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दूसरी नजरः सरकारें छिपा रहीं, लोग ढूंढ़ रहे

यह स्पष्ट नहीं है कि प्रभार किसके पास है या कौन-से नीतिगत बदलाव किए जाएंगे। मंत्रिमंडल मूकदर्शक है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद बिना कोई छाप छोड़े परिदृश्य से बाहर हो गई है।

Author June 10, 2018 4:27 AM
सरकार ने चौथी तिमाही की वृद्धि दर का बखान करते हुए दावा किया कि नोटबंदी और त्रुटिपूर्ण जीएसटी के बुरे प्रभाव से निजात मिल चुकी है। शुक्र है कि सरकार ने यह दावा नहीं किया कि अच्छे दिन आ गए हैं।

एक आंकड़े की ओट में आप कितना कुछ छिपा सकते हैं? बहुत, अगर मीडिया साथ दे। जिस दिन केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) ने 2017-18 की वृद्धि दर के आंकड़े जारी किए, मीडिया ने सिर्फ एक आंकड़े पर अपने को झोंक दिया: 7.7 फीसद। पहली नजर में यह 2017-18 के पूरे साल के जीडीपी का आंकड़ा मालूम पड़ता था, और यह निश्चित रूप से असरदार था। पर वास्तव में यह केवल एक तिमाही का आंकड़ा था, चौथी तिमाही का, और यह थोड़ा-सा इजाफा भी ‘बेस इफेक्ट’ कम होने के कारण (यानी उससे पहले के वित्तवर्ष की समान अवधि में वृद्धि दर कम होने की वजह से) था। पूरे साल की वृद्धि दर तो बस 6.7 फीसद थी।

सरकार ने चौथी तिमाही की वृद्धि दर का बखान करते हुए दावा किया कि नोटबंदी और त्रुटिपूर्ण जीएसटी के बुरे प्रभाव से निजात मिल चुकी है। शुक्र है कि सरकार ने यह दावा नहीं किया कि अच्छे दिन आ गए हैं। चार साल बीतने पर सरकार अपेक्षया नरम राग अलाप रही है: साफ नीयत, सही विकास! भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार के चार साल का सफर कई सारी वादाखिलाफी से पटा रहा है: हर बैंक खाते में पंद्रह लाख रु. आएंगे, हर साल दो करोड़ नए रोजगार पैदा होंगे, किसानों को फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य लागत+पचास फीसद दिया जाएगा, कृषिऋण माफ किया जाएगा, सभी किसान फसल बीमा के दायरे में होंगे, जम्मू-कश्मीर में शांति और सुरक्षा सुनिश्चित की जाएगी, अच्छा और सरल जीएसटी लागू किया जाएगा, इसके अलावा और भी बहुत कुछ। इस सूची में आप चाहें तो अपने अनुभव से कुछ जोड़ सकते हैं।

नतीजे देखें

पांच में से चार साल बीतने पर लोग यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि सरकार का आकलन उसके इरादे से हो। सही आकलन तो नतीजे देख कर ही हो सकता है। कुछ निष्कर्ष अंतर्विरोध की परवाह किए बिना निकाले जा सकते हैं। वर्ष 2012-13 से अर्थव्यवस्था सुधार पर थी और जीडीपी वृद्धि दर 2012-13 के 5.5 फीसद से बढ़ कर 2013-14 में 6.4 फीसद, 2014-15 में 7.4 फीसद और 2016-17 में 8.2 फीसद हो गई। दो साल में यह 8.2 फीसद से घट कर 6.7 फीसद पर आ गई, 1.5 फीसद की घटोतरी- यह ठीक उतनी ही कमी है जितनी कि नोटबंदी के बाद मैंने भविष्यवाणी की थी।

दुखद कहानी

ऋणवृद्धि में, 2017-18 में किसी तरह थोड़ा संभलने से पहले, भारी गिरावट दर्ज हुई, 13.8 फीसद से 5.4 फीसद। ऋणवृद्धि में, उद्योगों को दिया गया ऋण सबसे ज्यादा मायने रखता है। पिछले चार साल में, उद्योगों के मद््देनजर, सालाना ऋणवृद्धि दर 5.6 फीसद, 2.7 फीसद, -1.9 फीसद और 0.7 फीसद रही।

औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आइआइपी) फीका बना हुआ है। आइआइपी के आंकड़े जोर-शोर से प्रचारित किए गए ‘मेक इन इंडिया’ के दावों को झुठलाते हैं। इसके अलावा, जहां तक रक्षा सामग्री के उत्पादन का सवाल है, ‘मेक इन इंडिया’ मॉडल को कुछ दिन पहले अधिकृत रूप से तिलांजलि दे दी गई (देखें ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’, 6 जून, 2018)।

कुल एनपीए 2,63,015 करोड़ रु. से बढ़ कर 10,30,000 करोड़ रु. हो गया, तथा यह अभी और बढ़ेगा। बैंकिंग सिस्टम, व्यवहार में, दिवालिया हो गया है। किसी ऐसे बैंकर से मेरी मुलाकात नहीं हुई, जो खुशी-खुशी ऋण की मंजूरी देगा, न ही मेरी मुलाकात किसी ऐसे निवेशक से हुई जो आत्मविश्वास के साथ उधार लेगा। अर्थव्यवस्था केवल एक पहिए पर चल रही है- सरकारी खर्च पर।

कुल निश्चित पूंजी निर्माण (जीएफसीएफ) 2013-14 के 31.3 फीसद से गिर कर 2015-16 में 28.5 फीसद पर आ गया, और यह तीन साल से वहीं अटका हुआ है, जिससे मेरी यह बात सही साबित होती है कि निजी निवेश का बुरा हाल है।
जिन्सों का निर्यात 2013-14 में 315 अरबडॉलर की बुलंदी पर था। तब से इसे 300 अरब डॉलर का आंकड़ा पार करने में काफी जूझना पड़ा, और पिछले चार साल में, दो साल यह शिखर से काफी नीचे था।

विषाद का आलम

हम कुछ और आर्थिक संकेतक चुन सकते हैं और उनसे अर्थव्यवस्था की हालत बयान कर सकते हैं। यह भी स्थिति की सतही समझ और मनमाने फैसलों की ही कहानी होगी (नोटबंदी, दोषपूर्ण जीएसटी, ठहरी हुई कृषि मजदूरी, र्इंधन की ऊंची कीमतें, भयोत्पादक कर-वसूली, दुर्भावनापूर्ण जांच, आदि)।

देश की मन:स्थिति विषादपूर्ण है। रिजर्व बैंक के सर्वे (मई 2018) में 48 फीसद लोगों ने कहा कि वे यह महसूस करते हैं कि आर्थिक स्थिति पिछले एक साल में और खराब हुई है। कुछ क्षेत्रों में, जैसे कृषिक्षेत्र में, विषाद आक्रोश में बदल गया है। समाज के कुछ तबकों में, जैसे दलितों और बेरोजगार युवाओं में, विषाद निराशा में बदल गया है।

यह स्पष्ट नहीं है कि प्रभार किसके पास है या कौन-से नीतिगत बदलाव किए जाएंगे। मंत्रिमंडल मूकदर्शक है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद बिना कोई छाप छोड़े परिदृश्य से बाहर हो गई है। मैं हैरान हूं कि सरकार कब तक एक आंकड़े और एक नारे की ओट में छिपती रहेगी।

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