P Chidambaram article new inning of Imran Khan as pm of pakistan - दूसरी नजरः इमरान खान की नई पारी - Jansatta
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दूसरी नजरः इमरान खान की नई पारी

भारत में कुछ वर्ग ऐसे भी हैं, जिन्हें पाकिस्तान की नई सरकार से बड़ी उम्मीदें हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जिन्होंने चुनाव को ही खारिज कर दिया और सरकार को सतर्क रहने को कहा है।

Author August 5, 2018 4:07 AM
इमरान खान मुश्किल विकेट पर सावधान रहते हैं।

पाकिस्तान क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान इमरान खान 11 अगस्त, 2018 को पाकिस्तान के अगले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ लेंगे। उनकी जीत को लेकर पहले से कोई भविष्यवाणी नहीं की गई थी, हालांकि ये अफवाहें तो चल रही थीं कि वे सेना के पसंदीदा उम्मीदवार थे और इसलिए उनकी जीत पक्की मानी जा रही थी। इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआइ) को स्पष्ट बहुमत तो नहीं मिला, लेकिन ऐसे बहुमत के करीब पहुंच ही गई, जिसमें औरों की मेहरबानी से काम बन जाए (116 सीटें हासिल कीं, जबकि सामान्य बहुमत के लिए 137 सीटों की जरूरत होती है)। चुनाव के मौके पर यह भविष्यवाणी की गई थी कि नवाज शरीफ की पार्टी (पीएमएल-एन) सत्ता में लौटेगी। इसके अलावा दिवंगत बेनजीर भुट्टो की पार्टी- पीपीपी- की जीत के लिए भी शर्तें लगी हुई थीं, जिसमें बिलावल भुट्टो जरदारी ने कुछ रैलियां की थीं। संयोग से पीटीआइ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी।

अतिवादी सोच गलत

भारत में कुछ वर्ग ऐसे भी हैं, जिन्हें पाकिस्तान की नई सरकार से बड़ी उम्मीदें हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जिन्होंने चुनाव को ही खारिज कर दिया और सरकार को सतर्क रहने को कहा है। दोनों ही गलत हैं। हमें पाकिस्तान की संघीय सरकार की प्रकृति को समझना चाहिए। आजादी के इकहत्तर सालों में इकतीस साल पाकिस्तान में फौज का शासन रहा है। नागरिक (निर्वाचित) सरकारें थोड़े-थोड़े वक्त के लिए ही रहीं और वह भी सैन्य प्रतिष्ठान की मेहरबानी की बदौलत। पाकिस्तान की सत्ता में सेना, नागरिक सरकार (जब कभी रही है) और गैर-सरकारी ताकतों की भागीदारी रहती है। भारत से संबंधित मामलों, खासतौर से जम्मू-कश्मीर के मामले में कुल मिलाकर इन तीनों में से किसी की भी अनदेखी नहीं की जा सकती। फिर भी, सत्ता के लिए मची धक्कमपेल में चौंकाने वाली बातें सामने आ सकती हैं और इमरान खान अपने लिए और ज्यादा जगह बनाने में कामयाब हो सकते हैं।

नई सरकार निश्चित ही नेक इरादे के साथ शुरुआत करेगी। इमरान खान की सरकार शांति, विकास, वृद्धि दर, पड़ोसियों के साथ रिश्तों, अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता जैसे मसलों के बारे में बातचीत शुरू करेगी, और ऐसा करना शुरू भी कर दिया है। और खान के शब्दों में- कश्मीर जैसे महत्त्वपूर्ण मसले का हल भी निकालेगी। भारत को यह सीमित मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहिए, जो उसे पहले छह से बारह महीनों के बीच मिलने वाला है। भारत को पाकिस्तान पर उन सभी मामलों के समाधान के लिए दबाव बनाना चाहिए, जिन्हें दोनों देश मिल कर हल कर सकते हैं, और इसमें कश्मीर का मुद्दा प्रभावित नहीं होना चाहिए। जाहिर है, इन मुद्दों में व्यापार, बस और रेल सेवाएं, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, तीर्थयात्रियों को आने-जाने की इजाजत, पर्यटन वीजा और खेल प्रतियोगिताएं फिर से शुरू करने जैसे मसले हैं। इन मुद्दों के समाधान से लंबे समय से चला आ रहा कश्मीर मुद्दा तो हल नहीं होगा, लेकिन इससे भारत और पाकिस्तान की जनता को ‘पड़ोसी के साथ विवाद’ जैसे बिंदु पर सोच-विचार का मौका मिलेगा और साथ ही यह धारणा भी बनेगी कि दोनों एक-दूसरे के स्थायी दुश्मन नहीं हैं। तमाम मसलों पर दोनों देशों को रिश्ते सामान्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ते हुए छोटे-छोटे लाभ हासिल करने की कोशिश करने चाहिए, जैसा कि सामान्य रूप से दो पड़ोसी करते हैं।

‘शांति’ की स्थापना

भारत का हित सीमा पर घुसपैठ को रोकने, आतंकवादियों का सफाया करने और कश्मीर विवाद का सम्मानजनक हल निकालने में है। इसके अलावा सियाचिन और सरक्रीक के दो विवादस्पद मुद्दे भी हैं। अगर इन सब मुद्दों के करीब पहुंच कर ‘शांति’ कायम हो सकती है, तो मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि इमरान खान और उनकी सरकार ऐसा करेगी। इसलिए हमें उन मुद्दों को एक तरफ रखना चाहिए, जिनमें लक्ष्य हासिल नहीं हो सकते हैं। क्या हम सीमा पर संघर्षविराम कर शांति हासिल कर सकते हैं, जो कि किया भी जा सकता है और हमने कई साल ऐसा किया भी। हम घुसपैठ खत्म करके शांति स्थापित कर सकते हैं, जो कि काफी हद तक समझौते के जरिए हासिल किया जा सकता है। इस तरह के समझौते में दोनों देशों को साझा गश्त और सीमा सुरक्षा संबंधी दूसरे मुद्दे शामिल करने होंगे। अगर हम शांति कायम करने के लिए पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान पर इस बात के लिए दबाव बनाते रहें कि वह आतंकी संगठनों को सक्रिय समर्थन देना बंद करे तो आंशिक रूप से इस लक्ष्य को भी धैर्य और संयम की कूटनीति के माध्यम से हासिल किया जा सकता है।

मुंबई आतंकी हमले की याद आज भी हमें आहत करती है। इस हमले को अंजाम देने वालों, जिनकी पहचान हो चुकी है और जो पाकिस्तान में रह रहे हैं, को जब तक सजा नहीं हो जाती, तब तक मुंबई हमले का मसला शांत नहीं होगा। इस हमले में एक सौ छियासठ लोग मारे गए थे। इमरान खान का इस तरफ ध्यान दिला सकते हैं (मैं ‘सकते’ का प्रयोग सुझाव के रूप में करता हूं) और ऐसा करके वे आतंकवाद के विरोधी और लोकतंत्रिक होने के रूप में अपनी साख बना सकते हैं। हाफिज सईद पर फिर से मुकदमा चलाने और दूसरे ज्ञात दोषियों को न्याय के कठघरे में लाने के लिए अगर हम उनकी सरकार का रुख टटोलने की संभावनाओं का पता लगाते हैं, तो इसमें कुछ भी नहीं जाने वाला। इमरान खान ने कहा है कि अगर भारत एक कदम आगे बढ़ेगा तो वे दो कदम बढ़ने के लिए तैयार रहेंगे। प्रधानमंत्री पद की शपथ के मौके पर इसकी झलक मिल भी सकती है, लेकिन अगर हम इमरान खान को उनके शब्द याद दिलाएं और उसके मुताबिक उनसे करने की अपील करें, तो इसमें कुछ भी खोने जैसी बात नहीं है।

संतुलित उपलब्धियों का लक्ष्य

आवेग वाले कदमों से नीतियां नहीं बनती हैं। फैसले बदलते रहना नीति नहीं होती है। मुंबई हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध की घोषणा नहीं की। न ही भारत ने पाकिस्तान के साथ ‘कोई वार्ता नहीं’ का एलान किया। इससे शुरू में थोड़ी अप्रिय स्थिति तो बनी, लेकिन थोड़ा हासिल भी हुआ। 2008 से 2014 के बीच भारत में ऐसी कोई आतंकी घटना नहीं हुई, जिसके तार सीधे पाकिस्तान से जुड़े मिले हों और संभवत: पाकिस्तान ने कुछ हद तक तो प्रतिबंध लगाया। इसके अलावा 2010 से 2014 के बीच जम्मू-कश्मीर में भी आतंकी घटनाओं और हताहतों की संख्या में कमी देखने को मिली।

इमरान खान मुश्किल विकेट पर सावधान रहते हैं। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था काफी कमजोर है और गंभीर संकटों का सामना कर रही है। विदेशी कर्ज बढ़ता जा रहा है। अतंरराष्ट्रीय समुदाय में भी पाकिस्तान अलग-थलग पड़ चुका है। इमरान खान को सरकार चलाने का कोई तजुर्बा भी नहीं है। वे भी ठोस सुधार चाहते हैं। मुख्य शब्द है संतुलित। संतुलित पहल, सुधार की उम्मीदें और ठोस नतीजे, जो इमरान खान और उनकी सरकार के साथ काम करने से हासिल हो सकते हैं।

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