ताज़ा खबर
 

दूसरी नजर: दो घोषणापत्रों की कहानी

दोनों घोषणापत्रों में फर्क का जो बड़ा कारण है वह मोदी-केंद्रित दृष्टि और आमजन के प्रति दृष्टि का फर्क है। भाजपा का घोषणापत्र सिर्फ श्री मोदी के ज्ञान और बुद्धिमान पुरुषों और महिलाओं को सुनने की उनकी अनिच्छा तक ही सीमित है।

Author April 14, 2019 6:01 AM
पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम

भाजपा का चुनावी घोषणापत्र आठ अप्रैल को लगभग बिना किसी शोर-शराबे के जारी हुआ। भाजपा के लिए ऐसी सादगी अस्वाभाविक है! इसके कई कारण हैं। जैसा कि एक तमिल व्यंग्य है, भाजपा का घोषणापत्र नाश्ते के बाद बची हुई इडलियों से रात को खाने के लिए उपमा बनाने की तरह है! एक कहावत है कि स्वाद का पता खाने के बाद ही चलता है। कांग्रेस का घोषणापत्र जारी हुए बारह दिन हो चुके हैं और अब भी यह चर्चा में है। प्रधानमंत्री मोदी अपने किसी भाषण को बिना कांग्रेस घोषणापत्र की बातों का जिक्र किए पूरा कर ही नहीं सकते। वे इस बारे में न तो पढ़ते हैं, न कुछ सुनने के लिए तैयार हैं और झूठ बोलने में उन्हें कोई शर्म महसूस नहीं होती। मैं चाहता हूं कि भाजपा में कोई प्रधानमंत्री को कांग्रेस का घोषणापत्र या कम से कम मेरा पिछले हफ्ते (सात अप्रैल) छपा लेख पढ़वाने की हिम्मत दिखाए।

भाजपा की डींगें
जारी होने के एक दिन बाद ही भाजपा का घोषणापत्र चर्चा का विषय नहीं रहा। इसकी अनुवाद और छपाई संबंधी गलतियों को छोड़ भी दे सकते हैं, लेकिन इस पूरे दस्तावेज में जिस तरह का अहंकार झलक रहा है, उसे कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है?
मैं इन डींगों के बारे में बताता हूं-
– आयुष्मान भारत का धन्यवाद, जिससे पचास करोड़ भारतीयों को स्वास्थ्य बीमा मिला (तथ्य- आयुष्मान भारत योजना का लाभ सिर्फ अस्पताल में भर्ती होने पर ही मिलता है, और चार फरवरी, 2019 तक इस योजना के तहत सिर्फ दस लाख उनसठ हजार छह सौ तिरानवे लाभार्थी ही अस्पताल में भर्ती हुए हैं और इलाज करवाया है)।
– असंगठित क्षेत्र के चालीस करोड़ से ज्यादा लोग अब पेंशन योजना का लाभ उठा सकते हैं।
(तथ्य- इस योजना के तहत अब तक सिर्फ अट्ठाईस लाख छियासी हजार छह सौ उनसठ लोगों ने ही पंजीकरण करवाया है। अब या निकट भविष्य में किसी को भी इसका लाभ नहीं मिल पाएगा)।
– अब तक हम निन्यानवे फीसद स्वच्छता का लक्ष्य हासिल करने के करीब हैं।
(तथ्य- इस बात के ढेरों सबूत हैं कि बड़ी संख्या में जल्दबाजी में जो शौचालय बनाए गए थे, वे इस्तेमाल नहीं होने (लोगों की आदत की वजह से) या फिर पानी की कमी के कारण बेकार हो गए। इसके अलावा, श्री बेजवाडा विल्सन से पूछिए, वे आपको बताएंगे कि यह योजना स्थायी रूप से सेप्टिक टैंक बनाने और मैला ढोने को खत्म करने के लिए बनाई गई थी)।
– मुद्रा योजना का आभार, जिसकी वजह से छोटे शहरों और कस्बों के नौजवानों का उद्यमी बनना संभव हो पाया है।
(तथ्य- मुद्रा लोन का औसत आकार 47575 रुपए है और इतने कर्ज से अगर एक रोजगार भी सृजित हो जाए तो यह अपने में बड़ा चमत्कार होगा)।
– अब एक से ज्यादा कई तरह से पूर्वोत्तर राष्ट्र की मुख्यधारा के करीब है।
(तथ्य- राष्ट्रीय नागरिक पंजिका की कवायद और नागरिक (संशोधन) विधेयक ने तो और कबाड़ा करके रख दिया है और पहले के मुकाबले पूर्वोत्तर बाकी भारत से कहीं ज्यादा दूरी महसूस कर रहा है और ऐसा अविश्वास भी जो पहले कभी नहीं देखा गया)।
– नोटबंदी, जीएसटी… हमारी सरकार की ऐतिहासिक उपलब्धियां रही हैं।
(तथ्य- नोटबंदी ने भारतीय अर्थव्यवस्था को चौपट करके रख दिया और खामियों भरे जीएसटी ने उद्योग-धंधों, खासकर छोटे और मझोले उद्योगों को रुला डाला। )

व्यक्ति विशेष बनाम आम आदमी
ये उदाहरण पर्याप्त हैं। अब जरा घोषणापत्र बनाने के तरीके पर नजर डाल लें। घोषणापत्र समिति के अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह ने दावा किया कि उन्होंने करोड़ों लोगों से संपर्क किया था और दस्तावेज ‘लोगों की इच्छा’ से प्रेरित है। इस दावे की पोल तो परिचय के आखिरी अनुच्छेद से ही खुल जाती है, जिसमें कहा गया है- ‘यह सार प्रधानमंत्री मोदी की दूरदृष्टि पर आधारित है’। कांग्रेस के घोषणापत्र और भाजपा के घोषणापत्र में यही फर्क है और जब हम दोनों पार्टियों के घोषणापत्रों को देखते हैं तो यह फर्क एकदम साफ हो जाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक सुरक्षा को ही लें। भाजपा ने सशस्त्र बलों को मजबूत करने के लिए और रक्षा उपकरणों के स्वदेशी उत्पादन की बात कही है। हर सरकार ने यह किया है और ऐसा ही भविष्य में करेगी भी। इसके आगे, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद, या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड या राष्ट्रीय आतंकवाद-निरोधी केंद्र (एनसीटीसी) या नेटग्रिड के बारे में घोषणापत्र में एक शब्द नहीं कहा गया। डाटा सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, वित्तीय सुरक्षा, संचार सुरक्षा या व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा के बारे में कोई जिक्र नहीं है। कृषि को लें। भाजपा ने किसानों की आय दोगुनी करने जैसे पूरे न हो सकने वाले वादे को ही दोहराया है, लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कोई उपाय नहीं सुझाया गया है। कांग्रेस ने एपीएमसी कानून को रद्द करने, किसानों का बाजार बनवाने और कृषि उपज के लिए व्यापार को सभी प्रतिबंधों से मुक्त करने, जिसमें निर्यात और अंतरराज्यीय व्यापार भी शामिल है, जैसे बड़े और साहसी कदम उठाने का वादा किया है। स्कूली शिक्षा को लें। भाजपा ने लगभग उन्हीं वादों पर जोर दिया है जैसे गुणवत्ता, स्मार्ट कक्षाएं, और ज्यादा केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय। जबकि कांग्रेस ने स्कूली शिक्षा को राज्य सूची में हस्तातंरित करने, शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने, शिक्षा के लिए बजट आवंटन बढ़ा कर जीडीपी का छह फीसद करने और कक्षा नौ से बारह तक के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण अनिवार्य करने का वादा किया है।

गणित की पहेली
दोनों घोषणापत्रों में फर्क का जो बड़ा कारण है वह मोदी-केंद्रित दृष्टि और आमजन के प्रति दृष्टि का फर्क है। भाजपा का घोषणापत्र सिर्फ श्री मोदी के ज्ञान और बुद्धिमान पुरुषों और महिलाओं को सुनने की उनकी अनिच्छा तक ही सीमित है। अब मैं एक पहेली के साथ इसका समापन करता हूं। भाजपा ने कांग्रेस के न्याय के वादे पर हमला बोला और कहा कि जब यह कार्यक्रम पूरी तरह लागू हो जाएगा और पांच करोड़ परिवार इसमें आ जाएंगे तो हर साल तीन लाख साठ हजार करोड़ खर्च होंगे जो वित्तीय रूप से व्यावहारिक नहीं होगा और बोझ पड़ेगा। फिर भी, भाजपा पक्के भरोसे के साथ यह दावा करती है कि वह पांच साल में कृषि-ग्रामीण क्षेत्र में पच्चीस लाख करोड़ का निवेश करेगी और सौ लाख करोड़ रुपए ढांचागत क्षेत्र पर खर्च करेगी। यानी दोनों मिलाकर एक सौ पच्चीस लाख करोड़ रुपए हुए और इसे पांच से भाग दे दिया जाए तो पच्चीस लाख करोड़ रुपए सालाना हुए। बताइए, 3.6 लाख करोड़ सालाना ज्यादा है या पच्चीस लाख करोड़ सालाना?

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App