P Chidambaram article self reliance has turned into anarchy - दूसरी नजरः पहले अराजकता, अब आत्मनिर्भरता - Jansatta
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दूसरी नजरः पहले अराजकता, अब आत्मनिर्भरता

अपनी स्थापना के समय से ही आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) आर्थिक राष्ट्रवाद, स्वदेशी और स्वावलंबन का प्रबल पक्षधर रहा है।

Author August 12, 2018 4:30 AM
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कदमों के बाद नरेंद्र मोदी ने संरक्षणवादी नीतियों को समर्थन देने के संकेत दिए हैं।

जब मैं पच्चीस साल से नीचे के नौजवानों से बात करता हूं, तो पाया है कि उनका ध्यान खींचने और उन्हें किस्से बताने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि उन्हें पुराने अच्छे दिनों की ऐसी बातें, जैसे- ट्रंक कॉल बुक कराने, स्कूटर खरीदने आदि के बारे में बताया जाए। इससे ये लोग इन नतीजों पर पहुंचेंगे-

1- कि मैं कहानियां या किस्से गढ़ रहा था।

2- कि मुझे तकनीकी की चुनौती मिली है।

3- कि मैं उनके दादा जो कि दस साल पहले मर चुके हैं, उनसे भी बड़ा हूं।

सत्य यह है कि इन किस्से-कहानियों का हर शब्द वाकई सच था। भारत की पैंसठ फीसद आबादी (जो कि पैंतीस साल से नीचे की है) को यह नहीं पता है कि हम लोग एक ऐसे देश में रहते थे जिसमें शासन के आर्थिक सिद्धांतों में राज्य का नियंत्रण, सार्वजनिक क्षेत्र की प्रमुखता, लाइसेंस व्यवस्था, आत्मनिर्भरता, करों की ऊंची दरें, और (कृषि के अपवाद को छोड़ कर) निजी क्षेत्र को लेकर संदेह जैसी बातें थीं।

आत्मनिर्भरता का शासन

ऐसा नहीं कि हमारे नेता और नीति निर्माता मूर्ख या पागल थे। हमारे कई नेता उच्च शिक्षित थे, निसंदेह होशियार थे, और निस्वार्थ व सादा जीवन जीया। हमारे प्रशासकों का निर्माण उन नौजवान पुरुषों और महिलाओं से हुआ, जिन्होंने विश्वविद्यालयों में शिक्षा हासिल की थी और नौकरी की सुरक्षा के अलावा उनके मन में समाज का एक बेहतर और उपयोगी नागरिक बनने की जायज इच्छा थी। फिर भी, आजादी के बाद करीब तीस साल तक जो तरक्की हुई, उसकी रफ्तार दुखदायी रूप से जीडीपी बढ़ने के मुकाबले बहुत ही धीमी रही, औसतन करीब साढ़े तीन फीसद और प्रति व्यक्ति आय 1.3 फीसद रही।

इस तरह के आर्थिक शासन का नाम है- ऑटार्की (इसका अर्थ है अर्थ तंत्र में आत्मनिर्भरता)। चीन ने 1978 में, और भारत ने 1991 में इससे पीछा छुड़ा लिया था।

यह आत्मनिर्भरता न तो कभी मरेगी, और न ही इसे छह फुट गहराई में दफन किया जा सकेगा। समय-समय पर पीछे मुड़ कर देखने का इसका अपना तरीका है, जो कि अब भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में होता नजर आ रहा है।

बाजार-समर्थक और कारोबार-समर्थक होने के बीच बहुत बड़ा फर्क है। अपनी स्थापना के समय से ही आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) आर्थिक राष्ट्रवाद, स्वदेशी और स्वावलंबन का प्रबल पक्षधर रहा है। इसकी ट्रेड यूनियन- भारतीय मजदूर संघ विदेशी निवेश का विरोध करती है। इसका एक प्रमुख संगठन- स्वदेशी जागरण मंच बिना किसी संकोच के आत्मनिर्भरता वाली नीतियों के पक्ष में खड़ा है।

अतीत पर नजर

हाल के महीनों में, इस बात के प्रमाण देखने को मिल रहे हैं कि जिन उपायों को बहुत पहले ही खारिज कर दिया गया था, भाजपा अब उन्हें प्रबल-राष्ट्रवाद की दुहाई देते हुए फिर से जीवित करने में लगी है। इसके कुछ उदाहरणों पर हम नजर डालते हैं-

1- ‘बाजार’ का अस्तित्व राज्य निरपेक्ष है। बाजार आर्थिक सामर्थ्य और आजादी को बढ़ाते हैं। बाजार को बहुत ही संजीदगी के साथ नियंत्रित करना चाहिए और राज्य को कुछ ही मामलों में इसमें दखल देना चाहिए। उन देशों तक ने, जिन्होंने सामाजिक लोकतंत्र को गले लगाया है, यह पाया है कि बाजार अर्थव्यवस्था उनके आर्थिक दर्शन के अनुरूप है। ऐसे देशों में स्कैंडीनेवियाई देश हैं। बाजार अर्थव्यवस्था के मामले में भाजपा की स्थिति संदिग्ध है। जब वह कारोबार समर्थक होने का दावा कर रही होती है, तो उसने आयात विकल्प, दर और गैर-दर बाधाओं, मात्रात्मक प्रतिबंध, मूल्य नियंत्रण, और लाइसेंस व परमिट में फिर से अच्छाइयां ढूंढ़ निकाली हैं। आज आर्थिकी पर नियंत्रण के और नए-नए तरीके थोप दिए गए हैं। हर फैसले के पीछे ‘हित समूह’ की लॉबिंग देखी जा सकती है, जो आमतौर पर किसी उद्योग घराने के लिए होती है।

2- दूसरे विश्व युद्ध के बाद से वैश्विक वृद्धि में व्यापार ने अप्रत्याशित भूमिका निभाई है। करोड़ों लोग गरीबी के दायरे से बाहर आए हैं। छोटे देशों, जो एकदम अक्षम माने जा रहे थे, ने खूब तरक्की की और अपने को उच्च-आय वाले देशों की कतार में शामिल किया (जैसे- सिंगापुर, ताइवान)। ऐसे देशों को उनमुक्त व्यापार की ओर ले जाने वाला जो सबसे बड़ा उपाय था, वह द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार समझौते थे और 1995 से विश्व व्यापार संगठन (डबल्यूटीओ) बना हुआ है।
भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार व्यापार समझौतों की उपयोगिता में भरोसा करती नहीं दिखती। डब्ल्यूटीओ में भारत की अब कोई ताकत नहीं रह गई है। इसका सबसे ताजा उदाहरण प्रस्तावित क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी की उपयोगिता की समीक्षा के लिए बनाई गई समिति है जो देशों को उनके बीच व्यापार बढ़ाने के लिए एकजुट करेगी।

भारी कीमत चुकानी होगी

3- भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने पिछली तारीखों से प्रभावी करों को थोपने की अपनी सनक से पीछे हटने से इनकार कर दिया है। पहली बात यह तो कि यह 2014 में ही हो जाना चाहिए था, जब आयकर कानून में तथाकथित वोडाफोन संशोधन को रद कर दिया गया था। इसके उलट, वोडाफोन पर न सिर्फ कर-मांग के लिए दबाब बनाया जाता रहा, बल्कि दूसरे लेनदेनों के लिए भी पहले से चले आ रहे बकाए का दबाव बना दिया गया। इसके अलावा सरकार तकरीबन हर महीने ही कर दरों को लेकर कुछ न कुछ संशोधन करती रही है, उदाहरण के लिए सीमा शुल्कों और जीएसटी को लेकर (अपने मूल पापों को मिटा देने के लिए)।

4- अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कदमों के बाद नरेंद्र मोदी ने संरक्षणवादी नीतियों को समर्थन देने के संकेत दिए हैं। संरक्षणवाद से उपभोक्ताओं को भारी नुकसान होगा, मांग में कमी आएगी और इससे संसाधनों का गलत आवंटन होगा और निवेश संबंधी फैसले गलत होंगे। मैं यह जानकर हैरान हूं कि आयात घटाने के तरीके खोजने लिए कार्यबल का गठन किया गया है। गड़बड़ाई आर्थिक सोच का ताजा उदाहरण ई-कॉमर्स पर तैयार किया मसौदा-नियम है। रियायत संबंधी नियमों से ससंरक्षणवादी सोच की झलक साफ मिलती है।

5- आत्मनिर्भरता को सिर्फ नौकरशाही, खासतौर से कर अधिकारियों और जांच एजेंसियों का सशक्तीकरण करके ही खत्म किया जा सकता है। भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने सिर्फ यह किया है कि और ज्यादा अफसरों को असीमित शक्तियां (जैसे- जांच, जब्ती, गिरफ्तारी के अधिकार) दे दी हैं और कानूनों का अपराधीकरण कर दिया है। उदाहरण के लिए, विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून गैर-आपराधिक कानून था, अब इसमें आपराधिक कानून का प्रावधान है। नीति-निर्माण में अराजकता रही। नोटबंदी और जीएसटी लागू करने का तरीका इसके उदाहरण हैं। अब, आत्मनिर्भरता अराजकता में बदल चुकी है। मुझे डर है कि देश को कहीं इसकी भारी कीमत न चुकानी पड़ जाए।

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