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पी. चिदंबरम का कॉलम ‘दूसरी खबर’ : भूमि की रक्षा करें, लोगों का भरोसा जीतें

जहां तक जम्मू-कश्मीर के भारत का अभिन्न हिस्सा होने की बात है, ऐसे राजनीतिक और वैधानिक नए विचारों को आजमाने की काफी गुंजाइश है जो जम्मू-कश्मीर के लोगों को आश्वस्त करते हों कि विलय के सिलसिले में हुए शानदार समझौते का भारत सरकार आदर करेगी।

Author नई दिल्ली | July 24, 2016 5:25 AM
केंद्र की जीएसटी लागू करने की हड़बड़ी समझी जा सकती है। दरअसल, सरकार का जोर विकास पर है।

कश्मीर में विरोध-प्रदर्शन लगातार तीसरे सप्ताह जारी हैं। घाटी के कई हिस्सों में कर्फ्यू लागू है। घाटी में रोजाना नई घटनाएं होती हैं। इसीलिए इस बार भी उसी विषय पर लिखने का फैसला किया, जिस पर मैंने अपना पिछला स्तंभ (17 जुलाई, 2016) लिखा था। पिछले सप्ताह संसद में बहस के दौरान अनेक सदस्यों ने स्वीकार किया कि कश्मीर बस एक भूखंड नहीं, कुछ और भी है, जो कि यहां के लोग हैं। इस तरह हमने एक सही बिंदु से शुरुआत की है, लेकिन हमें उसी रास्ते से बंधे नहीं रहना चाहिए जिस पर हम पिछले चालीस वर्षों से घूम-फिर कर चलते रहे हैं।

विषम वितरण
जम्मू व कश्मीर राज्य का 1947 में ‘एक शानदार समझौते’ के तहत भारत में विलय हुआ। 26 अक्तूबर 1947 को स्वीकार किए गए विलय-पत्र का बुनियादी आधार यह था कि जम्मू-कश्मीर भारत के प्रभुत्व में होगा (बाद में नए संविधान के तहत भारतीय संघ का हिस्सा होगा), एक विशेष विधान के आधार पर, जो विधान भारतीय संघ और जम्मू-कश्मीर के बीच अधिकारों के बंटवारे से संबंधित होगा। संविधान के अनुच्छेद 370 ने, जिसे 1950 में स्वीकार किया गया, इस शानदार समझौते को मूर्त रूप दिया।

एक संघीय व्यवस्था में अधिकारों का विषम वितरण अप्रत्याशित नहीं है, जिसमें एक तरफ केंद्र हो और दूसरी तरफ विभिन्न राज्य। किसी राज्य को विशेष या अतिरिक्त अधिकार हासिल हो सकते हैं। यह गौरतलब है कि इसी सिद्धांत के आधार पर भारत तमिल-बहुल श्रीलंका के उत्तर पूर्वी प्रांतों को अधिकारों के हस्तांतरण की वकालत करता रहा है। हो सकता है नगा मसले पर अंतिम समझौते में इसी सिद्धांत से काम लिया जाए।

कश्मीर घाटी में यह आम धारणा है कि अनुच्छेद 370 के साथ खिलवाड़ होता रहा है और जिस स्वायत्तता का वादा जम्मू-कश्मीर से किया गया था उसमें समय-समय पर कटौती की गई है। ‘आजादी’ की चीख-पुकार इसी धारणा की प्रतिध्वनि है। उग्रवाद भिन्न चीज है। हम उग्रवाद को साफ-साफ खारिज करते हैं और इसे राज्य-बल से नेस्तनाबूद करने के लिए संकल्पबद्ध हैं। लेकिन ‘आजादी’ को उग्रवाद से जोड़ने के पीछे क्या कोई तर्क है? क्या नारा लगाने वाले हर युवा पुरुष या हर युवा स्त्री पर ‘राष्ट्र-विरोधी’ होने का लेबल लगाने का कोई औचित्य है? क्या हर भाषण या तकरीर को देशद्रोह मानने के पीछे कोई तर्क है?

महान समझौते का सम्मान करें
कोई भी 1947 की तरफ लौटना नहीं चाहता। न तो पिछले पैंसठ सालों में हुई घटनाओं और इस दौरान हुए बदलावों को पलटने की जरूरत है, और न ही उन कानूनों को वापस लेने की आवश्यकता है जिनका दायरा बढ़ा कर उन्हें जम्मू-कश्मीर पर भी लागू किया गया। कई बदलाव जम्मू-कश्मीर के लोगों को सहज ही स्वीकार्य होंगे, क्योंकि ये उनके लिए फायदेमंद हैं। इसी तरह कई कानून भी, क्योंकि वे सार्वभौमिक सिद्धांतों पर आधारित हैं, और उनकी जगह दूसरे कानून लाए जाएं तो वे भी भिन्न नहीं होंगे।

इसके अलावा, टेक्नोलॉजी आधारित बदलाव अपरिहार्य हैं और कोई भी समझदार व्यक्ति उन्हें मिटाने या पलटने की बात नहीं करेगा। मसलन, दूरसंचार को लें। जम्मू-कश्मीर के लोग इस बात से खुश ही होंगे कि वे शेष भारत से और दुनिया से जुड़े हुए हैं। अन्य उदाहरण हैं रेलवे, हवाई सेवा, बिजली ग्रिड, आधुनिक चिकित्सा सेवा, टीकाकरण कार्यक्रम, कौशल विकास, और वे कानून, जो इन योजनाओं व कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के काम आते हैं।

जहां तक जम्मू-कश्मीर के भारत का अभिन्न हिस्सा होने की बात है, ऐसे राजनीतिक और वैधानिक नए विचारों को आजमाने की काफी गुंजाइश है जो जम्मू-कश्मीर के लोगों को आश्वस्त करते हों कि विलय के सिलसिले में हुए शानदार समझौते का भारत सरकार आदर करेगी।

कुछ दूसरे कदम हमें उस जमीन को वापस दिला सकते हैं जो पीडीपी-भाजपा की सरकार बनने के बाद से हम गंवा बैठे हैं। पर इसके लिए साहस की दरकार है- उस तरह के साहस की, जैसा डॉ मनमोहन सिंह ने दिखाया था, जब उन्होंने जनरल मुशर्रफ से बातचीत की, और उस तरह के साहस की, जैसा अटल बिहारी वाजपेयी ने दिखाया था, जब उन्होंने घोषणा की थी कि ‘इंसानियत’ के सिद्धांत के तहत बातचीत हो सकती है।

साहस दिखाएं
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 2014 में भारी जनादेश मिला। उनकी सरकार को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत हासिल है। वे स्वतंत्र ढंग से फैसले लेने में सक्षम हैं, अपनी पार्टी या मंत्रिमंडल के मोहताज नहीं हैं। यहां उन कामों की एक छोटी-सी सूची प्रस्तुत है जिन्हें वे कर सकते हैं:

1. सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (अफस्पा) को कई क्षेत्रों से फौरन हटाया जाए।
2. संसद के मौजूदा सत्र में अफस्पा में संशोधन हो। इसके लिए विधेयक का मसविदा तैयार है। अफस्पा को रद््द करने और इसकी जगह एक नया कानून लाने का काम शुरू करें, ऐसा कानून जो सुरक्षा बलों को सीमित दंड-मुक्ति की छूट देता हो।
3.जम्मू-कश्मीर के सभी तबकों के लोगों से मिलने और उनकी राय जानने के लिए एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल वहां भेजें। इस प्रतिनिधिमंडल से ‘बहुसंख्यकवादियों’ को बाहर रखें।
4. रक्षा मंत्रालय को ऐसी योजना (पंद्रह दिनों के भीतर) बनाने का निर्देश दें, कि जहां तक संभव हो सके नागरिक क्षेत्रों से सैनिकों को वापस बुलाया जाए और सीमा के निकट उनकी फिर से तैनाती हो। उसे एक दूसरी भी योजना (तीस दिनों के भीतर) बनाने का निर्देश दें कि जम्मू-कश्मीर के दूरदराज के क्षेत्रों में सेना की तैनाती कैसे धीरे-धीरे घटाई जाए।
5. कानून-व्यवस्था बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य सरकार तथा जम्मू-कश्मीर पुलिस को सौंपी जाए। सुरक्षा बलों की तैनाती से संबंधित मानक प्रक्रियाओं की समीक्षा हो और खामियां दूर की जाएं।
7. वार्ताकारों के समूह की रिपोर्ट की सुध ली जाए। दिलीप पडगांवकर को (तीस दिनों के भीतर) उसे ताजातरीन बनाने के लिए कहा जाए। सिफारिशों पर अमल के लिए एक उच्चाधिकार-प्राप्त समूह का गठन हो।
8. इसके अलावा, ऐसा कोई भी कदम जो प्रधानमंत्री को लगता हो कि उससे न सिर्फ जम्मू-कश्मीर की भूमि की रक्षा होगी बल्कि वहां के लोगों का दिल भी जीता जा सकेगा।
हमें लंबा सफर तय करना है और हमें आज से ही शुरुआत करनी चाहिए।

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