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पी. चिदंबरम का कॉलम : स्वच्छता अभियान की खामियां

‘स्वच्छ भारत’ या ‘क्लीन इंडिया’ कोई नारा या मजमा नहीं हो सकता। इसे एक आदत बल्कि एक जुनून में बदलना होगा।
Author नई दिल्ली | June 5, 2016 04:29 am
पूर्व केन्‍द्रीय वित्‍त मंत्री का पूरा नाम पालानियप्‍पन चिदम्‍बरम है। (EXPRESS ARCHIVE)

‘स्वच्छ भारत’ या ‘क्लीन इंडिया’ कोई नारा या मजमा नहीं हो सकता। इसे एक आदत बल्कि एक जुनून में बदलना होगा। इस योजना के कई कारक हैं, मसलन लोगों का व्यवहार, सामाजिक ढांचा, टेक्नोलॉजी, पैसा, कार्यान्वयन, प्रशासन।निर्मल भारत अभियान, इन्हीं और कई दूसरे कारकों को ध्यान में रखते हुए, खुले में शौच को 2017 तक समाप्त करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। कार्यान्वयन के शुरुआती महीनों में ही, अपने निर्वाचन क्षेत्र में, इस योजना की खामियां मुझे दिख गर्इं।

गांव का सामाजिक ढांचा

शिवगंगा मुख्य रूप से ग्रामीण आबादी वाला लोकसभा क्षेत्र है, जिसमें छह सौ सत्ताईस पंचायतें, सोलह टाउन पंचायतें और तीन छोटे शहरी निकाय हैं। वहां अधिसंख्य आबादी गांवों में रहती है। एक पंचायत में औसतन पांच या छह गांव और कुछ पुरवे होते हैं।

आमतौर पर गांव में बसावट और पास-पड़ोस जाति के हिसाब से होते हैं। हर जाति-समूह अमूमन औरों से अलग-थलग रहता है। दलित हमेशा अपनी बस्ती में रहते आए हैं। जाति की भावना मुखर रहती है, पर जातिगत टकराव के मौके कम ही आते हैं। गांव के लोगों को गुजारे के लिए साथ रहना और साथ काम करना पड़ता है।

कुछ साल पहले तक ज्यादातर गांवों में शौचालय नहीं होते थे। लोग खुले में शौच करते थे। कोई नहीं सोचता था कि खुले में शौच करना गलत, सेहत के लिहाज से नुकसानदेह और शर्मिंदगी का विषय है। इसका सबसे हानिकाकर असर कृमिरोग या आंत के रोग के रूप में बच्चों पर पड़ता है, इससे उनका विकास बाधित होता है।

मिट्टी के घरों की जगह पक्के मकान बनने लगे तो कुछ मकानों में शौचालय भी हो गए। शहरों या बड़े शहरों में काम करने वाले ग्रामीण युवा लौटते तो चाहते कि घर में शौचालय हो, लिहाजा इसे बनाने में उन्होंने मदद की। परिवार के अधिकतर सदस्य शौचालय का इस्तेमाल करने लगे। छोटे बच्चों ने वैसा नहीं किया और बहुत-से स्त्रियां व पुरुष खुले में ही शौच करना पसंद करते थे।

गांव के सामाजिक ढांचे तथा टेक्नोलॉजी, पैसा, कार्यान्वयन क्षमता व प्रशासन की सीमाओं को देखते हुए सरकार, शौच के संदर्भ में, अपने नागरिकों के व्यवहार को बदलने का उपक्रम कैसे करती है? यह सोचा गया था कि निर्मल भारत अभियान इस सवाल का जवाब साबित होगा। पर वैसा नहीं हुआ। इस अभियान के तहत बनाए गए शौचालयों में तीस फीसद अनुपयोगी रहे। स्वच्छ भारत अभियान भी संबंधित सवालों के जवाब नहीं दे पाया है।

सबसिडी आधारित मॉडल

शौचालयों की कमी की समस्या के दो समाधान हैं- निजी (घरेलू) शौचालय या सामुदायिक (सार्वजनिक) शौचालय। दोनों की हकीकत देखें।

घरेलू शौचालय निकासी-व्यवस्था से जुड़ा हुआ नहीं हो सकता है, क्योंकि गांव में ऐसी व्यवस्था अमूमन नहीं होती। लिहाजा, शौचालय को गड्ढे से जोड़ना जरूरी हो जाता है। गड्ढे को समय-समय पर खाली करना पड़ता है। आमतौर पर शौचालय में पानी का नल नहीं होता, इसलिए पानी वहां ले जाना पड़ता है। अगर पानी की कमी हो या पानी दूर से लाना पड़े तो कम लोग ही शौचालय का इस्तेमाल करेंगे। अगर बच्चों समेत पूरा परिवार शौचालय का इस्तेमाल करे, तो रोजाना उसकी सफाई आवश्यक होगी, फिर और भी पानी की जरूरत पड़ेगी।

विकल्प है सामुदायिक (सार्वजनिक) शौचालय। मगर इसे गांव के लिए बनाने से पहले निम्नलिखित सवालों पर जरूर विचार किया जाना चाहिए:

1. सार्वजनिक शौचालय केवल सरकारी या अधिग्रहीत की गई जमीन पर बनाया जा सकता है। अगर वह स्थान किसी बसावट के बीच में है, तो क्या सभी जाति-समूहों की रोजाना की पहुंच में है?

2. अगर सार्वजनिक शौचालय दलित बस्ती में या उसके आसपास बना हो, तो क्या दूसरे जाति-समूह उसका इस्तेमाल करेंगे?

3. चूंकि सार्वजनिक शौचालय का इस्तेमाल हर समय होता रहेगा, ऐसे में चौबीसों घंटे पानी की सप्लाई ग्राम पंचायत कैसे सुनिश्चित करेगी?

4. सार्वजनिक शौचालय को साफ रखने की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत पर होगी, पर इस मकसद के लिए पंचायत किसको काम पर लगाएगी? इसका जवाब इक्कीसवीं सदी के भारत की एक ऐसी हकीकत है जिसे बयान करना मुश्किल है, और जवाब आप जानते हैं। गांवों में सार्वजनिक शौचालयों की सफाई का काम करने के लिए बहुत कम लोग तैयार होंगे।
5. सार्वजनिक शौचालय के इस्तेमाल के एवज में पैसा लिया जाए, या यह मुफ्त हो?

तमिलनाडु में सरकारों ने गांवों में सार्वजनिक शौचालय बनाने की योजना चलाई। मैंने पाया कि ऐसे अधिकतर शौचालय एकदम उपेक्षित, बिना इस्तेमाल के थे या उनका इस्तेमाल जानवर बांधने या दारू व जुए के अड््डे के तौर पर हो रहा था।

हैरानी का विषय नहीं
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन के एक सर्वे के इन तथ्यों को पढ़ कर मुझे तनिक ताज्जुब नहीं हुआ कि 2013-14 से लगभग 2.40 करोड़ घरेलू शौचालय बनाए गए हैं, पर 8.60 करोड़ शौचालय अभी बनाए जाने बाकी हैं। ग्रामीण भारत में सत्तावन फीसद शौचालय बगैर पानी की सुविधा के हैं। फिर, इनमें से चौवालीस फीसद शौचालय जल-मल निकासी की सुविधा से रहित हैं और ‘यह माना जा सकता है कि उन घरों में रहने वाले उन शौचालयों का इस्तेमाल नहीं करते होंगे।’ जो शौचालय जल-मल निकासी की ‘व्यवस्था’ से जुड़े थे वहां इसकी परिणति किसी स्थानीय तालाब, नाले या नदी में गंदगी गिराने में होती थी!

शौचालय-निर्माण कार्यक्रम को तीन क्षेत्रों में निवेश की जरूरत है- सूचना, शिक्षा और संचार में। पर जो धन मुहैया कराया गया वह बहुत कम है (इस कार्यक्रम का महज आठ फीसद)। सबसिडी आधारित मॉडल की तीखी आलोचना हुई है। बांग्लादेश ने समुदाय आश्रित समग्र स्वच्छता (सीएलटीएस) मॉडल अपनाया है और शानदार नतीजे हासिल किए हैं। अगर भारत को खुले में शौच की आदत या प्रवृत्ति को 2019 तक समाप्त करना है तो उसे अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना चाहिए।

निर्मल भारत अभियान अपने लक्ष्य तक पहुंचने में नाकाम रहा, पर कम से कम, यह जनसंपर्क की कवायद में तो नहीं बदला। स्वच्छ भारत अभियान अब तक एक मजमा ही रहा है, जो मजमों के सिलसिले की एक कड़ी ही जान पड़ता है। इतने माहिर मजमा-प्रबंधक बहुत मुद््दत बाद देश ने देखे हैं।

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  1. B
    Bijaya Dixit
    Jun 5, 2016 at 12:19 am
    क्लीन कांग्रेस fabricated हिस्ट्री फर्स्ट policy_of_Nepal?id=P7F97tA4SiEC
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    Reply
    1. S
      Surender
      Jun 5, 2016 at 1:48 pm
      Galat bat Mr.Chidambaram Saheb ya to aapko gaon ka dhang ka pata nhi h ya fer khali bathe koi kam nhi h.Aap tantion na le yuth upgrade ho choki hai.
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      1. आरिफ़
        Jun 5, 2016 at 8:20 am
        बहुत ही अच्छा लेख! सरल शब्दों में निर् भारत/स्वच्छ भारत अभियान की तार्किक खामियों को क्रमबद्ध तरीके से उभारा गया है।
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        Reply