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दूसरी नजर- वे गरीबों को एजेंडे पर ले आर्इं

हर प्रधानमंत्री की सफलताएं और विफलताएं होती हैं। दोनों का आकलन समय-विशेष की पृष्ठभूमि में और उस संदर्भ में होता है जिनमें वे घटित हुई रहती हैं, और उन चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में भी, जिनका सामना उस समय देश को और प्रधानमंत्री को करना पड़ा था। जब इंदिरा गांधी 1966 में प्रधानमंत्री बनीं

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उन्नीस नवंबर, 2017 बगैर राष्ट्रीय स्तर पर मनाए ही बीत गया। यह हमारे इतिहास-बोध का एक दुखद बिंब है। यह राज्य की कथित तटस्थता पर एक मौन टिप्पणी है। यह शर्मनाक है। यह तारीख भारत की तीसरी और छठी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सौवीं जयंती थी। उन्हें बहुत-से लोग प्यार करते थे और उनसे नफरत करने वालों की संख्या भी कम नहीं थी, पर जब तक वे जीवित थीं उन्हें कभी भी नजरअंदाज नहीं किया गया। हर प्रधानमंत्री की सफलताएं और विफलताएं होती हैं। दोनों का आकलन समय-विशेष की पृष्ठभूमि में और उस संदर्भ में होता है जिनमें वे घटित हुई रहती हैं, और उन चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में भी, जिनका सामना उस समय देश को और प्रधानमंत्री को करना पड़ा था। जब इंदिरा गांधी 1966 में प्रधानमंत्री बनीं-
’दो युद्धों (1962 और 1965) ने देश के संसाधन चूस लिये थे;
’तब अनाज की भारी कमी थी और देश पीएल 480 के तहत मिलने वाली खाद्य सहायता पर बुरी तरह निर्भर था;
’कांग्रेस पार्टी का संगठन काफी कमजोर था (और बाद के दो साल के भीतर पार्टी आठ राज्यों में चुनाव हार गई)।

गरीबों का भरोसा जीतना
1967 के निराशाजनक चुनाव नतीजों के बाद, कांग्रेस के सारे नेताओं में इंदिरा गांधी ही थीं जिन्होंने ठीक से यह पहचाना कि गरीब कांग्रेस से विमुख हो गए हैं। कांग्रेस को फिर से गरीबों का भरोसा जीतना होगा। इंदिरा गांधी ने एक ठोस एजेंडा पेश करके आगे का रास्ता दिखाया, जो कि उस वक्त की प्रभावी विचारधारा से मेल खाता था- समाजवाद- कांग्रेस का।इंदिरा गांधी ने कांग्रेस कार्यसमिति के पास एक दस-सूत्री कार्यक्रम भेजा। उसके कुछ बिंदु आज की उदारवादी बाजार अर्थव्यवस्था से मेल नहीं खाते, पर मेरा मानना है कि उस समय वह कार्यक्रम बिलकुल ठीक था, आर्थिक और राजनीतिक, दोनों दृष्टियों से। उसके कुछ बिंदु आज भी प्रासंगिक हैं- उदाहरण के लिए न्यूनतम जरूरत की पूर्ति का प्रावधान, ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम और भूमि सुधार। गरीब, जो कि राजनीतिक दलों के संज्ञान में हाशिये पर थे, एजेंडे में ला दिए गए। यही नहीं, वे एजेंडे के केंद्र में आ गए।

बाद में, बीस सूत्री कार्यक्रम में स्वच्छपेयजल, चिकित्सा, शिक्षा, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सामाजिक न्याय, स्त्रियों के लिए आगे बढ़ने के अवसर, पर्यावरण संरक्षण आदि को शामिल करके इंदिरा गांधी गरीबों की चिंताओं से स्पष्ट रूप से मुखातिब हुर्इं। हालांकि उसके बाद से विशिष्ट कार्यक्रमों का कलेवर कई बार बदला जा चुका है, पर गरीबी उन्मूलन के बाद के सरकारी प्रयासों को बीस सूत्री कार्यक्रम की आत्मा राह दिखाती रही है।

गरीब हाशिये पर धकेले गए

गरीबी पर इंदिरा गांधी का समन्वित हमला फलप्रद साबित हुआ। गरीब आबादी का अनुपात 10 फीसद घट कर 1984 में 44 फीसद पर आ गया। गरीब लोग इंदिरा गांधी को अपनी रक्षक और हितैषी मानते थे, और आज भी मानते हैं। बाद की कांग्रेस सरकारों ने, और राजग की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने भी, गरीबों को अपने एजेंडे के केंद्र में रखने की कोशिश की थी।

अफसोस, अब ऐसा नहीं है। केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों ने एक बार फिर गरीबों को हाशिये पर धकेल दिया है। कुल खर्च के अनुपात में, शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी आबंटनों में कटौती की गई है। मनरेगा को ‘यूपीए सरकार की नाकामी का स्मारक’ कह कर उस पर माथा पीटा गया। 2014-15 और 2015-16 में फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में नगण्य बढ़ोतरी की गई, और इस प्रकार किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी गर्इं। छोटे और मझोले उद्यमों को बैंक-ऋण देने से मना किया गया। और सबसे बढ़ कर यह, कि हर साल रोजगार बाजार में प्रवेश करने वाले 1.2 करोड़ युवाओं के लिए रोजगार सृजन के कोई सार्थक प्रयास पिछले तीन साल में नहीं किए गए।

गरीबों को कैसे छला गया
गरीबोन्मुखी एजेंडे की जगह चालाकी-भरे नारों ने ले ली। हमारे शहर मुश्किल से रहने लायक हैं, फिर भी हम विपुल धनराशि तथाकथित ‘स्मार्ट सिटीज’ पर खर्च करेंगे, जिसका लाभ चुने गए शहर के बस एक छोटे-से हिस्से को होगा। हम बाहर से उधार ली गई 100,000 करोड़ रु. की रकम बुलेट ट्रेन पर खर्च करेंगे, जबकि रेलवे इन्फ्रास्ट्रक्टर का काफी हिस्सा- जैसे कि उपनगरीय ट्रेनें और फुटब्रिज, जिनका इस्तेमाल गरीब लोग करते हैं- खस्ताहाल और जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। कैशलेस अर्थव्यवस्था के संदिग्ध लक्ष्य का पीछा करते हुए हम 86 फीसद मुद्रा को विमुद्रीकृत कर देंगे, पर करोड़ों लोगों पर टूटी मुसीबत और तबाही को बड़ी निर्ममता से नजरअंदाज कर देंगे। हम ‘स्टार्ट-अप इंडिया’ और ‘स्टैंड-अप इंडिया’ को प्रचुर धनराशि मुहैया कराएंगे, पर उन हजारों छोटे उद्यमों के प्रति आंख मूंद लेंगे, जो बरबाद हो गए और जिनकी बरबादी के कारण बहुत-से लोगों की रोजी-रोटी का जरिया भी छिन गया।
हम खूब कड़ाई से दिवाला कानून लागू करेंगे, पर खाद्य सुरक्षा कानून को कूड़ेदान के हवाले कर देंगे। हम स्वस्थ जीवन की एक विधि के तौर पर योग को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपए खर्च करेंगे, पर हम बूढ़े या निराश्रय लोगों को एक हजार रुपए प्रतिमाह की मामूली पेंशन देने से भी इनकार करेंगे और उन्हें मरने के लिए छोड़ देंगे। (अकेले तमिलनाडु में पेंशन के लिए 27,06,758 आवेदन पड़े हैं, जिन्हें बांध कर ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है, क्योंकि राज्य सरकार का कहना है कि उसके पास पैसा नहीं है)।

मूडीज, पीईडब्लू रिसर्च और विश्व बैंक का अनुमोदन पाने की कवायद में गरीब कहां मायने रखते हैं? कारोबार सुगमता (ईज आॅफ डूइंग बिजनेस) की सौ की सूची में जगह मिलना संतोष की बात है, वहीं भुखमरी सूचकांक की सौ की सूची में जगह मिलना शर्म की बात है।
लोगों को चाहिए कि वे किसी भी सरकार को यह न भूलने दें कि भारत की करीब 22 फीसद आबादी अब भी गरीब है और गरिमा के साथ जीवन जीना उनका भी हक है- इसे इंदिरा गांधी ने स्वीकार किया था और अपने जीवनकाल में उसकी रक्षा भी की थी।

 

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