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दूसरी नजरः बहस और सवाल, मगर कोई जवाब नहीं

शुक्रवार, 20 जुलाई को सरकार अनिच्छा से अविश्वास के प्रस्ताव पर बहस कराने को राजी हुई। नरेंद्र मोदी सरकार के चार साल दो महीने में यह पहली बार लाया गया अविश्वास प्रस्ताव था।

Author July 29, 2018 3:28 AM
संसद में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (फाइल फोटो)

शुक्रवार, 20 जुलाई को सरकार अनिच्छा से अविश्वास के प्रस्ताव पर बहस कराने को राजी हुई। नरेंद्र मोदी सरकार के चार साल दो महीने में यह पहली बार लाया गया अविश्वास प्रस्ताव था। सदस्यों ने ढेर सवाल उठाए। आपकी तरह ही, मुझे भी जवाबों का इंतजार रहा, विशेष रूप से अर्थव्यवस्था से जुड़े सवालों को लेकर। उस डेढ़ घंटे में प्रधानमंत्री से देश को जो और जैसे जवाब सुनने को मिले, उनमें कांग्रेस पर हमले ज्यादा थे, उबाऊ किस्म के वाक्यों का दोहराव (मैं कामदार हूं) था, सरकारी विज्ञप्तियों का ज्यादा से ज्यादा गुणगान, और पूरी तरह आत्मश्लाघा में डूबे हुए यह कहना कि गरीबों के दुखों में मैं भी भागीदार हूं, नौजवानों के सपनों में मैं भी भागीदार हूं- जैसी बातें थीं। देश के चारों कोनों से सवाल पूछे जा रहे हैं। इसलिए, इस लेख में मैं उनसे पूछता हूं (और जो सही जवाब होंगे, सामने रखूंगा)।

संकट में अर्थव्यवस्था

सवाल- आर्थिक वृद्धि के संदर्भ में, मोदी सरकार का सबसे खराब साल कौन-सा रहा और क्यों?

जवाब- 2017-18, क्योंकि सरकार ने सुधारों को बीच में ही छोड़ दिया और नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था पुराने ढर्रे पर लौट आई। लगता है, सरकार ने नियंत्रण, आयात विकल्प, मूल्य नियंत्रण, मात्रात्मक प्रतिबंधों, गैर-शुल्क अवरोधों, पूर्व प्रभावी कानूनों और दंडात्मक कानूनों में खूबियां खोज ली हैं।

सवाल- अभी तक सुधार के संकेत क्यों नहीं नजर आ रहे हैं?

जवाब- ऐसा इसलिए है, क्योंकि 2013-14 में सकल जमा पूंजी निर्माण (निवेश अनुपात) तेजी से गिरता हुआ जीडीपी के 31.3 फीसद तक आ गया था, और पिछले चार साल से यह 28.5 फीसद पर स्थिर बना हुआ है।

सवाल- ‘उद्योग’ खासतौर से विनिर्माण क्षेत्र की हालत क्या है?

जवाब- औद्योगिक उत्पादन का सूचकांक दिसंबर, 2016 से अक्तूबर, 2017 के बीच 2.6 फीसद के न्यूनतम स्तर पर चला गया था। नवंबर, 2017 से फरवरी, 2018 के बीच इसमें सुधार के कुछ संकेत नजर आए थे। हालांकि मार्च, अप्रैल और मई में वृद्धि दर फिर से लड़खड़ने लगी और यह क्रमश: 4.6 फीसद, 4.8 फीसद और 3.2 फीसद रही। मुख्यरूप से विनिर्माण क्षेत्र में मंदी की हालत बनी रही।

कम निवेश, रोजगार भी नहीं

सवाल- वृद्धि दर में आई कमी क्या चौंकाने वाली है?

जवाब- नहीं, क्योंकि वृद्धि ऋण पर निर्भर होती है, और ज्यादातर महीनों में उद्योगों को दिए जाने वाले बैंकों के उधार में वृद्धि करीब एक फीसद के करीब ही रही है, और कई बार तो यह शून्य से भी नीचे चली गई है। बैंकों से कर्ज नहीं मिलने की वजह से सबसे ज्यादा मार छोटे और मझोले उद्योगों को झेलनी पड़ी है।

सवाल- कर्ज में वृद्धि दर इतनी सुस्त क्यों है?

जवाब- कर्ज में वृद्धि के लिए बैंकों का दुरुस्त होना जरूरी है। आरबीआइ की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट) बताती है कि मार्च, 2018 में बैंकों का सकल एनपीए अनुपात बढ़ता हुआ 11.6 फीसद तक पहुंच गया, जो सितंबर, 2017 में 10.2 फीसद था। सरकार इसे लेकर भ्रमजाल की स्थिति में पड़ गई और ऐसी घबराहट में उसे इससे निपटने के लिए यही रास्ता सूझा कि करदाताओं के पैसे को बैंकों में डाला जाए या फिर दिवालिया होने जा रहे बैंक (आइडीबीआइ) को एलआइसी को बेच दिया जाए।

सवाल- निवेश के मामले में स्थिति क्या है?

जवाब- 2017-18 में नई निवेश परियोजनाओं की घोषणा के बाद इसमें 38.4 फीसद की गिरावट आई है। इसी तरह पिछले साल की निवेश परियोजनाओं के पूरा होने में 26.8 फीसद की गिरावट दर्ज की गई है। एफडीआइ भी 15 फीसद गिरा है।

कई खामियां

सवाल- क्या रोजगार के नए अवसर बन रहे हैं?

जवाब- नहीं। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग ऑफ इंडियन इकॉनोमी (सीएमआइई) के मुताबिक 2017-18 में नियुक्त कामगारों की संख्या चालीस करोड़ बासठ लाख थी, जबकि इससे पिछले साल यानी 2016-17 में यह आंकड़ा चालीस करोड़ सड़सठ लाख था। तमिलनाडु के उद्योग मंत्री ने वहां की विधानसभा में बताया कि 2017-18 में पचास हजार छोटे और मझोले उद्योग बंद हो गए थे और नोटबंदी के कारण राज्य में पांच लाख लोगों का रोजगार छिन गया था।

सवाल- मुद्रास्फीति को लेकर क्या मानना है?

जवाब- जून में थोक मुद्रास्फीति 5.8 फीसद थी, पिछले साढ़े चार साल में सबसे ज्यादा। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति जून में पांच फीसद थी, जो आगे बढ़ भी सकती है। जून में आरबीआइ ने नीतिगत दरें बढ़ाई थीं, और अगस्त में फिर ऐसा हो सकता है।

सवाल- कृषि क्षेत्र के संकट से निपटने के लिए सरकार ने क्या किया है?

जवाब- कुछ नहीं। डॉ. अरविंद सुब्रह्मण्यम द्वारा तैयार किए गए आर्थिक सर्वे में इस बात को स्वीकार किया गया है कि वर्ष 2014 से वास्तविक कृषि आय स्थिर है। किसान संगठनों और जानेमाने कृषि वैज्ञानिकों और अर्थशास्त्रियों (जैसे डा. एमएस स्वामीनाथन और डॉ. अशोक गुलाटी) के बीच यह सर्वसम्मत विचार देखने को मिला है कि हाल में एमएसपी बढ़ाने की जो घोषणा हुई है, वह सिर्फ एक जुमला था। इसमें धान, गेहूं और कपास शामिल नहीं किया गया था। इसी तरह कई राज्यों में भी दूसरे उत्पादनों को छोड़ दिया गया। इससे ज्यादातर किसानों को कोई फायदा नहीं होने वाला।

सवाल- क्या वृहद आर्थिकी की हालत संतोषजनक है?

जवाब- मुश्किल से ही। 2017-18 में चालू खाते का घाटा बढ़ता हुआ 1.87 फीसद पर पहुंच गया है, जो कि 2013-14 के बाद सबसे ज्यादा है। और 2018-19 में यह दो फीसद से भी ऊपर निकल सकता है। बढ़ते व्यापार युद्ध भारत के लिए अच्छे नहीं होंगे। पिछले चार साल में व्यापारिक वस्तुओं का निर्यात शून्य से नीचे चला गया है और व्यापार संतुलन की स्थिति बेहद खराब है। रुपया तेजी से गिर रहा है। 23 जून को डॉलर के मुकाबले रुपया 64.50 रुपए था, जो 24 जुलाई को 69.05 रुपए पर पहुंच गया। 2018-19 में सरकार को वित्तीय घाटे का 3.3 फीसद का लक्ष्य हासिल करने में भी खासी मशक्कत करनी पड़ेगी।

इन सबका मतलब यह है कि अर्थव्यवस्था गंभीर स्थिति में है और इसे अभी नोटबंदी, जीएसटी का बहुत ही खराब तरीके से क्रियान्वयन, कर-आतंकवाद जैसे सरकार के जख्म देने वाले कदमों से उबरना है। भाजपा की हताशा और बढ़ेगी, उसकी चिल्लाहट भी बढ़ेगी, सीना ठोकने वाला राष्ट्रवाद का शब्दाडंबर भी और बढ़ेगा, और इसके साथ ही धर्म और जाति के आधार पर मतदाताओं को बांटने की कोशिशें भी तेज होंगी। प्रधानमंत्री ने अपने जवाब में जो कहा, यह उन सबका प्रमाण था। प्रस्ताव खारिज हो गया, जो लोगों के सवालों का जवाब देने का मौका था।

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