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दूसरी नजरः दूसरे दर्जे के नागरिक?

अगर धार्मिक अल्पसंख्यकों को लगता है कि उनका दिल डूब रहा है, कि उनकी जगह ‘दूसरे दर्जे के नागरिक’ की होती जा रही है, तो हम गणराज्य तो क्या, लोकतंत्र कहे जाने लायक भी नहीं हैं।

Author June 3, 2018 04:28 am
आर्कबिशप काउटो और सेवानिवृत्त आइपीएस जूलियो रिबेरो ने अपने जीवन में अलग-अलग दिशा पकड़ी।

आर्कबिशप काउटो और सेवानिवृत्त आइपीएस जूलियो रिबेरो ने अपने जीवन में अलग-अलग दिशा पकड़ी। एक ने पादरी का जीवन चुना, दूसरा पुलिसकर्मी बना। आर्कबिशप काउटो दिल्ली के कैथोलिक संघ के बड़े महत्त्वपूर्ण पदाधिकारी हैं। रिबेरो को सेवानिवृत्त हुए अरसा हो गया, पर वह मुंबई में और पुलिस अफसरों के बीच हीरो हैं। दोनों को एक ही समय चर्चा में लाने वाली एक चीज थी वह चिट्ठी जो आर्कबिशप ने पैरिश पादरियों को 8 मई 2018 को लिखी थी, और दूसरी चीज थी- एक लेख- जो 28 मई को रिबेरो ने एक प्रमुख अखबार में लिखा था।

प्रार्थना, बगावत नहीं

आर्कबिशप का पत्र गैर-राजनीतिक था, और इसमें देश के लिए प्रार्थना करने की अपील की गई थी, जो ‘ऐसे विक्षुब्ध राजनीतिक माहौल से गुजर रहा है जिसने हमारे संविधान में वर्णित लोकतांत्रिक सिद्धांतों और राष्ट्र के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने के लिए खतरा पैदा कर दिया है।’ उन्होंने कहा, ‘…अपने देश के लिए हम 13 मई, 2018 से एक प्रार्थना अभियान शुरू करें…।’ उन्होंने पादरियों से हर शुक्रवार को उपवास रखने और प्रायश्चित करने को कहा। यह पूरी तरह से ईसाई परंपरा के अनुरूप था।

यह प्रार्थना के लिए आह्वान था, पर कुछ अक्लमंद स्त्री-पुरुषों ने इसे बगावत के लिए आह्वान समझ लिया। भाजपा प्रवक्ता शायना एनसी ने कहा, ‘‘जातियों/समुदायों को भड़काने की कोशिश करना गैर-कानूनी है। आप उन्हें सही उम्मीदवार/पार्टी को वोट देने के लिए कह सकते हैं, लेकिन एक पार्टी को वोट देने और दूसरी को नहीं देने का सुझाव देना और अपने को सेक्युलर और दूसरे को छद्म सेक्युलर बताना दुर्भाग्यपूर्ण है।’’ मंत्री गिरिराज सिंह ने इसमें भौतिक विज्ञान का अपना गहरा ज्ञान जोड़ते हुए कहा, ‘‘हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। मैं कोई ऐसा कदम नहीं उठाऊंगा जो सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने वाला हो। लेकिन अगर चर्च लोगों से इस तरह की प्रार्थना करने को कहता है कि मोदी सरकार बने ही नहीं, तो देश को सोचना होगा कि दूसरे धर्मों के लोग कीर्तन पूजा करेंगे।’’ आर्कबिशप काउटो ने ऐसा कुछ नहीं कहा था जो उनके नाम से उन पर मढ़ दिया गया, फिर भाजपाई ट्रोल्स ने सोशल मीडिया के जरिए एक विषैला अभियान छेड़ दिया।

आर्कबिशप पर हुए अवांछित हमलों से व्यथित होकर रिबेरो ने एक अखबार में लेख लिखा। अप्रिय सत्य कहने में उन्होंने संकोच नहीं किया, वे हमेशा बेहिचक कड़वा सच बोलते रहे हैं। उन्होंने शरारती तत्त्वों को, पहले के उनके बयानों और कामों को याद करते हुए, चुनौती दी और कहा, जो कि बहुत-से लोग कहना चाहेंगे: ‘‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार, पहले की, वाजपेयी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार से भिन्न है, यह अल्पसंख्यकों की देशभक्ति पर संदेह करती और सवाल उठाती है! यह पूरी तरह अस्वीकार्य है।’’ उन्होंने (रिबेरो ने) यह याद करते हुए कि उनके पूर्वज हिंदू थे जिन्होंने चार सौ पहले धर्मान्तरण कर लिया था, यह स्वीकार किया कि यह हिंदुओं की बहुसंख्या वाला देश है, फिर यह भी बताया कि उनके ज्यादातर मित्र और सहकर्मी हिंदू थे, पर दर्प के साथ यह भी जोड़ा कि ‘‘लेकिन जिस धर्म में मैं पैदा हुआ हूं उसे पसंद करता हूं। इसने मुझे सच्चाई और न्याय के मूल्य सिखाए और इसने मुझे सिखाया कि सेवा का क्या अर्थ है।’’ कोई हिंदू या मुसलिम भी अपने धर्म की बाबत यही बात कह सकता है।

शर्मिंदगी की बात

रिबेरो जिस निष्कर्ष पर पहुंचे उससे हमारा माथा शर्म से झुक जाना चाहिए। उन्होंने लिखा: ‘‘मुझे दूसरे दर्जे की नागरिकता के लिए तैयार हो जाना चाहिए… मैं यह स्वीकार नहीं करूंगा कि मुझ पर झूठे ही राष्ट्र-विरोधी होने का आरोप मढ़ा जाए और उस आधार पर मुझे प्रताड़ित किया जाए।’’

हमने इस देश के साथ और खुद के साथ क्या किया है कि और भी लोग- मुसलिम, ईसाई, दलित, आदिवासी- यह सोचने लगे हैं कि क्या वे दूसरे दर्जे के नागरिक हो गए हैं? मैं अपने स्कूल के और कॉलेज के दिनों को याद करता हूं, जब कोई इस बात पर ध्यान नहीं देता था या इसकी परवाह नहीं करता था कि आपका सहपाठी या कक्षानायक मुसलिम है या ईसाई। मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज हाई स्कूल की स्थापना स्कॉटिश मिशनरियों ने की थी। प्रसिद्ध कुरुविला जैकल पच्चीस साल तक हेडमास्टर रहे। विद्यार्थियों में मुख्य रूप से हिंदू थे, हालांकि उनमें ईसाई भी अच्छी संख्या में थे, और छिटपुट रूप से मुसलिम भी। एक मुसलिम पूरे छह साल तक मेरा कक्षानायक रहा। आज मैं इन तथ्यों को याद करता हूं- अविश्वास के भाव के साथ? इन तथ्यों की तरफ उन दिनों कभी हमारा ध्यान नहीं जाता था। अधिकतर छात्रों ने नैतिक शास्त्र के बजाय बाइबिल की कक्षा का चुनाव किया था, पर धर्मान्तरण का एक भी मामला सामने नहीं आया था। हमारे कॉलेज के शिक्षकों में विदेशी (मुख्य रूप से आयरिश) और भारतीय जेसुइट्स थे। मैंने फादर कॉयले से सीखा कि सही अंग्रेजी कैसे लिखी और बोली जाती है। किसी ने भी मुझे या अन्य को धर्मान्तरित करने की कोशिश नहीं की। यह देश अपने मुसलिम, ईसाई, जैन, बौद्ध, सिख और पारसी नागरिकों का ऋणी है जिन्होंने अनेक क्षेत्रों में महान योगदान किए हैं- उद्योग, साहित्य, कला, संगीत, खेल, राजनीति, आदि। कुछ पल के लिए अपनी आंखें बंद कर लें और उन नामों को याद करें; आप संख्या और वैविध्य देख चकित रह जाएंगे।

स्वाभाविक डर

अगर धार्मिक अल्पसंख्यकों को लगता है कि उनका दिल डूब रहा है, कि उनकी जगह ‘दूसरे दर्जे के नागरिक’ की होती जा रही है, तो हम गणराज्य तो क्या, लोकतंत्र कहे जाने लायक भी नहीं हैं। रिबेरो का यह रोना कि ‘अगर हमारे देश में यह होता है तो यह इसे भगवा पाकिस्तान बनाने जैसा ही होगा’, पूरी तरह सही है। मोदी सरकार के तहत और राज्यों में उनके साथियों के तहत, वाजपेयी सरकार के विपरीत, असहिष्णुता सामान्य स्थिति हो गई है। गाली-गलौज अब नई शब्दावली है। नफरत नया हथियार है। डराना नई रणनीति है। ध्रुवीकरण नया चुनावी दांव है। फिर भी, उम्मीद जगती है, जब तबस्सुम- एक मुसलिम उम्मीदवार- को उत्तर प्रदेश की एक लोकसभा सीट के उपचुनाव में जीत मिलती है। जब तक आर्कबिशप काउटो और जूलियो रिबेरो जैसे लोग बोल और लिख सकते हैं और तब्बसुम जैसे उम्मीदवार निर्वाचित हो सकते हैं, भारत में लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा।

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