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‘दूसरी नजर’ कॉलम में पी. चिदंबरम का लेख- आर्थिक सुधार: अंक एक, दृश्य एक

यह सोचना गलत है कि आर्थिक सुधार का मतलब कुछ घोषणाएं या किसी नीति में हेरफेर का कौशल है। बदलाव व्यापक आर्थिक व सामाजिक सोच को ध्यान में रख कर किए जाने चाहिए।

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पच्चीस साल पहले भारत की जनता भय और निराशा की मन:स्थिति में थी। देश एक चुनाव के बीच में था। दो सौ इक्कीस लोकसभा क्षेत्रों में वोट पड़ चुके थे, बाकी में पड़ने थे। एक बम धमाके के जरिए 21 मई, 1991 को राजीव गांधी की हत्या कर दी गई थी, और शेष निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव रोक दिए गए थे। जब जून में उन क्षेत्रों में चुनाव हुए, लोगों का मन कांग्रेस की तरफ था। अंत में, कांग्रेस को 226 सीटें हासिल हुर्इं, पर वह नेता-विहीन थी, बहुमत से कुछ दूर भी।

इस बीच अर्थव्यवस्था लड़खड़ा रही थी। 1991 के मार्च माह के अंत तक, विदेशी मुद्रा भंडार में अपूर्व कमी आ चुकी थी, वह सिर्फ 5.8 अरब डॉलर था, और दिन-ब दिन गिरता जा रहा था। नामालूम क्या हो, यह डर तरफ छाया हुआ था।

अप्रत्याशित चयन
जैसा कि एकमात्र जवाबदेह और अनुभवी पार्टी को करना चाहिए, कांग्रेस ने इस अवसर को समझा। गजब की एकता और परिपक्वता दिखाते हुए कांग्रेस ने नेता के चयन के लिए चुनाव की प्रक्रिया अपनाई, पीवी नरसिंह राव ने आसानी से शरद पवार को मात दे दी, और एक नई सरकार ने 21 जून, 1991 को शपथ ली।

यह वैसी ही सरकार थी, जैसी अमूमन कांग्रेस की सरकार होती थी, पुरानी पीढ़ी व नई पीढ़ी का मिश्रण तथा समुदाय और क्षेत्र के प्रतिनिधित्व का संतुलन। यह इसी मायने में अलग थी कि प्रधानमंत्री बहुत कम बोलने वाले, निहायत नम्र, सीधे-सादे दिखने वाले शख्स थे, जो देश की जनता के लिए काफी हद तक ‘अनजान’ थे। वित्तमंत्री के नाम पर भौंहें तन गर्इं- डॉ मनमोहन सिंह, एक अर्थशास्त्री व नौकरशाह, जिन्होंने कई अहम सरकारी पदों पर निहायत खामोशी से काम किया था।

नई सरकार का पहला सप्ताह अपूर्व खामोशी में बीता। कांग्रेस खुश थी कि वह सत्ता में वापस आ गई, पर जलसे नहीं हो रहे थे। मंत्रिमंडल की पहली बैठक में कैबिनेट सचिव से नरसिंह राव का यह सवाल मुझे बड़ा दिलचस्प लगा था: ‘क्या आपने हरेक के लिए घोड़ा/गाड़ी का इंतजाम किया है?!’ सरकार से कोई विशेष उम्मीद नहीं की जा रही थी, और यह तो निश्चित रूप से किसी को अनुमान नहीं था कि कुछ दिनों में एक क्रांति का आगाज होने वाला है।

मेरा खयाल है कि बाहरी घटनाएं इतनी तेजी से और लगातार घटित हो रही थीं कि सरकार कार्रवाई के लिए बाध्य हो गई। यह विरल सौभाग्य की बात थी कि तीन काबिल शख्स नीति निर्धारक पदों पर थे, डॉ सिंह वित्तमंत्री के तौर पर, असाधारण मेधावी एस वेंकटरामनन रिजर्व बैंक के गवर्नर के तौर पर, और असाधारण क्षमता वाले डॉ आर रंगराजन डिप्टी गवर्नर केतौर पर।

खामोश, पर साहसिक शुरुआत
विदेशी मुद्रा भंडार के रसातल में चले जाने पर सरकार के सामने अधिकृत विनियम दर को ‘दुरुस्त’ करने के सिवा कोई चारा नहीं था, जो कि अवमूल्यन का मीठा पर्याय है। चतुराई के साथ, रिजर्व बैंक ने इसे दो चरण में करने का तय किया- पहला 1 जुलाई 1991 को (संभावित प्रतिक्रियाओं का जायजा लेने के लिए), और दूसरा, 3 ज्ुालाई को। पहली ‘दुरुस्ती’ पर लोग खामोश रहे, पर ‘प्रतिष्ठान’ ने अरुचि दिखाई। नरसिंह राव दूसरे चरण की कार्रवाई रद्द करना चाहते थे, पर चालाकी से डॉ रंगराजन ने दिल्ली से आने वाली फोन कॉलों के लिए खुद को ‘अनुपलब्ध’ कर लिया (तब मोबाइल फोन नहीं था), बहुत संभव है कि यह उन्होंने डॉ मनमोहन सिंह की सहमति से किया हो!

इस तरह वह धमाकेदार शुरुआत हुई, जिसके बारे में दुनिया मानती है कि वह भारत के आर्थिक इतिहास में एक नए युग का आगाज था।
बीते पच्चीस सालों ने भारत का चेहरा बदल दिया है और करोड़ों लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है। मैं भाग्यशाली हूं कि इस नाटक के- जो आज भी जारी है- विभिन्न अंकों में भूमिका निभाने का मौका मिला। पटकथा कमोबेश वही है, सिर्फ अहम किरदार समय-समय पर बदल गए।
दूसरा फर्क यह है- और वास्तव में यह बड़ा फर्क है- कि जब आर्थिक नीति में वे अत्यंत महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए जा रहे थे- सरकार शोर-शराबे से दूर थी और उसने न तो कोई ड्रामा किया न ही बेकार के प्रचार में अपनी ऊर्जा झोंकी। सुनियोजित जलसे नहीं किए गए, पूरे-पूरे पेज के विज्ञापन भी नहीं दिए गए। नई नीतियों की पहली बड़ी घोषणा चार जुलाई को, दिल्ली में एक सेमिनार में हुई। डॉ मनमोहन सिंह और मैं सिंगापुर गए, भारत-केंद्रित एक सम्मेलन को संबोधित करने, जिसमें दुनिया भर से निवेशक और बैंकर आए थे।

पीछे मुड़ कर देखें, पहले साल (1991-92) में हमने जो पड़ाव पार किए वे वाकई शानदार थे:
1 जुलाई: मुद्रा अवमूल्यन का पहला चरण
3 जुलाई: अवमूल्यन का दूसरा चरण
4 जुलाई: व्यापार नीति में शुरुआती बदलाव
4 जुलाई-18 जुलाई: बैंक आॅफ इंग्लैंड में सोना स्थानांतरित करने का निर्णय
24 जुलाई: सुबह 11 बजे- नई औद्योगिक नीति का प्रस्ताव
शाम पांच बजे- 1991-92 का बजट
13 अगस्त: व्यापार नीति में बड़े बदलाव
28 फरवरी: 1992-93 का बजट
31 मार्च: नई आयात-निर्यात नीति

सैद्धांतिक संदर्भ
यह सोचना गलत है कि आर्थिक सुधार का मतलब कुछ घोषणाएं या किसी नीति में हेरफेर का कौशल है। बदलाव व्यापक आर्थिक व सामाजिक सोच को ध्यान में रख कर किए जाने चाहिए। यह कभी एकदम साफ ढंग से नहीं कहा गया, मगर मैं पक्के तौर पर कह सकता हूं कि नरसिंह राव समेत 1991 के अहम किरदार निम्नलिखित बातों में यकीन रखते थे:
* सरकार को बाजार के मामलों में नाहक दखल नहीं देना चाहिए;
* बाजार की बड़ी नाकामियों से सरकार को नियमन के जरिए ही निपटना चाहिए (पूंजी बाजार, बैंकिंग, प्रतिस्पर्धा-विरोधी प्रवृत्तियां);
* जिन कामों को सरकार को जरूर करना है उनमें उसकी क्षमता बढ़ाई जाए (कर निर्धारण, सार्वजनिक जरूरत की वस्तुओं व सेवाओं की आपूर्ति सुनिश्चित करना आदि);
* लोगों के आजादी के दायरे को बढ़ाना (आर्थिक, सामाजिक आदि)।
मेरा आकलन यह है कि पिछले पच्चीस सालों में हमने जो हासिल किया है उसमें पहले दो मामलों में बहुत अच्छी प्रगति रही, तीसरे मामले में हम नाकाम रहे, और चौथे मामले में हम अपना रास्ता अब भी तलाश रहे हैं, शायद भटक गए हैं। आर्थिक सुधारों के पच्चीस साल पूरे होने पर यह एक विनम्र आकलन है।

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