ताज़ा खबर
 

पी. चिदंबरम का कॉलम दूसरी नज़र : आईने पर नाहक नाराजगी

साढ़े सात फीसद की जीडीपी वृद्धि दर के साथ भारत की स्थिति ‘अंधों में काना राजा’ जैसी है।

Author नई दिल्ली | April 24, 2016 8:56 AM
आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन (पीटीआई फाइल फोटो)

आईने पर नाहयह सरकार तुनुकमिजाज है। इसे वहां भी भूत नजर आता है, जहां कोई नहीं होता। यह मित्रवत और तटस्थ टिप्पणीकारों को भी दुश्मन मान बैठती है। और इसके पास ऐसे लोग हैं जो बगैर आदेश के भी गोली दागने को तैयार रहते हैं (अफस्पा यानी ए.एफ.एस.पी.ए. के राजनीतिक संस्करण के तहत- ऐंग्री फ्रेंड्स स्पेशल पॉवर्स ऐक्ट)।

आखिर रिजर्व बैंक के गवर्नर डॉ रघुराम राजन ने ऐसा क्या कह दिया कि वाणिज्यमंत्री बिफर पड़ीं? उन्होंने यही तो कहा था कि साढ़े सात फीसद की जीडीपी वृद्धि दर के साथ भारत की स्थिति ‘अंधों में काना राजा’ जैसी है। सरकार को खुश होना चाहिए था कि रिजर्व बैंक के गवर्नर ने जीडीपी वृद्धि दर के उसके अनुमान की पुष्टि की है।

दो पैमाने
अगर सिर्फ जीडीपी वृद्धि दर के लिहाज से देखें तो बड़े आकार वाली अर्थव्यवस्थाओं में भारत अव्वल है। लेकिन जीडीपी वृद्धि दर और अन्य आर्थिक संकेतकों के बीच एक खाई दिखती है। यहां वर्ष 2015-16 की तुलना दो ऐसे वर्षों से करें जब जीडीपी की वृद्धि दर लगभग समान थी, फिर फर्क साफ नजर आएगा:
1999-2000 2004-05 2015-16
जीडीपी वृद्धि दर 7.59 6.97 7.3 (नई सीरीज)

कुल पूंजी निर्माण
की वृद्धि दर 7.93 23.98 5.3
निर्यात 10.64 30.7 -15.82
आयात 3.26 41.69 -4.16
औद्योगिक वृद्धि दर 6.62 11.00 2.61 (फरवरी 2015 से फरवरी 2016)

गैर-खाद्य ऋण की
वृद्धि दर 16.55 31.62 11.48 (फरवरी 2015 से फरवरी 2016)
बैंक जमा वृद्धि दर 13.91 13.01 10.27 (फरवरी 2015 से फरवरी 2016)
महंगाई 3.4 2.4 4.83

यह हो सकता है कि बड़े आकार की अर्थव्यवस्थाओं में 2016 में भारत की वृद्धि दर सबसे अधिक हो। उसके बाद इस कतार में 6.5 फीसद की दर के साथ चीन (ऐसे आधार (बेस) पर जो कि पांच गुना ज्यादा है!) और 6.3 फीसद की दर के साथ फिलीपींस का स्थान है। ब्रिक्स देशों में ब्राजील (-3.6) और रूस (-1.5) की वृद्धि दर ऋणात्मक रहने और दक्षिण अफ्रीका की वृद्धि दर बहुत मामूली रहने (0.7 फीसद) का अनुमान है। कच्चे तेल के दामों में आई जबर्दस्त गिरावट से भारत को अप्रत्याशित लाभ हुआ, पर ब्राजील और रूस को इससे भारी नुकसान उठाना पड़ा है।

दूसरी दृष्टि
एक दृष्टि से सब कुछ चमकदार है, अगर हम जीडीपी वृद्धि दर, विदेशी निवेश और महत्त्वाकांक्षा की दृष्टि से देखें। पर एक दूसरी दृष्टि भी है जो मानती है कि राजकोषीय स्थिरता, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधा, महंगाई नियंत्रण, गरीबी मिटाने जैसे पैमाने भी एक स्वस्थ और उभरती हुई अर्थव्यवस्था के लिए उतने ही अहम हैं। इस दृष्टि से भारत की स्थिति शोचनीय है।

उदाहरण के लिए, बजट के आय-व्यय की तुलना (बैलेंस) को देखें। ‘द इकोनॉमिस्ट’ पत्रिका ने बयालीस अहम देशों के अध्ययन में पाया कि भारत का राजकोषीय घाटा (-3.9 फीसद) इनमें से तैंतीस देशों से ज्यादा था। हमें राजकोषीय स्थिरता के रास्ते पर अभी लंबा सफर तय करना है।

भारत में हालांकि नवंबर 2013 से महंगाई में गिरावट आनी शुरू हुई, पर तुलनात्मक रूप से इसकी दर अब भी ऊंची है। यहां की महंगाई दर 5.2 फीसद के साथ उन सभी देशों से अधिक है जिनके बारे में ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने आंकड़े इकट्ठा किए, सिर्फ दक्षिण अफ्रीका (6.2), ब्राजील व तुर्की (8.3), रूस (8.4) और मिस्र (8.8) को छोड़ कर।

बेरोजगारी एक अहम संकेतक है। जनवरी 2015 में आए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इसकी दर 4.9 फीसद है, जो कि अर्धरोजगार, उत्पादक श्रम की अल्प भागीदारी, स्त्री-पुरुष विषमता और असंगठित क्षेत्र के फैलाव को देखते हुए वास्तविकता से कम आकलन ही कहा जाएगा।

भारत में आधारभूत ब्याज दर (दस साल के सरकारी बांड पर) 7.44 फीसद है, जो कि तमाम अग्रणी और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के बरक्स बहुत ज्यादा है। ऊंची ब्याज दर वाली अर्थव्यवस्थाएं लड़खड़ा रही हैं- यूनान, रूस, तुर्की, पाकिस्तान, ब्राजील, कोलंबिया, वेनेजुएला और दक्षिण अफ्रीका। ऊंची ब्याज दर प्रतिस्पर्धा को खा जाती है।

इस पर मैं अलग से एक स्तंभ लिखूंगा कि मानव विकास के मानकों पर भारत अपने समकक्षों से कितना पीछे है।

व्यावहारिक गवर्नर
डॉ राजन ने जीडीपी की वृद्धि दर को ही सब कुछ नहीं माना तो इसकी वजह है। वे वृद्धि दर के प्रति हिकारत जाहिर नहीं कर रहे थे, वे सरकार को नम्रता से याद दिला रहे थे कि बहुत कुछ किया जाना बाकी है। उनके सुर में सुर मिलाते हुए मैं भी सरकार को याद दिलाना चाहूंगा कि यूपीए के दस साल के कार्यकाल में पांच साल वृद्धि दर 8.5 फीसद से अधिक थी। दस साल का औसत 7.54 फीसद था (पुरानी सीरीज)। साढ़े सात फीसद की दर (नई सीरीज) प्रभावशाली है, पर यही सब कुछ नहीं है।

डॉ राजन यह व्याख्या करने को बाध्य नहीं थे कि उनके कहने का क्या मतलब था, पर कुछ दिन बाद उन्होंने अपनी बात पूरी तरह साफ कर दी और अपने आलोचकों को याद दिलाया कि केंद्रीय बैंक के गवर्नर को ‘व्यावहारिक होना पड़ता है, वह खुशफहमी में नहीं रह सकता।’ वाणिज्यमंत्री का राजधर्म यह है कि वे अपना सारा वक्त और सारी ऊर्जा देश के व्यापार क्षेत्र की समस्याएं सुलझाने मे लगाएं, जिसकी हालत यह है कि 2014-15 के मुकाबले 2015-16 में निर्यात सोलह फीसद कम हो गया। इसके चलते चालू खाते का घाटा और बढ़ गया, लाखों लोगों की रोजी-रोटी पर संकट आ गया, और हजारों छोटे तथा मझोले उद्यमों पर एनपीए की श्रेणी में आने तथा बंद होने का खतरा मंडराने लगा।

डॉ राजन के शब्दों के चयन को लेकर नाहक विवाद हो रहा है, जबकि वाणिज्यमंत्री की खामोशी अखरने वाली है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App