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दूसरी नजर- विकास और इससे वंचित लोग

भले परमाणु क्लब में देश के शामिल होने या मंगल पर यान भेजने पर गर्व अनुभव करते हों, मगर विकास की संतुष्टि उन्हें फौरी तथा भौतिक आवश्यकताओं जैसे पानी, बिजली, स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सड़क, उद्योग, रोजगार, कृषि उपज की वाजिब कीमतें आदि की पूर्ति से ही मिलती है।

Poverty in india, Poverty Line, Poverty Line in India, Povertyसामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण रिर्पोट के अनुसार, ‘गरीबी ने आज भी देश के तीस फीसद आबादी को अपने चंगुल में जकड़ रखा है। (रॉयटर्स फोटो)

विकास का मतलब भिन्न-भिन्न लोगों के लिए भिन्न-भिन्न होता है। मुख्य रूप से ग्रामीण आबादी वाले एक संसदीय क्षेत्र से तीस साल से ज्यादा समय से चुनाव लड़ने के बाद, मैं अकसर इस वाकये का जिक्र करता हूं। तीस साल पहले, शिवगंगा में बहुत सारे गांव सड़क से जुड़े नहीं थे। ‘हमें सड़क चाहिए’, यह मांग सतत उठती रहती थी। इस या उस कार्यक्रम के तहत प्रशासन को सड़क का रास्ता तैयार करने के लिए पैसा मिलता था। अमूमन यह कच्ची सड़क होती थी। लोग खुश हो जाते थे कि विकास उनके गांव तक आ पहुंचा है। दो साल बाद वे असंतुष्ट नजर आते, मानसून के बाद सड़क की हालत की तरफ इशारा करते, और बजरी वाली सड़क की मांग करते। दो या तीन साल में एक बार फिर वही कहानी दोहराई जाती: पहले सड़क की मांग, फिर बजरी वाली सड़क, फिर पत्थर या र्इंटों के टुकड़ों से बनी सड़क, फिर सतह पर कोलतार वाली सड़क, फिर मशीन से बनाई गई कंक्रीट वाली सड़क।
मैंने अनुभव से यह जाना है कि लोग भले परमाणु क्लब में देश के शामिल होने या मंगल पर यान भेजने पर गर्व अनुभव करते हों, मगर विकास की संतुष्टि उन्हें फौरी तथा भौतिक आवश्यकताओं जैसे पानी, बिजली, स्कूल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सड़क, उद्योग, रोजगार, कृषि उपज की वाजिब कीमतें आदि की पूर्ति से ही मिलती है। आखिरकार विकास का वास्ता जीवन-स्तर, लंबी जीवन प्रत्याशा, अच्छे स्वास्थ्य, अच्छी शिक्षा और बेहतर आय से है।

निराशा का भाव
प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के तौर पर, नरेंद्र मोदी का दावा था कि वे 2014 में, ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ अपने इस नारे के साथ, विकास को राजनीतिक बहस के केंद्र में ले आए। बढ़-चढ़ कर किए गए उनके वायदे भी ध्यान खींचते थे: ‘मैं हर साल दो करोड़ नए रोजगार पैदा करूंगा’, ‘देश से बाहर जमा किए गए काले धन को मैं वापस लाऊंगा और हर भारतीय के खाते में पंद्रह लाख रु. जमा किए जाएंगे’, वगैरह। जाहिर है, इस तरह का कोई भी शेखी बघारने वाला वादा पूरा नहीं किया जा सकता था। लिहाजा, बयालीस महीनों बाद चहुंओर निराशा नजर आती है। निराशा का भाव गुजरात में भी है, जहां दिसंबर में चुनाव होने हैं। जिस ‘गुजरात मॉडल’ के बारे में खूब हांका गया, उसका विश्लेषण और उसकी जांच-परख हो रही है। गुजरात के लिए जो सबसे अच्छी बात हुई वह यह कि 1960 में इस राज्य का गठन हुआ। तब से गुजरात में सत्तावन वर्षों के दरम्यान, पहले तीन दशक में कांग्रेस (और इससे निकले दलों) की सरकारें रहीं, और 1995 से भाजपा की। वर्ष 1995 से पहले भी, गुजरात की विकास दर राष्ट्रीय औसत से अधिक थी। और गुजरात ने उस बढ़त को कायम रखा है। अमूल, बंदरगाह, ऊर्जावान कपड़ा उद्योग, केमिकल और पेट्रोकेमिकल उद्योग, ये सब 1995 से पहले से हैं। इसका अधिकांश श्रेय गुजरात की जनता को जाता है। (गुजराती लोग मूलत: उद्यमी हैं; वाणिज्य-व्यापार पर ही वे अपना ध्यान केंद्रित किए रहते हैं)।

वितरण का न्याय
गुजरात सरकार ने गलती यह की कि वितरण में न्याय के तकाजे को दरकिनार रखा। हम गुजरात की तुलना इसके साथ ही अलग बने राज्य महाराष्ट्र और कर्नाटक तथा तमिलनाडु जैसे अन्य अग्रणी राज्यों से कर सकते हैं। मानव विकास सूचकांक में उत्तम स्थान हासिल करने वाले केरल से भी तुलना की जा सकती है। (देखें तालिका)

यह तालिका गुजरात की कहानी बताती है, कि तमाम डींग हांकने के बावजूद उपर्युक्त चार तुलनीय राज्यों से यह आगे नहीं है। हालांकि गुजरात ने औद्योगिक रूप से काफी प्रगति की है, पर मानव विकास के कई अहम क्षेत्रों में पिछले बाईस सालों में यह वास्तव में पीछे गया है। सबसे स्तब्धकारी आंकड़े बच्चों से संबंधित हैं। यह सामाजिक क्षेत्र की उपेक्षा और गरीबों के प्रति प्रकट तिरस्कार के कारण हुआ।

सामाजिक मोर्चेबंदी
विकास की विकृत अवधारणा के फलस्वरूप, समाज के कई तबके पीछे छूट गए हैं। इनमें मुख्य हैं अनुसूचित जनजातियां (राज्य की आबादी का 14.8 फीसद), दलित (7.1 फीसद) और अल्पसंख्यक (11.5 फीसद)। यहां तक कि पाटीदार समुदाय के लोग भी नाखुश हैं, क्योंकि उन्हें ओबीसी में शामिल नहीं किया गया है, उन्हें लगता है कि वे शिक्षा व रोजगार के अवसर खो चुके हैं। इसलिए राज्य में काफी सामाजिक मोर्चेबंदी दिखती है: जाति इसका आसान जरिया है, मगर उद्वेलन की असली वजह है रोजगार की कमी। वहां यह नारा वायरल हो चुका है ‘विकास गांडो थयो छे’ (विकास पागल हो गया है)। यह सामाजिक बेचैनी गुजरात जाने वाले हर पर्यवेक्षक को नजर आएगी। खामियां जाहिर हैं। कई लोग कहते हैं कि बदलाव के आसार हैं। गुजरात के चुनाव में कई रंग का मुकाबला है: आर्थिक-सामाजिक हकीकत बनाम सुर्खियां बटोरने वाली घोषणाएं, और मानव विकास सूचकांक में शोचनीय स्थिति बनाम अरबों डॉलर के निवेश प्रस्ताव। यह चुनाव ध्यान आकृष्ट करने वाले युवा नेताओं और पुराने अनुभवी नेताओं के बीच का मुकाबला भी साबित हो सकता है।
विकास और इससे वंचित लोग

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