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दूसरी नजरः भीड़ के निशाने

दोतरह की भीड़ है- एक, जमीन पर, और दूसरी, आभासी दुनिया में। दोनों के लक्षण समान हैं। भीड़ में शामिल लोग गुमनामी की आड़ में छिपे रहते हैं।

Author July 8, 2018 3:52 AM
ऐसी ही एक भीड़ हाथ धोकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के पीछे पड़ गई।

दोतरह की भीड़ है- एक, जमीन पर, और दूसरी, आभासी दुनिया में। दोनों के लक्षण समान हैं। भीड़ में शामिल लोग गुमनामी की आड़ में छिपे रहते हैं। वे आहत होने का दावा करते हैं। अपने कृत्यों या शब्दों की जिम्मेदारी न लेना उनकी खासियत है। वे मानते हैं कि वे ‘दंड-मुक्ति का गणराज्य’ के नागरिक हैं (देखें ‘अपराध और दंड-मुक्ति’, जनसत्ता, 22 अप्रैल, 2018)।

पिछले चार साल के दौरान दोनों तरह की भीड़ संख्या में भी बढ़ी है और आकार में भी। वास्तविक (आभासी नहीं) दुनिया में भीड़ ने जीन्स पहनी हुई लड़कियों और पार्क में या बार में बैठे युगलों पर हमले किए हैं। उन्होंने अपने घर में मांस रखने के कारण अखलाक (दादरी, उ.प्र.) को और अपने डेयरी फार्म के लिए पशुओं को ले जाते पहलू खान (अलवर, राजस्थान) को पीट-पीट कर मार डाला। उन्होंने गुजरात के उना में दलित लड़कों को निर्वस्त्र कर पिटाई की। और भी उदाहरण हैं- असम, झारखंड, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों से, जहां पीड़ित अमूमन दलित या मुसलिम या बंजारे थे।

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हाल के महीनों में भीड़ ने अफवाहों के द्वारा उकसाए जाकर बच्चा-चोरी के शक में कई व्यक्तियों की हत्या कर दी। उनमें से एक था सुकांत चक्रवर्ती, एक युवक जिसे अफसरों ने सब्रूम (त्रिपुरा) में अफवाहबाजी रोकने के लिए तैनात किया था!
आभासी दुनिया की भीड़ इससे बहुत अलग नहीं है। उनका एक नाम है: ट्रोल्स। वे असहिष्णु, अशिष्ट, असभ्य, अभद्र और हिंसक हैं। नफरत-भरी बोली और झूठी खबरें (फेक न्यूज) उनके हथियार हैं। वे किसी को मार नहीं सकते, पर मेरा शक है कि अगर उनमें से अनेक लोग किसी हिंसक भीड़ का हिस्सा हों, तो वे ऐसा करने से हिचकिचाएंगे नहीं।

अकेली सुषमा स्वराज

ऐसी ही एक भीड़ हाथ धोकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के पीछे पड़ गई। अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में वह हमेशा भाजपा (और उसके पूर्व अवतार जनसंघ) की सदस्य रही हैं। वह सुशिक्षित, शालीन और वक्तृता की धनी हैं। वह आदर्श हिंदू नारी की भाजपाई छवि से अपनी पहचान जोड़ने के लिए सजग रही हैं। वह कई बार चुनाव जीती हैं। वह 2009 से 2014 के दौरान लोकसभा में विपक्ष की नेता थीं- एक ऐसा पद जो संसदीय लोकतंत्र में, पार्टी के जीतने की सूरत में उन्हें प्रधानमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार बनाता था।

भाजपा ने 2014 का चुनाव जीता, पर पार्टी की नेता और फलस्वरूप प्रधानमंत्री बनने की उनकी राह, भारी ऊर्जा और राजनीतिक कौशल से भरे एक बाहरी खिलाड़ी ने रोक दी। सुषमा स्वराज ने लालकृष्ण आडवाणी के साथ मिलकर नरेंद्र मोदी के आरोहण का विरोध किया था, पर वे इसमें नाकाम रहीं। चुनाव के बाद, नई सरकार में सम्मानजनक स्थान पाने की लड़ाई उन्होंने अकेले ही लड़ी और आखिरकार वह विदेशमंत्री के तौर पर मंत्रिमंडल में शामिल कर ली गर्इं- लेकिन विदेश नीति के संचालन में उन्हें ज्यादा भूमिका नहीं दी गई, यह काम प्रधानमंत्री कार्यालय ने हथिया लिया।

अपनी भूमिका तलाशी

स्मार्ट सुषमा स्वराज ने अपनी भूमिका तलाश ली- वह उन साधारण लोगों की संकटमोचक बन गर्इं, जो देश से बाहर कहीं फंसे हों, या उनका अपहरण कर लिया गया हो या वे कैद कर लिये गए हों या जिन्हें पासपोर्ट/वीजा देने से मना कर दिया गया हो, या जिन्हें भारत के किसी विश्वविद्यालय या अस्पताल में दाखिल कराना जरूरी हो। जाहिर है, एक शख्स की जरूरत थी जो मुसीबत में पड़े लोगों की निस्वार्थ भाव से मदद करने को तैयार हो, और यह साफ दिखता है कि लोग उनकी इस दरियादिली के कायल हैं। उनकी यह छवि बनने में विपक्षी पार्टियों से टकराव मोल न लेना भी सहायक सिद्ध हुआ। अचानक, मेहरबानी के रोजाना के उनके काम ने उन्हें परेशानी में डाल दिया। एक अंतर-धार्मिक जोड़े को पासपोर्ट नहीं मिल रहा था और उन्होंने अपनी शिकायत ट्वीटर पर डाल दी। सुषमा स्वराज या उनके मंत्रालय के किसी अधिकारी ने जवाब दिया और पासपोर्ट कार्यालय को पासपोर्ट जारी करने का निर्देश दिया। जिस अफसर पर पासपोर्ट के लिए मना करने का आरोप था, उसका तबादला कर दिया गया और उसके खिलाफ जांच भी बिठा दी गई- शायद यह अतिरंजित प्रतिक्रिया थी, पर इसके पीछे कोई द्वेष नहीं था। अचानक ट्विटर की दुनिया में कोहराम मच गया। स्वराज को जितना ट्रोल किया गया, शायद ही भाजपा के किसी अन्य नेता को किया गया हो। यह साफ था कि ट्रोल करने वाले उसी फौज का हिस्सा थे जो विपक्षी नेताओं पर रोजाना टूट पड़ती है। जिसने भी स्वाति चतुर्वेदी की किताब ‘आइ एम ए ट्रोल’ पढ़ी है, वह जानता है कि ट्रोल करने वाले कौन लोग हैं और उनके लिए पैसे का प्रबंध किस प्रकार होता है। सुषमा स्वराज का दोष यह है कि उन्होंने ट्रोल करने वाली फौज का संज्ञान तब तक नहीं लिया, जब तक वह खुद निशाने पर नहीं आ गर्इं।

सदमा और चुप्पी

सुषमा स्वराज ने पीड़ित-पक्ष की रणनीति अख्तियार की। उन्होंने कुछ ट्वीट्स ‘लाइक’ की, उन्हें रिट्वीट किया, और इस पर लोगों से अपनी राय देने को कहा कि कितने लोग ट्रोल की हिमायत करते हैं। हालांकि सत्तावन फीसद लोगों ने उनसे सहानुभूति जताई, पर मेरा खयाल है, उन्हें इस बात से सदमा लगा होगा कि तैंतालीस फीसद ने ट्रोल करने वालों के प्रति समर्थन जताया! यह गौरतलब है कि इस पूरे अप्रिय विवाद के दौरान न तो मंत्रिमंडल के उनके किसी साथी और न ही पार्टी के किसी पदाधिकारी ने ट्रोल्स की निंदा में बयान दिया! कई रोज बाद, गृहमंत्री ने खुलासा किया कि उन्होंने सुषमाजी से बात की थी और उनसे कहा था कि ट्रोल करने वाले ‘गलत’ हैं, पर इन लोगों को उन्हें गंभीरता से नहीं लेना चाहिए था! यह जाहिर है कि ट्रोल्स नए ‘प्रचारक’ हैं: वे एक या दो नेताओं की सेवा में एकजुट हैं (दूसरे सभी गौण या उपेक्षणीय हैं); इन्हें भाजपा के वरिष्ठ नेता ‘फालो’ करते हैं, और किसी की मजाल नहीं कि उनका कुछ बिगाड़ सके।

गृहमंत्री महोदय, क्या वास्तव में हमें ट्रोल्स को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए? अगर यही पैमाना लागू करें, तो फिर हमें नैतिकता के पहरेदारों, लव-जिहादियों, गोरक्षा के ठेकेदारों और पीट-पीट कर मार डालने वाली भीड़ को भी गंभीरता से नहीं लेना चाहिए। ट्रोल्स और सोशल मीडिया का दुरुपयोग बताता है कि सिविल सोसायटी, कानून-व्यवस्था और न्यायिक व्यवस्था में गिरावट कहां तक पहुंच गई है। इस शाब्दिक हिंसा को, खासकर हत्या या बलात्कार की धमकियों को रोकने के लिए शब्दों की नहीं, कार्रवाई की जरूरत है। दुर्भाग्य से, कोई कार्रवाई नहीं होती, यहां तक कि जो ऊंचे संवैधानिक पदों पर बैठे हैं उनकी तरफ से फौरन संजीदगी-भरे बयान तक नहीं आते।

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