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पुस्कायनः जीवन रचती कहानियां

किरण सिंह के संग्रह यीशू की कीलें की कहानियों में अपनी पांत अलग बना लेने का आत्मविश्वास कुछ अलग ही चमकता है।

Author Updated: January 22, 2017 2:41 AM

किरण सिंह के संग्रह यीशू की कीलें की कहानियों में अपनी पांत अलग बना लेने का आत्मविश्वास कुछ अलग ही चमकता है। विस्मय को रहस्य तक ले जाना और फिर कौतूहल को संश्लिष्ट बनाते हुए उसमें युग-सत्य की बारीकियों को उकेरना किरण सिंह के वृहद सरोकारों और संवेदनात्मक विवेकशीलता की ओर संकेत करता है। किरण सिंह की विशेषता है कि तमाम उत्पीड़न-शोषण सहने के बावजूद उनके पात्र प्रतिशोध को नहीं, एक सकारात्मक प्रतिरोध को अपनी अस्मिता का पर्याय बनाते हैं। जाहिर है, तब जिजीविषा जीवन का उल्लास बनकर नए वक्त का सृजन करने लगती है।
‘द्रौपदी पीक’ इस दृष्टि से संग्रह की सर्वश्रेष्ठ कहानी कही जा सकती है, जो एक साथ दो कथाओं को लेकर चलती है। एक ओर घुंघरू की कथा है, जो स्त्री-जीवन की विडंबनाओं के साथ-साथ प्रेम के मर्म को खोजते हुए पूरी पितृसत्तात्मक व्यवस्था का पुनरीक्षण करती है, तो दूसरी ओर नागा साधु पुरुषोत्तम की कथा है, जो धर्म नामक इंडस्ट्री की कूटनीतियों, षड्यंत्रों और मनुष्य-विरोधी चेहरे को बेनकाब करते हुए महंतों-मठाधीशों के सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को चुनौती देती है।
किरण सिंह बेहद शिल्प-सजग कहानीकार हैं। वे जानती हैं कि विराट के सान्निध्य में अपने को खोजना दरअसल, चीजों और अवधारणाओं को तमाम पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर उनके नैसर्गिक रूप में देखना है। इसलिए द्रौपदी पीक यानी एवरेस्ट की दुर्गम चढ़ाई की दुश्वारियां पात्रों की मनोग्रंथियों को खोलने का सबब बन जाती है और उनके साथ आरोहण की क्रमिक यात्रा करता पाठक भी मानो समाज-व्यवस्था की जड़ों में लगे दीमक की तह तक पहुंच जाता है।
तनाव का घनीभूत क्षण ही मुक्ति की संभावनाओं को रचता है। इसलिए संघर्ष के साथ धीरज और कर्म के साथ जड़ निश्चयात्मकता को जोड़ कर कहानीकार कहानी को शोध, पत्रकारिता या यथार्थ के सतही आख्यान की इकहरी कथा न बना कर वक्त की धार को मोड़ देने वाले सार्थक हस्तक्षेप का दर्जा देती हैं। संग्रह की कहानियां जो प्रत्यक्षतया दीख पड़ता है, उसी का विरोध करते हुए जमीन में गहरी धंसी तरलता को केंद्र में ले आती हैं। जैसे ‘यीशू की कीलें’ पहले पाठ की मानिंद राजनीतिक कहानी नहीं रहती। न ही हर तरह के यौन-उत्पीड़न की शिकार भारती पार्टी सुप्रीमो की ड्रीम प्लानिंग का पुर्जा भर बनी रहती है। बेशक भारती समेत पच्चीस बरस की आठों अनाथ ‘बूढ़ी’ लड़कियां स्त्री सशक्तीकरण के नाम पर रिजर्व सीट पर चुनाव लड़ कर संसद में भिजवाए जाने का राजनीतिक प्रशिक्षण पाती ‘पराधीन’ कुचली स्त्रियां हैं, जिनके पास अपनी कोख तक नहीं, लेकिन फिर भी अपनी तमाम सृजनात्मकता, स्वप्नशीलता और संवेदनात्मक उदारता के कारण भारत माता का प्रतीक बन जाती हैं, ‘मैला आंचल’ की डॉक्टर ममता की तरह।
ठीक यही विशिष्टता ‘संझा’ को थर्ड जेंडर की समस्या पर रची कहानी से अलग कर अस्मिता की तलाश की कहानी में परिणत कर देती है। शर्म सामाजिक डर को पैदा करती है और डर व्यक्तित्वहीनता को। विधुर पिता के डर, शर्म और ममत्व की कैद में बंदी संझा अपना गुनाह नहीं जानती। न ही स्वस्थ प्राकृतिक जीवन की नियामतों को। लेकिन उम्र के साथ-साथ अपने को छिपाते-उघाड़ते हुए वैद्य पिता से विरासत में पाए वैद्यकी के हुनर के जरिए तरह-तरह की बीमारियों से ग्रस्त लोगों का इलाज करते हुए वह जान गई है कि कई जानलेवा बीमारियों के मूल में हवस सरीखी कमजोरियां हैं, तो कई के मूल में वर्चस्व की साध। स्वस्थ या परफेक्ट कोई नहीं।
किरण सिंह की हर कहानी एक बयान है। वे स्त्री के अंतर्मन को खोलते हुए स्त्री सशक्तीकरण की अवधारणा को तमाम तरह की कटुता या संकीर्णता से मुक्त करती हैं, तो इस स्त्री की अपराजेय संघर्ष-शक्ति को उसकी संपूर्णता में पहचानने का आग्रह भी करती हैं। ‘जो इसे जब पढ़े’ कहानी की सुभावती हो, ‘हत्या’ की सुमा या ‘देश देश की चुड़ैलें’ की अन्य स्त्रियां, उनकी स्त्री स्वतंत्र निर्णय लेती निर्भीक बोल्ड स्त्री है, जो पराजित होकर टूटने-बिखरने के बजाय अपनी राख से बार-बार जिंदा निकल आने को बेचैन है। ‘कथा सावित्री सत्यवान की’ प्रथमदृष्टया देह का खेल खेल कर पुरुष का शिकार करती कुट्टनी स्त्री को सामने लाती है, लेकिन इसमें निहित सूक्ष्म अर्थव्यंजनाएं स्त्री को देह समझने के सामंती संस्कार पर चोट कर स्त्री को पितृसत्ता की बिसात उलटने का नैतिक साहस देती है। शील और नैतिकता समय-समाज सापेक्ष अवधारणाएं हैं, जो किसी एक वर्ग/ जेंडर की अस्मिता की बलि लेकर अंत तक नहीं बनी रह सकतीं। यह कहानी बहेलिए का जाल उड़ाती चिड़िया-समूह की कहानी के बरक्स बहेलिए को जाल में फंसाती चिड़िया को केंद्र में लाती है। किरण की खासियत है कि दुर्भावना कटुता या पुरुष-विरोध को वह कहीं सिर उठाने नहीं देती, क्योंकि कहानी-दर-कहानी स्त्री-पुरुष संबंध की गरिमा और परिवार संस्था के प्रति अपनी अगाध आस्था को पिरोती चलती हैं।
‘ब्रह्मबाघ का नाच’ शैल्पिक सधाव की कहानी है, जो हर बदलती परिस्थिति में अपनी अस्मिता से ज्यादा वर्चस्व बनाए रखने के लिए ललकती मानवीय महत्त्वाकांक्षाओं को प्रकाश में लाती है। लेकिन साथ ही कहानी की अंतर्ध्वनियां यह भी गुनती चलती हैं कि आतंक की सृष्टि करने वाला व्यक्ति स्वयं भीतर तक कहीं भयभीत रहता है। उसकी संतान उसकी तथाकथित लार्जर दैन लाइफ छवि के सामने संघर्ष की स्थितियों की अनुपस्थिति के कारण कमजोर, निष्क्रिय और अनुकंपा पर जीती पीढ़ी का रूप लेने लगती है। कहानी का गूढ़ पाठ अचानक कहानी की चौहद्दियां तोड़ कर हमारे वर्तमान में अतिक्रमण करने लगता है और तब एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि क्या यह कहानी हमारे आज के ‘आने वाले कल’ की कथा तो नहीं।
‘यीशू की कीलें’ परंपरा, इतिहास, विचार- तीनों के अंत की घोषणा के बीच तीनों को पुनर्जीवित करने का हठीला आख्यान है। समय किसी एक पल या खंड की नोक पर सवार होकर इन कहानियों में झिलमिला कर गायब नहीं होता, अपने पूरे कालचक्र के साथ उपस्थित होकर व्यवस्था की गुंजलकों से टकराता है।
रोहिणी अग्रवाल
यीशू की कीलें: किरण सिंह; आधार प्रकाशन, एससीएफ 267, सेक्टर-16, पंचकूला, हरियाणा; 150 रुपए।

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