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दूसरी नजर: किसी तरह पार लगी बजट की नैया

बजट का दिन आया और गया। अधिकतर लोगों को न तो आंकड़े याद रहेंगे न वाकचातुर्य भरे पद और शेरो-शायरी।

Union Budget 2017 news, Live Union Budget, Live Hindi Budget, Live Union Budget Hindi, Political party Donationकेंद्रीय वित्त मंत्री संसद में आम बजट पेश करते हुए। (PTI Photo/TV Grab/1 Feb, 2017)

बजट का दिन आया और गया। अधिकतर लोगों को न तो आंकड़े याद रहेंगे न वाकचातुर्य भरे पद और शेरो-शायरी। उनके दिमाग में कुछ टिका रहेगा, तो यह सवाल, कि क्या यह बजट औसत नागरिक को यह भरोसा दिला पाया है कि बुनियादी मसलों से निपटा जा रहा है या निपटा जाएगा?
मैं आप पर आंकड़ों का बोझ नहीं डालूंगा। मुझे सुशासन के केंद्रीय विषय की बात करने दें।
बहुत-से लोग गरीब हैं। वे- या उनके बच्चे- रोजगार-विहीन हैं। बाकी सब चीजें इसी का परिणाम हैं- निहायत अपर्याप्त रिहाइशी सुविधा, खराब स्वास्थ्य, चिकित्सा सेवा तक पहुंच न होना, अल्प शिक्षा, भेदभाव और उपेक्षा, बदहाली और अवसरों का न मिल पाना। मध्यवर्ग के अधिकतर बच्चे नौकरी चाहते हैं, पर नौकरी उन्हें मिलती नहीं है। गरीबी और रोजगार-विहीनता का सबसे कारगर इलाज तेज आर्थिक वृद्धि है।
बजट भाषण के 37 पेज (184 पैराग्राफ) पढ़ने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि भारत ऊंची वृद्धि दर के रास्ते पर 2017-18 में नहीं लौट पाएगा, 2018-19 में भी नहीं।

निराशाजनक प्रदर्शन
सरकार ने माना है कि निजी निवेश की हालत चिंताजनक है। सरकार इस तथ्य से हलकान है कि 2015-16 में केवल डेढ़ लाखरोजगार सृजित हुए। यह दोहरी चुनौती है। निजी निवेश समेत निवेश को मापने का व्यापक रूप से प्रचलित पैमाना है कुल निश्चित पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ)। आर्थिक सर्वे के मुताबिक, पिछले तीन वित्तीय वर्षों में जीएफसीएफ की वृद्धि इस प्रकार थी:
2014-15 : 4.9 फीसद, 2015-16 : 3.9 फीसद, 2016-17 : (-) 0.2 फीसद
जहां तक रोजगार सृजन की बात है, राजग सरकार के दौरान सबसे अच्छा नतीजा रहा 2015-16 में- 1 लाख 50 हजार- सालाना दो करोड़ रोजगार सृजन के वादे से काफी दूर।

क्या करना चाहिए था
सरकार को क्या करना चाहिए था? यहां ऐसे कुछ कदमों की सूची दी जा रही है जो उठाए जाने चाहिए थे, पर नहीं उठाए गए:
1. कुल मांग को बढ़ाना। इसका जांचा-परखा और सबसे अच्छा तरीका है अप्रत्यक्ष करों में कटौती करना- जो सारी उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं पर लगते हैं- जिनके ग्राहक गरीब, मध्यवर्ग और धनी, सभी हैं। अगर अप्रत्यक्ष करों में कटौती होती है, तो करोड़ों उपभोक्ताओं को खर्चों में तुरंत राहत मिलती है। जिन्सों और सेवाओं के उत्पादकों को बिक्री बढ़ने से फायदा होता है। मैंने इस उपाय की तरफदारी अपने पिछले स्तंभ में की थी (मौजूदा मुश्किलों में बजट की राह, 29 जनवरी, 2017)। यह देखकर मुझे निराशा हुई कि बजट ने इस उपाय को खारिज कर दिया और उस विकल्प को चुना जिसे मैंने ‘क्या न करें’ की सूची में रखा था- प्रत्यक्ष करों में कटौती!

2. सूक्ष्म, लघु व मझोले उद्यमों की तरफ मदद का हाथ बढ़ाएं। ये उद्यम बहुत कम लागत से चलते हैं और सबसे ज्यादा रोजगार देते हैं। मांग सिकुड़ने से उन्हें भारी नुकसान उठाना पड़ा है। नोटबंदी ने लगभग अस्सी फीसद सूक्ष्म, लघु व मझोले उद्यमों को अपना काम बंद करने के लिए विवश कर दिया। ये उद्यम, कंपनियां नहीं हैं, वे किसी के स्वामित्व या साझेदारी में चलते हैं। आय कर रिटर्न दाखिल करने वाली कंपनियों की संख्या 5,97,000 से 6,94,000 के बीच है; इनमें से केवल 2,85,000 मुनाफा कमा रही हैं। बजट भाषण के मुताबिक ऐसी कंपनियों में से 96 फीसद सूक्ष्म, लघु व मझोले उद्यमों के पैमानों को पूरा करती हैं। इन उद्यमों को कंपनी-कर में दी गई राहत (तीस फीसद से पच्चीस फीसद) से केवल 2,70,000 कंपनियां लाभान्वित होंगी। अगर कर-योग्य आय कम है, तो लाभ भी कम होगा। इससे न तो बिक्री बढ़ाने में कोई मदद मिलेगी न तो नए रोजगार पैदा करने में। दूसरी तरफ, अगर उत्पाद शुल्कों तथा सेवा कर में कटौती की जाती, तो वह मांग को बढ़ाने और ठप पड़ चुके उद्यमों को फिर से अपने पैरों पर खड़ा होने में मददगार साबित होती। वह मौका गंवा दिया गया।
3. परियोजना निगरानी समूह (प्रोजेक्ट मॉनिटरिंग ग्रुप- पीएमजी) कोबहाल करें। हर कारोबारी घराने और हर बड़े उद्यमी की कम से कम एक परियोजना या तो ठप है या अधर में लटकी है। अगर एक कारोबारी की कोई परियोजना ठप हो, तो वह नए निवेश के लिए तैयार नहीं होगा। हमने महीनों से पीएमजी की बाबत कुछ देखा-सुना नहीं है।

अवांछित व्यवधान
4. मान लेना चाहिए कि नोटबंदी एक भारी अफरातफरी पैदा करने वाला कदम था। इससे सबसे बुरी तरह प्रभावित होने वालों में थे किसान, कृषि मजदूर, दिहाड़ी मजदूर, स्वरोजगार में लगे लोग, कारीगर और सूक्ष्म, लघु व मझोले उद्यम। मजदूरी, आय, परिचालन तथा पूंजी के नुकसान आदि के रूप में करोड़ों रुपयों की चपत लगी। बजट में उनके लिए किसी न किसी रूप में क्षतिपूर्ति का इंतजाम होना चाहिए था। किसानों को ज्यादा न्यूनतम समर्थन मूल्य देकर भरपाई की जानी चाहिए थी। अप्रत्यक्ष करों में कटौती करके (या एक निश्चित अवधि के लिए बिजली की दरें घटा कर) सभी को फौरन राहत दी जा सकती थी। दूसरा विकल्प अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने का था। अफसोस की बात है कि ऐसा कोई भी विकल्प नहीं अपनाया गया।
5. ज्यादा ऋण मंजूर करें। पर इसमें जो चीज आड़े आ रही है, जो आर्थिक सर्वे से भी जाहिर है, वह है हिसाब-किताब की दोतरफा बढ़ती जा रही समस्या। एनपीए की वजह से जहांनिवेशक कर्ज लेने को इच्छुक नहीं हैं, वहीं बैंक कर्ज देने में सक्षम नहीं हैं। लिहाजा, सभी तरह के उद्योगों के लिए ऋण-वृद्धि में अपूर्व गिरावट दिख रही है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एनपीए की स्थिति पर एक नजर डालें:
तारीख कुल एनपीए का प्रतिशत
31-3-14 4.5
31-3-15 4.6
31-3-16 9.8
31-12-16 9.1

जो ऋण 31-3-2014 को ‘निष्पादित परिसंपत्तियां’ थे, वे राजग सरकार के दौरान, आर्थिक स्थिति बिगड़ते जाने के कारण, ‘गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां’ (एनपीए) हो गए। सरकार अब इस समस्या को पुरानी सरकार की देन कह कर लापरवाही से खारिज नहीं कर सकती। बजट ने इस समस्या को और विकट बनाया है, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को फिर से पूंजी-क्षम बनाने के लिए केवल दस हजार करोड़ रु. मुहैया कराए गए हैं, यानी बैंकों को इसहाल पर छोड़ दिया गया है कि वे अपना जुगाड़ खुद करें। अगर सरकार कोई हल नहीं निकालती, तो बैंकों तथा उद्योगों की हालत और खस्ता होगी, ऋण वृद्धि भी सुस्त बनी रहेगी।

इस बजट को किसी साहसिक कदम के लिए नहीं, बस इसलिए याद किया जाएगा कि इसने अर्थव्यवस्था को कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुंचाया। भारत को एक और ऐसे वर्ष को झेलना होगा, जब उम्मीदें झुठलाई जाएंगी और जन-आकांक्षाएं अपूर्ण रहेंगी।

 

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