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चर्चाः प्रदूषित हवा का कहर

औद्योगिक विकास, बढ़ता शहरीकरण और उपभोगक्तावादी संस्कृति, आधुनिक विकास के ऐसे नमूने हैं, जो हवा, पानी और मिट्टी को एक साथ प्रदूषित करते हुए समूचे जीव-जगत को संकटग्रस्त बना रहे हैं। यही वजह है कि आदमी प्रदूषित वायु की गिरफ्त में है।

Author May 6, 2018 01:04 am
वायु प्रदूषण

भारत आर्थिक वृद्धि के हिसाब से आज दुनिया के अग्रणी देशों में शुमार है। यह आर्थिक समृद्धि अकूत प्राकृतिक संपदा के दोहन और औद्योगिक विकास से संभव हुई है। इसी के सह-उत्पाद के रूप में हमें वह प्रदूषण मिल रहा है, जिसने जीनदायी तत्त्व हवा, जल और पृथ्वी को प्रदूषित कर दिया है। वायु प्रदूषण की भयावह सच्चाई यह है कि देश के ज्यादातर शहर इसकी चपेट में आ गए हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से जेनेवा में दुनिया के बीस सबसे अधिक प्रदूषित शहरों की सूची जारी हुई, जिसमें चौदह शहर भारत के हैं। हालांकि ये आंकड़े 2016 के हैं, जो जारी अब हुए हैं। इनमें कानपुर सबसे ऊपर है, जबकि दिल्ली का स्थान छठा है। दिल्ली समेत सूची में दर्ज शहर कई सर्वेक्षणों में पहले भी प्रदूषित बताए जाते रहे हैं। दिल्ली को लेकर तो उच्चतम न्यायालय कई मर्तबा केंद्र और दिल्ली सरकार को फटकार भी लगा चुका है।

औद्योगिक विकास, बढ़ता शहरीकरण और उपभोगक्तावादी संस्कृति, आधुनिक विकास के ऐसे नमूने हैं, जो हवा, पानी और मिट्टी को एक साथ प्रदूषित करते हुए समूचे जीव-जगत को संकटग्रस्त बना रहे हैं। यही वजह है कि आदमी प्रदूषित वायु की गिरफ्त में है। डब्लूएचओ के आंकड़े से पता चलता है कि 2010 से 2014 के बीच दिल्ली के प्रदूषण स्तर में मामूली सुधार हुआ है, पर 2015 से फिर स्थिति बिगाड़ने लगी है। दिल्ली में पीएम-2.5 का वार्षिक औसत 143 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा मापदंड से तीन गुना ज्यादा है। भारत में औद्योगीकरण की रफ्तार भूमंडलीकरण के बाद तेज हुई। एक तरफ प्राकृतिक संपदा का दोहन बढ़ा है, तो दूसरी तरफ औद्योगिक कचरे में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई। इस प्रदूषित हवा का खुलासा सल्फेट, नाइट्रेट, कॉर्बन के सूक्ष्म कणों के वायु में विलय की सालाना मात्रा के औसत के आधार पर किया गया है। इस रिपोर्ट के आधार पर जहां कल-कारखाने वाला शहर फरीदाबाद प्रदूषित हुआ है, वहीं वाराणसी और गया जैसे धार्मिक नगरों की हवा भी इसकी चपेट में आ गई है। दिल्ली में तो बढ़ते वाहन वायु को दूषित करते हैं, लेकिन गया और वाराणसी जैसे छोटे शहरों की वायु क्यों खराब हुई, इसके कारण स्पष्ट नहीं हैं। सड़क से उड़ती धूल इस परत को और गहरा बना देती है।

कार समेत कोई भी डीजल वाहन समान रूप से प्रदूषण नहीं फैलाते। प्रदूषण की मात्रा वाहन निर्माण की तकनीक और हालत पर निर्भर रहती है। इस लिहाज से कारों से फैलने वाले प्रदूषण नियंत्रण के उपाय ज्यादा व्यावहारिक होने जरूरी हैं। वाहनों से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने के मकसद से भारत ने स्टेज एमिशन स्टैंडर्ड यानी बीएस तकनीक से जुड़े मानक तय किए और इन्हें चरणबद्ध तरीके से लागू करने के लिए भारत सरकार ने 2002 में वाहन र्इंधन नीति घोषित की। बीएस-3 तकनीक से निर्मित वाहन वर्ष 2005 में शुरू हुए। इन्हें 31 मार्च 2017 तक बेचने की अनुमति थी। पर ये अब भी बेचे जा रहे हैं। जबकि बीएस-4 तकनीक के वाहन ही बेचे जाने थे। संयुक्त राष्ट्र के उत्सर्जन नियमों के साथ चलने के लिए सरकार का इरादा बीएस-5 को नजरअंदाज कर सीधे बीएस-6 को 2020 में लागू करने की मंशा है। लेकिन कंपनियां जिस तरह सरकारी आदेशों की अवहेलना करने में लगी हैं, उससे लगता है कि शायद ही 2020 में बीएस-6 वाहन तकनीक लागू हो पाए।

परिवहन, निर्माण कार्य और औद्योगिक उत्पाद र्इंधन के परंपरागत साधनों के उपयोग जैसी तमाम गतिविधियों के चलते भारत में वायु प्रदूषण बढ़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल दुनिया में दस में से नौ लोग प्रदूषित वायु में सांस लेने को विवश हैं। यही वजह है कि हर साल सत्तर लाख लोग केवल प्रदूषण से पैदा होने वाले रोगों से काल के गाल में समा जाते हैं। वाहन प्रदूषण की वजह से लोगों में गला, फेफड़े और आंखों की तकलीफ बढ़ रही है। कई लोग मानसिक अवसाद की गिरफ्त में भी आ रहे हैं। हालांकि हवा में घुलता जहर छोटे नगरों में भी प्रदूषण का सबब बन रहा है। कार-बाजार ने इसे भयावह बनाया है। यही कारण है कि इस सूची में दिल्ली, फरीदाबाद, कानपुर, गया और वाराणसी के अलावा पटना, लखनऊ, आगरा, मुजफ्फरपुर, श्रीनगर, गुरुग्राम, जयपुर, पटियाला और जोधपुर जैसे शहरों में भी प्रदूषण खतरनाक स्तर को लांघ गया है। उद्योगों से धुंआ उगलने और खेतों में बड़े पैमाने पर औद्योगिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरा जलाने से भी इन शहरों की हवा में जहरीले तत्त्वों की सघनता बढ़ी है।

बढ़ते वाहनों के चलते वायु प्रदूषण की समस्या पूरे देश में भयावह होती जा रही है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के लगभग सभी छोटे शहर प्रदूषण की चपेट में हैं। डीजल और घासलेट से चलने वाले वाहनों और सिंचाई पंपों ने इस समस्या को और विकराल रूप दे दिया है। केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड देश के एक सौ इक्कीस शहरों में वायु प्रदूषण का आकलन करता है। इसकी एक रिपोर्ट के मुताबिक देवास, कोझिकोड और तिरुपति को अपवाद स्वरूप छोड़ कर बाकी सभी शहरों में प्रदूषण एक बड़ी समस्या है। इस प्रदूषण की मुख्य वजह तथाकथित वाहन क्रांति है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का दावा है कि डीजल और कैरोसिन से पैदा होने वाले प्रदूषण से ही दिल्ली में एक तिहाई बच्चे सांस की बीमारी की गिरफ्त में हैं। बीस फीसद बच्चे मधुमेह जैसी लाइलाज बीमारी की चपेट में हैं। इस खतरनाक हालात से रुबरू होने के बावजूद दिल्ली और अन्य राज्य सरकारें ऐसी नीतियां अपना रही हैं, जिससे प्रदूषण को नियंत्रित किए बिना औद्योगिक विकास को प्रोत्साहन मिलता रहे। यही वजह रही कि 2016 में भारत में बाहरी वायु प्रदूषण के चलते बयालीस लाख और घरेलू प्रदूषण के चलते अड़तीस लाख मौतें हुई हैं। एक साल में हुई ये अस्सी लाख मौतें वायु प्रदूषण की डरावनी तस्वीर पेश करती हैं।

हालांकि घरेलू वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में सरकार की उज्जवला योजना ने बेहतर काम किया है। इस योजना के तहत बीते दो साल में लगभग पौने चार करोड़ गरीब परिवारों को स्वच्छ र्इंधन की सुविधा निशुल्क उपलब्ध कराई गई है। इस कारण इन परिवारों ने जैविक र्इंधन से छुटकारा पा लिया है। लेकिन इतने भर से वायु प्रदूषण पर नियंत्रण नामुनकिन है। इसके लिए व्यापक पैमाने पर बिगड़ती पर्यावरण की स्थिति को सुधारने की जरूरत है। पहली बार यह तथ्य सामने आया है कि बढ़ता प्रदूषण पेड़-पौधों में कार्बन सोखने की क्षमता घटा रहा है। बढ़ते शहरीकरण और औद्योगिकीकरण के लिए जिस तरह पेड़ों को काटा जा रहा है, उससे पेड़ों की प्रकृति में बदलाव आया है।
वाहनों की अधिक आवाजाही वाले क्षेत्रों में पेड़ों में कार्बन सोखने की क्षमता 36.75 फीसद कम पाई गई है। यह तथ्य देहरादून स्थित वन अनुसंधान संस्थान के ताजा शोध से सामने आया है। लैगेस्ट्रोमिया स्पेसियोसा नाम के पौधे पर यह अध्ययन किया गया। इसके लिए हरियाली से घिरे वन अनुसंधान संस्थान और वाहनों की अधिक आवाजाही वाली देहरादून की चकराता रोड का चयन किया गया। बाद में इन नतीजों का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद उपरोक्त स्थिति सामने आई। यह अध्यन संकेत दे रहा है कि इंसान ही नहीं, प्रदूषित वायु से पेड़-पौधे भी बीमार होने लगे हैं। इसलिए पर्यावरण को सुधारने के लिए चहुंमुखी प्रयास करने होंगे।

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