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दूसरी नज़र : मौजूदा मुश्किलों में बजट की राह

बजट ऐसी राजनीतिक परिस्थितियों में पेश होगा जब पांच राज्यों में चुनाव की प्रक्रिया चल रही है, जिनमें उत्तर प्रदेश जैसा राजनीतिक लिहाज से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण राज्य भी शामिल है।

Author नई दिल्ली | Published on: January 29, 2017 3:54 AM
बजट 2016 पेश करने के लिए संसद में जाते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली। (Express photo/Ravi Kanojia/File)

प्रत्येक बजट एक संदर्भ से तय होता है, और संदर्भ तय होता है आर्थिक, राजनीतिक तथा सरकार के कार्यकाल के वर्ष-विशेष की परिस्थितियों से। 2017-18 का बजट राजग सरकार का चौथा बजट होगा, यह एक ऐसे वक्त में पेश होगा जब रिजर्व बैंक व केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के मुताबिक अर्थव्यवस्था की गति धीमी पड़ चुकी है। बजट ऐसी राजनीतिक परिस्थितियों में पेश होगा जब पांच राज्यों में चुनाव की प्रक्रिया चल रही है, जिनमें उत्तर प्रदेश जैसा राजनीतिक लिहाज से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण राज्य भी शामिल है।

निर्धारक सीमाएं

अपने कार्यकाल के इस मोड़ पर सरकार बहुत ज्यादा नए वादे नहीं कर सकती: किसी नए वादे पर ठोस नतीजे हासिल करने के लिए पर्याप्त समय नहीं बचा है, और बचे हुए वक्त को पुराने वादों को पूरा करने में लगाना है। यह पहली सीमा है।

विश्व-अर्थव्यवस्था अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। दो नई घटनाएं हो सकती हैं: अमेरिका की सरकार मुक्त व्यापार और अमेरिकी कंपनियों के बाहर निवेश करने के खिलाफ हो जा सकती है और अमेरिकी नियामक बैंक (यूएस फेड) घरेलू ब्याज की दरें बढ़ा सकता है। नवंबर, 2016 से विदेशी निवेश भारत से बाहर जा रहा है। बजट को ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए जो इस उलटे प्रवाह को और तीव्र कर दे। लिहाजा, बजट को राजकोषीय घाटे को तीन फीसद तक, चालू खाते के घाटे को डेढ़ फीसद तक और मूल्य स्थिरता (उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति) को चार फीसद तक सीमित रखने के लक्ष्य पर डटे रहना होगा। यह दूसरी सीमा है।

सुरक्षा संबंधी स्थिति को लेकर सरकार का आकलन फीका और निराशाजनक है। नए सेनाध्यक्ष ने (हमें हैरानी डालते हुए) दो मोर्चों पर युद्ध के लिए तैयार रहने को कहा है। सरकार भारी मात्रा में तेजी से हथियार खरीदने में जुटी है, जिसका भुगतान 2017-18 में और उसके बाद के वर्षों में किया जाएगा। बजट में जरूर रक्षा-बजट में काफी बढ़ोतरी दिखेगी, जिससे अन्य खर्चों का स्पेस कम होगा। यह तीसरी सीमा है।

निजी निवेश का सूखा पड़ गया है। ऋण वृद्धि कई दशकों में सबसे निचले स्तर पर है। निर्यात की बुरी दशा है। नोटबंदी ने निजी खपत को खूब चोट पहुंचाई है। अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए सरकार के पास इस समय एक ही इंजन है, और वह है सरकारी व्यय का। अगर सरकार अपना पूंजीगत व्यय बढ़ाती है, तो कल्याण-कार्यक्रमों के लिए कम धन उपलब्ध होगा। यह चौथी सीमा है।

नोटबंदी जैसी अफरातफरी मचा देने वाली कार्रवाई तथा कर-कानून लागू करने के नाम पर कर-अधिकारियों की व्यापक मनमानियों का मुखर विरोध न करने के एवज में कॉरपोरेट जगत कॉरपोरेट-टैक्स में खासी कटौती की उम्मीद कर रहा है। लोग नोटबंदी और अप्रत्यक्ष करों में बढ़ोतरी से पैदा हुई तकलीफों की क्षतिपूर्ति के तौर पर आय कर की दरों में कमी चाहते हैं। सरकार नासमझ नजर आएगी, अगर वह कर की दरों में कटौती करने के साथ-साथ कर-राजस्व का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य पेश करेगी। यह पांचवीं सीमा है।

इन सीमाओं के बीच वित्तमंत्री अपना रास्ता कैसे बनाएंगे? और प्रधानमंत्री तथा भारतीय जनता पार्टी जिन चीजों के लिए रास्ते निकालना चाहते हैं उनके लिए वित्तमंत्री राजस्व कैसे जुटाएंगे? उन गुब्बारों पर गौर करें जो हाल के हफ्तों में छोड़े गए हैं:
* किसानों के लिए कर्ज-माफी।
* सबके लिए बेसिक आय (यूबीआई)।
* कॉरपोरेट करों में कटौती।
* बैंकिंग नगद लेन-देन कर (बीसीटीटी)।

अब मैं वित्तमंत्री को अपनी बिन-मांगी सलाह पेश करूंगा।

नोटबंदी से खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने के बाद सरकार को चुपचाप यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि 2017-18 और 2018-19 में आर्थिक वृद्धि दर छह से सात फीसद के बीच होगी, यह ऐसी वृद्धि दर नहीं है कि उस पर ताने मारे जाएं। सरकार को ऐसे नीतिगत सुझावों को दृढ़ता से खारिज कर देना चाहिए जो आर्थिक वृद्धि दर के अतिरंजित अनुमान पर आधारित हों। एक बार यह मसला तय हो जाए, तो फिर यह तय करना आसान हो जाता है कि वित्तमंत्री को क्या करना चाहिए और क्या नहीं।

क्या करें

* बताया जाता है कि एनके सिंह समिति ने कुछ अपवाद जैसी स्थितियां गिनाई हैं जब राजकोषीय घाटे को तीन फीसद की सीमा में रखने का लक्ष्य छोड़ा जा सकता है। मेरे खयाल से, एकमात्र उचित अपवाद घोषित युद्ध का है। इसलिए 2017-18 में तीन फीसद के लक्ष्य पर पूरी तरह कायम रहें।
* निजी निवेश को बढ़ावा दें। व्यापारिक घरानों और कारोबारियों के साथ अलग-अलग बातचीत करें और परियोजना के व्यावसायिक रूप से शुरू होने की तारीख तक हर कदम पर उन्हें मदद करें। वर्ष 2017-18 में पचास बड़ी परियोजनाओं को अंजाम तक पहुंचाने का लक्ष्य बनाएं।
* नुकसान में चल रहे सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (पीएसई) को बेच डालें तथा सार्वजनिक क्षेत्र के गैर-बुनियादी उद्यमों में सरकार की हिस्सेदारी सौ फीसद तक कम करें।
* जीएसटी विधेयकों को पारित कराएं तथा जीएसटी को 1 अक्तबूर 2017 से पहले लागू कर दें। कर की ऊंची दर के बजाय कर के व्यापक आधार को लक्ष्य बनाएं। निरर्थक सरकारी खर्चों को कम करें और बचत का इस्तेमाल राज्यों को राजस्व में होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए करें।

प्रत्यक्ष कर संहिता को अद्यतन बनाएं और उसे पारित करें। कर की दर और कर की चोरी जैसी समस्याओं का यही सबसे सटीक जवाब है।

और क्या न करें

प्रत्यक्ष करों में कटौती न करें। इसके बजाय अप्रत्यक्ष करों में कटौती करें (खासकर सेवा कर तथा पेट्रोलियम पदार्थों पर लगने वाले उत्पाद शुल्कों में, जिनका राजस्व संग्रह में बड़ा हिस्सा है), ताकि कुल मांग को प्रोत्साहन मिले। सार्वभौम बेसिक आय (यूबीआई) की घोषणा न करें। करना ही हो, तो प्रायोगिक तौर पर (पायलट स्कीम) घोषित करें और उससे सीखते हुए आगे बढ़ें। नगद सबसिडी और आधार जैसी योजनाएं इसी तरह शुरू हुर्इं और कामयाब हुर्इं।

बीसीटीटी (बैंकिंग टैक्स ट्रांजैक्शन टैक्स) न लाएं। इसके बजाय आय-कर अधिनियम में संशोधन करें और ऐसे लेन-देन की सूची बढ़ाएं जिसमें नगदी का अनिवार्य निषेध है। सामान्य, छोटे-मोटे लेन-देन में नगदी इस्तेमाल करने के लोगों के अधिकार में टांग न अड़ाएं। सुधारों से मुंह न मोड़ें। ‘कल्याणवाद’ को राज्यों के लिए छोड़ दें। मौजूदा आर्थिक हालत के लिए यूपीए को दोष न दें। (यूपीए के कार्यकाल में, दस साल तक औसत आर्थिक वृद्धि दर 7.5 फीसद रही और 14 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आए)। बत्तीस महीनों से आपके हाथ में कमान है।

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा- “GST और नोटबंदी देश की अर्थव्यवस्था को करेंगे मज़बूत”

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