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दूसरी नजर- मकतूल और कातिल

जोन आॅफ आर्क को खंभे से बांध कर जला दिया गया था। सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ा। सर थॉमस मोर का सिर काट दिया गया। इन सबको अपने विश्वासों की कीमत चुकानी पड़ी।
Author October 8, 2017 04:17 am
पत्रकार गौरी लंकेश की अज्ञात हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी। (तस्वीर- फेसबुक)

जोन आॅफ आर्क को खंभे से बांध कर जला दिया गया था। सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ा। सर थॉमस मोर का सिर काट दिया गया। इन सबको अपने विश्वासों की कीमत चुकानी पड़ी। हाल में हुई पांच हत्याओं नेभारत के लोगों के अंत:करण को झकझोर दिया है। मीडिया का ध्यान इस पर है कि इनमें से हरेक मामले में हत्यारा कौन था। संबंधित राज्य की पुलिस हत्यारे या हत्यारों की तलाश में जुटी हुई है। कुछ गिरफ्तारियां हुई हैं, पर किसी भी मामले की गुत्थी फिलहाल सुलझती नहीं दिखती। मीडिया और पुलिस का ध्यान हत्यारों का पता लगाने पर है, तो दोनों अपनी जगह सही हैं। पर मैं जरा एक भिन्न सवाल उठाऊंगा। मेरे खयाल से यह अहम है कि लोग पूछें कि कौन मारा गया? जो मारे गए उनमें से हरेक के नाम, जीवन और कार्यों से हम अवगत हैं, पर इन हत्याओं को हम तभी समझ पाएंगे जब इन सारी सूचनाओं को एक सांचे में रखें।

नरेंद्र दाभोलकर (1945-2013)
नरेंद्र दाभोलकर एक चिकित्सक थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि वे भारतीय कबड््डी टीम के सदस्य थे और बांग्लादेश के साथ मुकाबले में खेले थे। जो चीज उनके विरोधियों को नागवार गुजरी वह यह थी कि वे महाराष्ट्र के सबसे प्रमुख बुद्धिवादी थे और अंधविश्वास की मुखालफत करते थे। दाभोलकर ने एक दर्जन से ज्यादा किताबें लिखीं, सोलह साल तक एक साप्ताहिक का संपादन किया, महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की स्थापना की, और दस हजार से ज्यादा शिक्षकों को प्रशिक्षित किया कि कैसे अंधविश्वास से लड़ें तथा विद्यार्थियों को वैज्ञानिक ढंग से सोचने के लिए प्रेरित किया। कई साल पहले उन्होंने अंधविश्वास तथा काला जादू निरोधक विधेयक का मसविदा तैयार किया था। विडंबना यह है कि इस मसविदेपर आधारित एक अध्यादेश, दाभोलकर की हत्या (20 अगस्त 2013) के चार दिन बाद राज्य सरकार द्वारा जारी किया गया।
गोविंद पानसरे (1933-2015)
गोविंद पानसरे आजीवन कम्युनिस्ट रहे। वे एक गरीब परिवार में पैदा हुए थे और अखबार बेचने से लेकर नगरपालिका के चपरासी जैसे मामूली पैसे वाले काम किए। वे वकील बने और श्रम कानूनों से जुड़े मजदूरों के मुकदमे लड़ते थे। वे एक जाने-माने लेखक भी थे और उन्होंने मराठी में एक किताब लिखी- शिवाजी कौन थे? वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रदेश सचिव थे और श्रमिक नगरी सहकारी पाटसंस्था (एक कोआॅपरेटिव बैंक) की स्थापना की। अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक विवाह करने वाले युगलों के लिए वे एक आश्रय केंद्र चलाते थे, जिसके कारण उन्हें बहुत तीखी आलोचनाएं झेलनी पड़ीं।

एमएम कलबुर्गी (1938-2015)
एमएम कलबुर्गी जाने-माने प्रोफेसर थे और हंपी स्थित कन्नडा विश्वविद्यालय के कुलपति रह चुके थे। वे एक उर्वर लेखक थे और 2006 में साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किए गए। उन्होंने अंधविश्वास के खिलाफ लिखा और बोला तथा मूर्तिपूजा का भी विरोध किया। इससे दक्षिणपंथी समूह उन पर कुपित हो गए। कलबुर्गी और यूआर अनंतमूर्ति के खिलाफ 2015 में एक मामला दर्ज किया गया- ‘धार्मिक भावनाओं को चोट पहुंचाने’ का, एक पुस्तक को आधार बना कर, जो अठारह साल पहले प्रकाशित हुई थी!

गौरी लंकेश (1962-2017)
गौरी लंकेश वामपंथी और जुझारू कार्यकर्ता थीं। वे वामपंथियों के मुद््दों का समर्थन करती थीं, जिनमें नक्सलवादियों द्वारा उठाए गए मुद््दे भी शामिल थे। उन्होंने उन नक्सल कार्यकर्ताओं के पुनर्वास में मदद की, जो मुख्यधारा में लौटना चाहते थे। गौरी एक टैबलॉयड की संपादक व प्रकाशक थीं, जो गरीबों तथा दलितों के पक्ष में और सत्ता की मुखालफत में तथा दक्षिणपंथियों समूहों व हिंदुत्ववादी नीतियों के विरोध में मुखर रहता था। अपनी हत्या से पहले, कुछ महीने उन्होंने झूठी खबरों (फेक न्यूज) के खिलाफ अभियान चलाया। उन्हें धमकियां मिलती रहती थीं, पर उन्होंने इसकी परवाह नहीं की और अंतिम घड़ी तक निडर बनी रहीं।

शांतनु भौमिक (1989-2017)
शांतनु भौमिक अगरतला (त्रिपुरा) से प्रसारित होने वाले एक टीवी चैनल के युवा रिपोर्टर थे। महीने के बस छह हजार रु. उन्हें मिलते थे। उन्हें एक ऐसे दिलेर पत्रकार के रूप में याद किया जाएगा, जो घटनास्थल पर सबसे पहले पहुंचने और दूसरों से पहले खबर देने के लिए तत्पर रहता था। शांतनु अपने घर से ‘मानबिक’ नाम का एक छोटा-सा नर्सरी स्कूल भी चलाते थे। वे ‘इंडीजिनस पीपल्स फ्रंट आॅफ त्रिपुरा’ के एक आंदोलन को कवर कर रहे थे, जो उनकी आखिरी ड्यूटी साबित हुई।  उपर्युक्त में से कोई भी धनी व्यक्ति नहीं था (‘धनी’ इस अर्थ में जो कि अमूमन गरीबों के शोषण से जुड़ा होता है)। किसी के पास राजनीतिक सत्ता नहीं थी, वे इसके आकांक्षी भी नहीं थे। हत्या के समय, इनमें से कोई भी, महत्त्वपूर्ण पद पर नहीं था। इनमें से किसी का भी हिंसा में यकीन नहीं था। तीन वृद्ध थे, एक अधेड़, और एक युवा।

इन पांचों में से हरेक सुशिक्षित था और जाहिर है विचारों तथा बहस की दुनिया में अपने को सहज अनुभव करता था। विचारों से किसी को डर नहीं लगना चाहिए। पर ऐसे बहुत-से लोग हैं जो अपने विचारों तथा दूसरे पक्ष के विचारों पर विचार-विमर्श तथा बहस से डरते हैं। मुझे हैरानी है कि अंधविश्वास-विरोध, मूर्तिपूजा-विरोध और वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेकर कोई इतना कुपित हो सकता है कि हत्या करने की हद तक चला जाए? वे कौन हैं जिन्हें कुछ अंतर-धार्मिक और अंतर-जातीय विवाह इतने नागवार गुजरते हैं? वे कौन हैं जिनके लिए, अपने को वामपंथी कहने वाला एक शख्स असह्य हो गया, जबकि देश में हजारों लोग हैं जो खुद को वामपंथी कहते हैं? वे कौन हैं जो एक आदिवासी समूह के आंदोलन को कवर करते एक युवा, निर्भीक पत्रकार से खतरा महसूस करते थे?इन जघन्य हत्याओं में संभवत: जिस व्यक्ति या जिन व्यक्तियों का हाथ होगा उनके बारे में अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है।

यह लगभग निश्चित है कि वे दक्षिणपंथी समूहों से जुड़े होंगे। वे गहरे अनुदारवादी हैं, प्रतिक्रियावादी होने की हद तक। उन विचारों को वे सह नहीं सकते, जो उनके अपने विचारों को चुनौती देते हैं। वे बोलने की आजादी और भारत की विविधता पर सवाल उठाते हैं। वे असहिष्णु हैं। वे नफरत फैलाते हैं। जब वे अपनी तरह से सोचने वाले लोगों के बीच होते हैं, उनका हौसला बुलंद रहता है, और जब वे झुंड में होते हैं, हिंसा पर उतर आते हैं- हत्या भी कर सकते हैं। यह पृष्ठभूमि यह पता लगाने में जांच एजेंसियों की मदद कर सकती है कि हत्यारा या हत्यारे कौन थे। चार मामलों में कुछ प्रमुख संदिग्धों के नाम समान हैं, और कुछ भगोड़ा घोषित किए गए हैं। इस बीच, नफरत तथा डर फैलाने का सिलसिला जारी है, और हमारे सिर शोक व शर्म से झुके हुए हैं।

 

 

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