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दूसरी नजरः शांग्री-ला की खोज

माना जाता है कि शांग्री-ला एक रहस्यपूर्ण, सौहार्दपूर्ण घाटी है, पृथ्वी पर स्वर्ग का एक कोना, जहां हर समय सुख-शांति रहती है। अगर कहीं शांग्री-ला है, तो वह शायद भारत में नहीं है, और इससे सारे भारतवासियों को बड़ी निराशा होगी, जो देश के इतिहास, संस्कृति, सभ्यतागत विशेषताओं और परंपराओं पर गर्व करते हैं।

Author June 17, 2018 5:53 AM
अपने भाषण के शुरू में ही उन्होंने कहा:‘‘सिंगापुर यह भी दिखाता है कि जब देश किसी एक या दूसरी ताकत के पीछे नहीं, बल्कि सिद्धांत के पक्ष में खड़े होते हैं, तो वे दुनिया भर में सम्मान अर्जित करते हैं और अंतरराष्ट्रीय मामलों में उनकी बात सुनी जाती है।

माना जाता है कि शांग्री-ला एक रहस्यपूर्ण, सौहार्दपूर्ण घाटी है, पृथ्वी पर स्वर्ग का एक कोना, जहां हर समय सुख-शांति रहती है। अगर कहीं शांग्री-ला है, तो वह शायद भारत में नहीं है, और इससे सारे भारतवासियों को बड़ी निराशा होगी, जो देश के इतिहास, संस्कृति, सभ्यतागत विशेषताओं और परंपराओं पर गर्व करते हैं। सारी दुनिया से नाता जोड़ने की प्रधानमंत्री की सक्रियता ने सबका ध्यान खींचा है। हाल में उन्होंने सिंगापुर में शांग्री-ला डॉयलॉग में प्रभावकारी भाषण दिया। यह बहुत अच्छी तरह लिखा गया भाषण था और उसके कुछ अंश उद्धृत किए जाने और पढ़े जाने लायक हैं।

देश में विविधता

अपने भाषण के शुरू में ही उन्होंने कहा:‘‘सिंगापुर यह भी दिखाता है कि जब देश किसी एक या दूसरी ताकत के पीछे नहीं, बल्कि सिद्धांत के पक्ष में खड़े होते हैं, तो वे दुनिया भर में सम्मान अर्जित करते हैं और अंतरराष्ट्रीय मामलों में उनकी बात सुनी जाती है। और जब वे अपने यहां विविधता को मान देते हैं, तो वे बाहर भी समावेशी विश्व चाहते हैं।’’ देश में विविधता भारत की अपनी संकल्पना में निहित है। इसमें धर्म, भाषा, निजी कानून, संस्कृति, खान-पान, पहनावा आदि की विविधता शामिल है। पर कुछ ताकतवर समूह हैं जो विविधता का विरोध करते या मखौल उड़ाते हैं और एकरूपता पर जोर देते हैं। वे दावा करते हैं कि जो भी हिंदुस्तान में रहते हैं, हिंदू हैं।

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वे इतिहास को फिर से लिखना चाहते हैं और हर उस चीज पर दावा ठोंकते हैं जो वे मानते हैं कि उनकी है, और वे सभी लोगों पर एक तरह का निजी कानून, खान-पान की एक जैसी आदतें, एक तरह की परिधान संहिता और एक भाषा थोपना चाहते हैं। दुनिया भर के नेतागण प्रधानमंत्री को सुनते हैं और विविधता को अंगीकार करने की उनकी अपील पर तालियां बजाते हैं; और फिर वे दादरी, उ.प्र. (मोहम्मद अखलाक), अलवर, राजस्थान (पहलू खान), उना, गुजरात (दलित लड़के), और भीमा कोरेगांव, महाराष्ट्र (दलित रैली) में जो हुआ उसके बारे में पढ़ते हैं। वे अविश्वास में अपने सिर हिलाते हैं और विभ्रम में पड़ जाते हैं। और अभी कुछ ही दिन पहले, दो मुसलिम पशु-चोर होने के शक में पीट-पीट कर मार दिए गए (डुल्लु, जिला गोड्डा, झारखंड) और झरने पर नहाने के कारण तीन दलित लड़कों की पिटाई की गई और उन्हें नंगा घुमाया गया (वकाडी, जिला जलगांव, महाराष्ट्र)। विविधता किधर जा रही है, जिसकी हम दुनिया के सामने दुहाई दे रहे हैं?

आर्थिक संबंधों पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा: ‘हमारे क्षेत्र की तरफ वापस आएं। भारत के बढ़ते वायदे गहरे आर्थिक और रक्षा सहयोग से जुड़े हुए हैं। दुनिया के अन्य क्षेत्रों की तुलना में, इस क्षेत्र में हमारे व्यापारिक करार अधिक हैं।’’

निर्यात-आयात के इम्तहान में नाकाम

इस क्षेत्र के देशों के साथ अनगिनत करार हमने किस इरादे और किस मकसद से किए? क्यों सार्क देशों और आसियान देशों के साथ भारत का व्यापार ठहरा हुआ है? सार्क देशों के साथ कुल व्यापार 2013-14 में 20 अरब डॉलर और 2017-18 में 26 अरब डॉलर के आसपास था। भारत के कुल विदेश व्यापार में यह आंकड़ा क्रमश: 2.6 फीसद और 3.4 फीसद था। सार्क देशों के मामले में, उपर्युक्त दो सालों का आंकड़ा करीब 74 अरब डॉलर (9.7 फीसद) और 81 अरब डॉलर (10.5 फीसद) था। पिछले चार साल के रिकार्ड में ऐसा कुछ नहीं है जिसे महत्त्वपूर्ण सुधार कह कर शेखी बघारी जा सके।

भारत की आर्थिक वृद्धि दर की बात करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा: ‘‘हम सालाना 7.5 फीसद से 8 फीसद की वृद्धि बनाए रखेंगे। हमारी अर्थव्यवस्था के बढ़ने के साथ ही हमारा वैश्विक और क्षेत्रीय जुड़ाव भी बढ़ेगा। अस्सी करोड़ से अधिक युवाओं का देश जानता है कि उसका भविष्य केवल उसकी अर्थव्यवस्था के आकार से सुरक्षित नहीं हो सकता, बल्कि इसके लिए गहरा वैश्विक जुड़ाव भी जरूरी है।’’

यह बात पूरी तरह सही है, पर ऐसा लगता है कि सरकार को निर्यात, मैन्युफैक्चरिंग और रोजगार के आपसी रिश्ते की बहुत कम समझ है। भारत के ‘वैश्विक एकीकरण’ का सही पैमाना है व्यापार, और सरकार इस इम्तहान में फेल हुई है। इन चार सालों में निर्यात की वृद्धि दर ‘नकारात्मक’ रही है (315 अरब डॉलर से 303 अरब डॉलर)। आयात मामूली सुधरा है, 450 अरब डॉलर से 465 अरब डॉलर। कोई भी देश निर्यात में जबर्दस्त बढ़ोतरी किए बिना अपने मैन्युफैक्चरिंग को ऊपर नहीं उठा सका है। और कोई भी देश मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को प्रोत्साहित किए बिना गैर-कृषि रोजगार नहीं बढ़ा सका है। मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात की नाकामी के कारण कई लोग जीडीपी वृद्धि के आंकड़ों पर शक कर रहे हैं। जो हो, जीडीपी की वृद्धि दर भी 2015-16 के 8.2 फीसद से घट कर 2017-18 में 6.7 फीसद पर आ गई।

समझदारी का रास्ता

और फिर प्रधानमंत्री वैश्विक अर्थव्यवस्था के संदर्भ में, बड़ी सावधानी से चुने गए शब्दों में बोले, पर वे शब्द भारत की स्थिति पर भी लागू होते हैं: ‘‘और, भविष्य को लेकर हम पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो सकते। हमारी प्रगति के बावजूद, हम अनिश्चितता के कगार पर खड़े हैं और यह अनिश्चितता अनुत्तरित प्रश्नों और अनसुलझे विवादों, प्रतिद्वंद्विताओं और दावों, और टकराते दृष्टिकोणों तथा प्रतिस्पर्धी मॉडलों की देन है।’’ प्रधानमंत्री के भाषण के अंतिम अंश और उपसंहार समयानुकूल थे: ‘‘हम वेदांत दर्शन के अनुयायी हैं जो सबमें निहित एकत्व में विश्वास करता है और विविधता में एकता का उत्सव मनाता है। सत्य एक है, जिसे ज्ञानी लोग अनेक तरह से कहते हैं। यही हमारे साभ्यतिक लोकाचार की आधारशिला है- बहुलतावाद, सह-अस्तित्व, खुलापन और संवाद।’’ ‘‘लेकिन, एक समझदारी का रास्ता भी है। यह एक उच्चतर उद्देश्य के लिए हमारा आह्वान करता है: कि हम अपने स्वार्थों के संकीर्ण दृष्टिकोण से ऊपर उठें और इस सच्चाई को पहचानें कि अगर हम एक दूसरे को समान मानते हुए, साथ मिलकर सबके व्यापक हित के लिए काम करें, तो हममें से हर कोई अपनी स्वार्थ-सिद्धि बेहतर ढंग से कर सकता है…’’

ये शब्द कितने सही और सटीक हैं अगर ये इन्हें संबोधित किए जाएं- विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, राम सेना, हनुमान सेना, एंटी रोमियो स्क्वाड्स, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, और कई मंत्री, कई सांसद और कई विधायक- जो ‘समझदारी के रास्ते’ को खारिज करते हैं। प्रधानमंत्री से मेरा अनुरोध है कि वे शांग्री-ला जैसा एक भाषण भारत में और भारत के यथार्थ पर दें।

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