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दूसरी नज़र : एक तथ्यात्मक जमीनी रिपोर्ट

बड़े कर्ज संबंधित बैंक के निदेशक बोर्ड की समिति द्वारा मंजूर किए गए हैं। एनपीए में परिणत हुए प्रत्येक बड़े कर्ज को अब शक की निगाह से देखा जा रहा है।

Author नई दिल्ली | April 10, 2016 1:22 AM
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (File Photo)

भिन्न-भिन्न स्रोतों से आंकड़े आ रहे हैं, और इनसे एक चीज साफ है: निकट भविष्य में निवेश में बढ़ोतरी नहीं होने जा रही। वर्ष 2008-09 में बाईस लाख करोड़ रुपए के नए निवेश के प्रस्ताव थे, जो गिर कर 2014-15 में दस लाख चौंसठ हजार करोड़ रुपए के और 2015-16 में आठ लाख करोड़ रुपए के रह गए। निवेश के लिए उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के सरकार के प्रयासों के बावजूद ऐसी स्थिति क्यों है? मुझे वे वजहें बताने दें, जो कारोबारियों, बैंकरों तथा नौकरशाहों से अपनी बातचीत में मुझे पता चली हैं।

1. ठप परियोजनाएं: हर बड़े व्यावसायिक घराने की कम से कम एक परियोजना जरूर अटकी हुई है। कंपनी का मालिक उसे संकट से निकालने के लिए जद्दोजहद कर रहा है। हालांकि पिछले चार सालों में कई परियोजनाएं पटरी पर लाई जा सकी हैं, पर इससे अधिक तादाद उन परियोजनाओं की है जो इसी अवधि में पटरी से उतर गर्इं। हर साल के मार्च के अंत में ठप परियोजनाओं के आंकड़े सीएमआईई ने दिए हैं: 2014 में 766, 2015 में 816, 2016 में 893।

मैं इस बात को लेकर हैरत में हूं कि निवेश संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति के तहत बने परियोजना निगरानी समूह (पीएमजी) को आखिर क्या हो गया है? जब तक अनिल स्वरूप (अब कोयला मंत्रालय के सचिव) इस समूह के अध्यक्ष थे, प्रगति दिखती थी। उनके हटने के बाद, लगता है पीएमजी ने अपनी ऊर्जा गंवा दी है। जब तक ठप परियोजनाएं पटरी पर नहीं आतीं, निवेशक नए निवेश के लिए तैयार नहीं होंगे।

गैर-नीतिगत बाधाएं

2. सरकारी जड़ता: सीएमआईई और एचएसबीसी द्वारा पेश किए गए आंकड़े बताते हैं कि पचपन फीसद ठप परियोजनाओं के पीछे ‘गैर-नीतिगत’ कारण हैं। भूमि अधिग्रहण, पर्यावरणीय स्वीकृति, गैर-पर्यावरणीय मंजूरी और र्इंधन/रसद की आपूर्ति आदि ‘नीतिगत’ वजहों के तौर पर चिह्नित हैं। बाजार की प्रतिकूल स्थितियां, परियोजना शुरू करने वाले की अरुचि, फंड की कमी और अन्य कारण ‘गैर-नीतिगत’ वजहों में गिने जाते हैं। मैं यह जान कर हैरत में पड़ गया कि अरुचि (सोलह फीसद) और फंड की कमी (चार फीसद) के चलते बीस फीसद सरकारी परियोजनाएं ठप हैं। अगर सरकार अपनी ही परियोजनाओं पर ध्यान दे और उनसे जुड़ी दिक्कतें दूर कर दे, तो इतने से भी बड़ी मात्रा में निवेश को परिणामकारी बनाया जा सकता है।

3. एनपीए का भय: गैर-निष्पादित संपत्तियां (नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स) कोई नई चीज नहीं हैं। हाल के वर्षों में देखें तो एनपीए की समस्या 2002 और 2008 में बहुत गंभीर हो गई थी। कर्ज बैंक देते हैं, लिहाजा उनकी वसूली के लिए बैंकों को जरूर कहा जाना चाहिए। लेकिन उत्पीड़न का भय दिखाने और एनपीए के हर मामले को उसी नजर से देखने की कोई जरूरत नहीं है।

एनपीए को दो श्रेणियों में बांटा जा सकता है- एक, जान-बूझ कर कर्ज न चुकाने वाले (विलफुल डिफाल्टर्स), और दूसरे, प्रतिकूल आर्थिक परिस्थितियों के शिकार। एनपीए वाले ज्यादातर छोटे और मझोले उद्यमी दरअसल पीड़ित हैं, खलनायक नहीं। जब तक प्रभावित सेक्टरों में वृद्धि का दौर शुरू नहीं हो जाता, उन्हें सरकार और बैंकों की तरफ से सहारे की जरूरत है। बैंकों के मुखिया वैसा जरूर करेंगे, अगर उन्हें अकेला छोड़ दिया जाए और उनकी लानत-मलामत न की जाए। और उचित समय पर उन कर्जों की वसूली की जाएगी।

इरादतन कर्ज न चुकाने वालों की श्रेणी अलग है। बैंक प्रमुखों को सख्त निर्देश दिया जाना चाहिए कि वे व्यक्तिगत गारंटी समेत सभी उपाय आजमाएं, और वे अपना काम जरूर करेंगे।

एनपीए को लेकर जन-उत्तेजना भड़काने के क्या परिणाम होंगे, यह और कोई समझता हो या नहीं, रिजर्व बैंक के गवर्नर को जरूर इसका भान है, तभी तो उन्होंने चेताया है कि निर्ममता भरा रुख ‘उद्यमिता और कर्ज दोनों को मार डालेगा।’

ब्याज दर की भूमिका
4. ब्याज दर और ऋण वृद्धि: कोई कुछ भी कहे, निवेशक ब्याज दर के आधार पर अपने लाभ का हिसाब लगाता है। अगर उसे ऊंची ब्याज दर चुकानी पड़ती है, तो उसे लगता है कि मिलने वाला लाभ बहुत कम होगा। ऐसे में वह कहेगा कि नए निवेश का जोखिम क्यों उठाएं? इसीलिए यह माना जाता है कि अगर ब्याज दर नीची हो तो उससे निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा। नीतिगत दरों में कटौती के मामले में रिजर्व बैंक की अपनी सीमाएं हैं, फिर कर्ज पर ब्याज दरें घटाने में बैंकों की अपनी मुश्किलें हैं (जमा वृद्धि बनाम ऋण वृद्धि)। इसका कोई आसान हल नहीं है। इसके बावजूद, सरकार को हल निकालना ही चाहिए, भले वह कुछ सेक्टरों के लिए ही क्यों न हो, और प्रभावित सेक्टरों की क्षतिपूर्ति के लिए (टैक्स, छूट, सबसिडी जैसे) कुछ दूसरे तरीके भी आजमाने चाहिए। कुछ न करना कोई विकल्प नहीं है।

औद्योगिक ऋण की हकीकत क्या है? फरवरी 2015 और फरवरी 2016 के बीच औद्योगिक ऋण वृद्धि 5.36 फीसद थी, जो कि पिछले पांच वर्षों की औसत दर (13.66 फीसद) के आधे से भी कम है। इसका मतलब है कि अतिरिक्त ऋण लगभग एक लाख चालीस हजार करोड़ रुपए था। अतिरिक्त ऋण का 83 फीसद केवल इन्फ्रास्ट्रक्चर (59 फीसद) और इस्पात (24 फीसद) को चला गया। अन्य सभी सेक्टरों के हिस्से में केवल सत्रह फीसद आया। बड़े उद्योगों को एक लाख अड़तालीस करोड़ का अतिरिक्त ऋण मिला, जबकि छोटे तथा मझोले उद्योगों को महज आठ हजार करोड़ रुपए का। ये आंकड़े छोटे तथा मझोले उद्योगों को ऋण सहायता के सरकारी दावों से एकदम बेमेल हैं। इन मसलों पर फौरन ध्यान देने और इन्हें जल्दी से जल्दी सुलझाने की जरूरत है।

शक का माहौल
5. शक और संदिग्ध व्यक्तियों की तलाश: बड़े कर्ज संबंधित बैंक के निदेशक बोर्ड की समिति द्वारा मंजूर किए गए हैं। एनपीए में परिणत हुए प्रत्येक बड़े कर्ज को अब शक की निगाह से देखा जा रहा है, और बैंक प्रमुखों के मुताबिक, कसूरवार की खोज हो रही है। लिहाजा, कोई बैंक बड़ा कर्ज मंजूर करने को इच्छुक नहीं है, कोई बैंक-प्रमुख बैंक के एनपीए को किसी परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी को रियायती दर पर बेचने को तैयार नहीं है। बगैर सोचे-समझे की गई घोषणाओं ने शक का ऐसा माहौल बना दिया है कि हर बैंक-प्रमुख चुपचाप सेवानिवृत्त हो जाना चाहता है।

सरकार की मंशा अच्छी होगी, पर यह पर्याप्त नहीं है। जैसी कि कहावत है, नरक का रास्ता अच्छे इरादों से पटा है। सरकार को चाहिए कि वह हिम्मत से समस्याओं का सामना करे और कठिन निर्णय ले। नए निवेश को प्रोत्साहित करने का यह एकमात्र उपाय है।

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