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बाखबर: दीदी को इतना गुस्सा क्यों आता है?

कुछ अंग्रेजी चैनलों की जात ही कुछ ऐसी है कि कमाई हिंदी विज्ञापनों से करते हैं और गरियाते भी हिंदी को हैं! अरे भैये! हिंदी से इतनी ही नफरत है तो हिंदी के विज्ञापन दिखाना छोड़ दो। इस तरह हिंदी की कमाई खाना भी छोड़ दो!

Author June 9, 2019 3:36 AM
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी। (फाइल फोटो)

नूतन सरकार! नया नया उत्साह, हर तरफ छलका पड़ रहा है। सौ दिन का एजंडा। सौ दिन सरकार के इरादों के। सौ दिन मंत्रियों के। सौ दिन काम के। सौ दिन सौ बार बताने के- क्या क्या किया है, क्या क्या करना है और क्या क्या करेंगे कि बहुत तेजी से विकास करना है और नया भारत बनाना है। सौ दिन के संकल्प बताए जा रहे हैं। नए नए मंत्री पुलकित हो कार्यभार ग्रहण कर ‘फोटो ऑप’ कर रहे हैं। हर खबर चैनल कोर्निश बजाता दिख रहा है कि आज उन्होंने कार्यभार संभाला, आज इन्होंने कार्यभार संभाला!एंकरों में नंबर दो को लेकर दार्शनिक किस्म का ऊहापोह बना रहा। जिनकी आत्मा संशय से संतप्त नहीं रही, वे पहले ही क्षण से बताते रहे कि असली नंबर दो कौन हैं। उनके अहर्निश कवरेज बताते रहे कि इन दिनों असली ‘डेप्युटी’ कौन हैं?

तेज विकास की हुलास में ज्यों ही नई शिक्षा नीति का प्रस्ताव आया, त्यों ही उसमें प्रस्तावित तीन भाषा फार्मूले की धुनाई होने लगी। पहला गोला डीएमके नेता स्टालिन ने दागा कि भारत सिर्फ हिंदी राज्यों का देश नहीं है और इस नीति के बहाने हिंदी का थोपा जाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
अंग्रेजी एंकरों की मानो मन की चीती हो गई। हिंदी थोपने की बात पर सब धुनाई करने लगे। कर्नाटक तक से हिंदी-विरोधी कांग्रेसी आवाजें सुनाई देने लगीं। डीएमके के कंपटीशन में एआईडीएमके के महाबली जी ट्वीट मार दिए कि तीसरी भाषा की जगह सारे भारत में तमिल पढ़ाई जाए।
मगर फिर पता नहीं क्या हुआ कि ऐसे दिव्य तमिलवादी ट्वीट को अचानक वापस ले लिया गया।
सरकार तुरंत चेती और नई शिक्षा नीति के प्रस्ताव से ‘तीसरी भाषा के रूप में हिंदी’ वाली लाइनें हटा दी गर्इं, साथ ही अन्य भाषाओं की तरह हिंदी को भी ‘वैकल्पिक’ कर दिया और इस तरह ‘डैमेज कंट्रोल’ किया गया। मंत्री जी बोले कि यह ‘प्रस्ताव’ भर है, ‘नीति’ नहीं है।
तब भी अंग्रेजी एंकर तीन दिन तक हिंदी को ‘टारगेट’ करते रहे, लेकिन अफसोस कि इतने सारे हिंदी चैनलों में से एक भी हिंदी की पिटाई के खिलाफ नहीं जुटा!

कुछ अंग्रेजी चैनलों की जात ही कुछ ऐसी है कि कमाई हिंदी विज्ञापनों से करते हैं और गरियाते भी हिंदी को हैं! अरे भैये! हिंदी से इतनी ही नफरत है तो हिंदी के विज्ञापन दिखाना छोड़ दो। इस तरह हिंदी की कमाई खाना भी छोड़ दो!
और हिंदी खबर चैनल! उनके पास तो जैसे कोई भाषा नीति ही नहीं दिखती। तीन-चार दिन हिंदी पिटती रही और वे उसके पक्ष में एक लाइन न बोले! हिंदी से कमाई और हिंदी की ठुकाई! कुछ तो शर्म करो महानुभावो!
इधर, सरकार नए भारत को बनाने में जुटी रही। उधर कुछ नेता नए भारत में अपनी ‘ठोक-लीला’ प्रदर्शित करते रहे।
कई चैनल ऐसे ‘ठोक वीडियो’ दिखाते रहे : एक बड़े दल का नेता एक लघु दल की नेत्री को सरेआम लात-घूंसों से मारता है। अगले सीन में औरत न्याय की गुहार करती है। एक एंकर पूछती है कि क्या इस औरत को इंसाफ मिलेगा? क्या ‘महिला आयोग’ इस शर्मनाक घटना का संज्ञान लेगा। लेकिन शाम तक अगले वीडियो में वही औरत उसी पीटने वाले को राखी बांधती दिखती है और बताती है कि उन्होंने माफी मांग ली, तो हमने राखी बांध दी! इसे कहते हैं कि ‘धींग मारे रोने न दे’! इसका अगला संस्करण है : धींग मारे भी और राखी भी बंधवाए!

नए भारत में घृणा के भी एक से एक दिव्य संस्करण बनते रहे : ममता दीदी कार में जा रही हैं कि सड़क के एक ओर से ‘जै श्रीराम’ के नारे सुनाई पड़ते हैं। ममता दीदी कार रोक और उतर कर नारेबाजों को ललकारने लगती हैं : मुझे गाली देते हो… मेरे सामने आकर दो…
बार-बार ‘जै श्रीराम’ नारा लगता दिखता। बार-बार कार रुकती। ममता दीदी उतरतीं और वही डायलाग बोलतीं। अंग्रेजी के दो एंकर ममता दीदी की असहिष्णुता को कोेसते रहे। जवाब में टीएमसी वाले भी ‘बंगी-हिंदी’ में बहसते रहे कि बंगाल में ‘जै श्रीराम’ नहीं चलता। इधर ‘जय मां काली’, ‘जय बांग्ला’ और ‘जय हिंद’ चलता है। इसके आगे फूहड़ किस्म की गांधीगीरी की जाने लगी। ‘जै श्रीराम’ वालों ने एलान किया कि वे ‘जै श्रीराम’ लिखे हुए दस लाख पोस्टकार्ड ममता दीदी को भेजेंगे, तो जवाब में टीएमसी वाले बोले कि हम दिल्ली को बीस लाख पोस्टकार्ड पर ‘जय बांग्ला’ ‘जय हिंदी’ लिख कर भेजेंगे! अंत में एक टीएमसी वाले ने ‘जै श्रीराम की टीआरपी डाउन’ कह कर भक्तों को ‘चैलेंज’ किया, जिसका उत्तर अभी आना है।
ममता दीदी को इतना गुस्सा क्यों आता है?

ममता चिढ़ती हैं, तो चिढ़ाओ और उनकी चिढ़ को ‘एक्सपोज’ करो- भक्त जन पिछले पांच साल से इसी तरह की भड़काऊ और चिढ़ाऊ सांस्कृतिक राजनीति करते रहे हैं और चिढ़ कर और खिसिया कर विपक्षी उनकी संकुल राजनीति में फंसते रहे हैं। ध्यान रहे, आपकी चिढ़ आपको कमजोर दिखाती है। चिढ़ा हुआ चेहरा भक्तों का सबसे आसान शिकार होता है। और किसी से नहीं, तो ममता दीदी, माया-अखिलेश से ही सीख लें। इतनी करारी हार के बाद भी माया ने गठबंधन तोड़ा, तो हंसते हुए और अखिलेश ने टूटा माना तो हंसते हुए। ममता दीदी को इनसे कुछ तो सीखना चाहिए। इस तू-तू मैं-मैं के बीच दिल्ली के सीएम केजरीवाल ने कमाल किया। दिल्ली मेट्रो और डीटीसी की बसों में दिल्लीवासी औरतों को मुफ्त में यात्रा करने का एलान करके भक्तों को चित्त कर दिया। कई भक्त एंकर बेचैन दिखे कि इतना पैसा कहां से लाएंगे कि ऐसी ‘फ्री राइड’ देने से खजाने खाली हो जाते हैं और कि यह सब चुनाव की हार के बाद वोट बैंक बनाने की राजनीति है। राजनीति किस चीज में नहीं है महाराज?

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