि उन्होंने गुजरात की जनता के लिए क्या किया।

Author नई दिल्ली | December 10, 2017 6:46 AM
गुजरात चुनाव: लोगों को संबोधित करते हुए पीएम मोदी (फोटो सोर्स- PTI)

शल मीडिया में सक्रिय एक टिप्पणीकार का दावा है कि उन्होंने हाल में उनतीस रैलियों में दिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी भाषणों का विश्लेषण किया है। इस विश्लेषण में उन्होंने पाया कि राहुल गांधी का जिक्र 621 बार आया, कांग्रेस पार्टी का 427 बार, और गुजरात मॉडल का एक बार भी नहीं! यह एक अतिरंजना या बुरी गिनती भी हो सकती है, पर यह गुजरात में भाजपा के प्रचार अभियान के एक महत्त्वपूर्ण पहलू को उजागर करती है: उसका प्रचार अभियान विकास या अच्छे दिन के बारे में नहीं है; यह कांग्रेस के कथित बुरे दिनों के बारे में है। शायद ही किसी ने सत्तारूढ़ पार्टी के इससे ज्यादा नकारात्मक प्रचार अभियान को देखा हो। कांग्रेस गुजरात में आखिरी बार 1995 में सत्ता में थी। केंद्र में कांग्रेस का कार्यकाल मई 2014 में खत्म हो गया। गुजरात चुनाव राहुल गांधी या कांग्रेस के बारे में नहीं है, यह 1995 से एक के बाद एक भाजपा की सरकारों के बारे में है कि उन्होंने गुजरात की जनता के लिए क्या किया। यह गुजरात की जनता की वर्तमान जरूरतों, बेचैनियों और आशंकाओं के बारे में है।

महंगाई और विकास
उपलब्ध रिपोर्टें और साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि जो चार सबसे प्रमुख मुद््दे गुजरात के मतदाताओं के मन में हैं वे हैं महंगाई (18 फीसद), विकास (तेरह फीसद), बेरोजगारी (11 फीसद) और गरीबी (11 फीसद)। सत्तारूढ़ पार्टी का कोई भी शख्स महंगाई पर नहीं बोलेगा। यह मसला रिजर्व बैंक के लिए छोड़ दिया गया है कि वह इसे समझे और इससे निपटे। और रिजर्व बैंक ने इस पर 5 दिसंबर 2017 को जो कहा वह इस प्रकार है: ‘निकट भविष्य में महंगाई में बढ़ोतरी जारी रह सकती है… अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का क्रम बना रह सकता है…भू-राजनीतिक कारणों से आपूर्ति में कोई बाधा आती है, तो उससे कीमतें और भी चढ़ सकती हैं।’ तीन साल तक सरकार ने कच्चे तेल की कीमतें नीची रहने का अप्रत्याशित लाभ उठाया, पर उपभोक्ताओं को कुछ राहत देने के लिए पेट्रोल और डीजल के दामों में कटौती की मांग बड़ी ढिठाई से अनसुनी कर दी। यह मांग और तीव्र हुई है, और इसका एक स्पष्ट समाधान है, पर सरकार ने, अपनी वित्तीय हालत के चलते, बेरुखी अख्तियार कर रखी है।

स्पष्ट समाधान यह है कि पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के तहत लाएं। अगर मैं गुजरात का मतदाता होता, तो ऐसी पार्टी को वोट देता जो पेट्रोलियम पदार्थों को जीएसटी के तहत लाने और पेट्रोल तथा डीजल के दाम कम से कम दस रुपए प्रति लीटर फौरन कम करने का वादा करती। सत्ताधारी पार्टी का कोई भी शख्स विकास पर नहीं बोलेगा, और अगर इस पर बोलेगा भी, तो बुलेट ट्रेन के बारे में, जिस पर नब्बे फीसद लोग कभी भी सवार नहीं होंगे। या वह सरदार सरोवर बांध के बारे में बोलेगा, जिसका पानी जलाभाव से जूझ रहे सौराष्ट्र और अन्य जिलों तक नहीं पहुंच सकता, क्योंकि नहर-निर्माण का अधिकांश कार्य (30,000 किलोमीटर) पिछले बाईस वर्षों में पूरा नहीं हो पाया है। इसलिए हैरत की बात नहीं कि गुजरात के लोग कहते हैं कि ‘विकास गांडो थयो छे’ (विकास पागल हो गया है)। अगर मैं गुजरात का मतदाता होता, तो ऐसी पार्टी को वोट देता, जो सरदार सरोवर परियोजना की नहरों के तेजी से निर्माण, हाइवे और हर मौसम में टिकी रहने वाली सड़कें बनाने, शहरों की सड़कों की मरम्मत और देखरेख, और हर अंचल में हवाई अड््डा बनाने का वादा करती।

बेरोजगारी और गरीबी

भाजपा का कोई भी आदमी बेरोजगारी पर नहीं बोलेगा। भाजपा रोजगार कार्यालयों में दर्ज कम आंकड़ों की बात करेगी। यह आत्मघाती है। बेरोजगारी बहुत व्यापक है और कोई यह आशा नहीं करता कि रोजगार कार्यालय में दर्ज भर हो जाने से उसे काम मिल जाएगा। इसमें यह तथ्य भी जोड़ दें कि (गुजरात और बाकी देश में भी) नोटबंदी और दोषपूर्ण जीएसटी के चलते छोटे और मझोले उद्यमों पर जो गाज गिरी, उसके फलस्वरूप हजारों लोगों को अपनी रोजी-रोटी से हाथ धोना पड़ा। यह समझना मुश्किल नहीं है कि क्यों हजारों युवा गुजरात के दिलेर युवा नेताओं के पीछे भाग रहे हैं। अगर मैं गुजरात का मतदाता होता, तो ऐसी पार्टी को वोट देता जो सरकार में हजारों खाली पड़े पदों को भरती (और उचित वेतन देती, न कि एक नियत राशि) तथा सूक्ष्म, लघु व मझोले उद्यमों को प्रोत्साहन देती ताकि वे फले-फूलें और रोजगार पैदा करें। गुजरात में भाजपा की सरकार ने गरीबों से मुंह मोड़ लिया है। वरना मानव विकास सूचकांक में गुजरात के निराशाजनक स्थान या बच्चों के स्वास्थ्य, साक्षरता, स्त्री-पुरुष अनुपात और सामाजिक क्षेत्र के कार्यक्रमों पर प्रतिव्यक्ति खर्च में कई राज्यों से गुजरात के पीछे रहने की क्या वजह हो सकती है! अगर मैं गुजरात का मतदाता होता, तो ऐसी पार्टी को वोट देता, जो गरीबों और मध्यवर्ग के लोगों की सुध लेती और अपना समय तथा अपने संसाधन उनकी वास्तविक समस्याओं से निपटने में लगाने का संकल्प करती, चाहे उनकी जाति या धर्म कुछ भी हो।

चुनाव और जवाबदेही

यह स्वीकार करने में मुझे तनिक गुरेज नहीं कि विकास और रोजगार और महंगाई जैसे मुद््दे सारे राज्यों में समान महत्त्व रखते हैं। अतीत में भी सत्तारूढ़ पार्टियों ने असली मुद््दों से कन्नी काटने के प्रयास किए थे, पर समझदार मतदाताओं ने सरकार बदल दी। और हर चुनाव के साथ मतदाता और समझदार होते गए हैं। भाजपा जिन बातों की तरफ बहस का रुख मोड़ना चाहती है वे हैं हिंदुत्व, अयोध्या, निजी कानून, गोरक्षा, उग्र राष्ट्रवाद और समाज में मौजूद दरारें। प्रधानमंत्री हमेशा इनमें से कोई एक या एक से अधिक मुद््दे चुन लेंगे और ऐसी टिप्पणी करेंगे जो उस दिन की सुर्खियां बन जाएगी। मीडिया एक कड़वी बहस शुरू कर देगा। शुक्र है कि फिलहाल कोई पार्टी इस जाल में नहीं फंसी है और विकास, रोजगार, महंगाई जैसे मुद््दों पर अपना ध्यान केंद्रित रखा है।
कोई भी चुनाव परिणाम की भविष्यवाणी नहीं कर सकता। बिहार के चुनाव नतीजे जनमत-सर्वेक्षणों के विपरीत आए थे। यही उत्तर प्रदेश में भी हुआ। हम सिर्फ उम्मीद कर सकते हैं कि गुजरात की खातिर और सोलह महीनों बाद केंद्र में बेहतर शासन की खातिर, गुजरात के मतदाता इस बात को ध्यान में रखेंगे कि चुनाव जवाबदेही सुनिश्चित करने का मौका होता है।

 

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