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वक्त की नब्ज: पुराना भारत नया भारत

हकीकत यह है कि भारत के मतदाता बदल गए हैं और हमारे तकरीबन सारे विपक्षी राजनेता इस परिवर्तन को या तो देखना नहीं चाहते, या अपनी पुरानी राजनीति में इतने उलझे हुए हैं कि देख नहीं पाते हैं। उनकी पुरानी राजनीति आधारित है जातिवाद, वंशवाद और किसी बड़े राजनेता की तथाकथित करिश्मे पर।

Author June 16, 2019 5:39 AM
प्रतीकात्मक फोटो फोटो सोर्स- जनसत्ता

पिछले हफ्ते जब कांग्रेस अध्यक्ष वायनाड पहुंचे मतदाताओं को धन्यवाद देने, तो उन्होंने साथ में यह भी कह डाला कि नरेंद्र मोदी ने देश में नफरत का जहर फैला कर जीत हासिल की है। उधर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री हैं, जो हर दूसरे दिन इसी तरह की कोई बात कहती हैं। कभी ‘जय श्रीराम’ का नारा सुनते ही अपनी गाड़ी से उतर कर झगड़ा करने लगती हैं लोगों से, तो कभी कहती हैं कि भारतीय जनता पार्टी कोलकाता के सरकारी अस्पतालों में अराजकता फैला रही है। मार्क्सवादी महारथी सीताराम येचुरी आरोप लगा रहे हैं कि मोदी की जीत के पीछे पूंजीवादी शक्तियां हैं और चुनाव आयोग का दुरुपयोग। मायावती ने अपनी हार को अस्वीकार करते हुए कहा कि परिणाम साबित करते हैं कि लोकतांत्रिक संस्थाओं का पूरी तरह दुरुपयोग हुआ है। यानी विपक्ष में एक भी राजनेता नहीं दिख रहा है, जो यथार्थ का सामना करने को तैयार है।

हकीकत यह है कि भारत के मतदाता बदल गए हैं और हमारे तकरीबन सारे विपक्षी राजनेता इस परिवर्तन को या तो देखना नहीं चाहते, या अपनी पुरानी राजनीति में इतने उलझे हुए हैं कि देख नहीं पाते हैं। उनकी पुरानी राजनीति आधारित है जातिवाद, वंशवाद और किसी बड़े राजनेता की तथाकथित करिश्मे पर। इन चीजों को ढकते हैं समाजवाद और सेक्युलरिजम जैसे बड़े शब्दों के पीछे। ढोंग है, लेकिन दशकों तक इस ढोंग को देख नहीं पाए भारत के मतदाता, क्योंकि गुरबत और अशिक्षा के शिकंजों में फंसे हुए लोगों को दिखता थोड़ा कम है। मतदाता जब इन शिकंजों से निकल कर मध्यवर्ग में आ जाते हैं तो उनकी दृष्टि बदल जाती है और उनकी अपेक्षाएं भी। मजे की बात यह है कि इस परिवर्तन की तरफ मेरा ध्यान आकर्षित किसी विपक्ष के राजनेता ने नहीं, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली ने किया। मैं उनसे मिलने गई थी पिछले हफ्ते उनकी सेहत के बारे में पूछने। सेहत के कारण उन्होंने सरकार में मंत्री न बनने का निर्णय किया है। मैंने देखा कि शरीर उनका कमजोर काफी हुआ है, लेकिन राजनीति में रुचि कमजोर नहीं हुई है। मिलते ही बातें शुरू की उन्होंने राजनीति की। चुनाव परिणाम का विश्लेषण उन्होंने शुरू किया यह कह कर कि उनको परिणाम आने से पहले ही यकीन था कि तीन सौ से ज्यादा सीटें आएंगी भारतीय जनता पार्टी की और नरेंद्र मोदी दुबारा प्रधानमंत्री अवश्य बनेंगे।

इसके बाद उन्होंने कहा कि दिल्ली में जो पंडित कहा करते थे कि भाजपा की दो सौ बीस और ढाई सौ के बीच सीटें आएंगी, वह जानते नहीं हैं कि मतदाता कितना बदल गए हैं। आगे उन्होंने कहा कि इन पंडितों ने ध्यान नहीं दिया इस बात पर कि भारत के चालीस फीसद मतदाता अब मध्यवर्ग में पहुंच गए हैं। मोदी को इन्हीं लोगों ने जिताया है, क्योंकि वे जानते हैं कि मोदी ही उनकी अपेक्षाएं, उनके सपने समझ सकते हैं। अरुणजी की बातें सुनी, तो याद आया मुझे कि आम सभाओं में आजकल वे पुराने किस्म के मतदाता बहुत कम दिखते हैं, जो नंगे पांव, फटे गंदे कपड़ों में आया करते थे। आम सभाओं में अब लोग न गरीब दिखते हैं और न अशिक्षित। इस परिवर्तन पर ध्यान दिया होता विपक्ष के बड़े राजनेताओं ने तो 2014 में हारने के बाद अपनी रणनीति शायद बदल दी होती। शायद जान गए होते कि जातिवाद को अब मतदाता इतनी अहमियत नहीं देते जितना देते हैं आर्थिक मुद्दों को। शायद जान गए होते बहुत पहले कि करिश्मा का जादू भी कमजोर पड़ गया है, इतना कि राहुल गांधी हार सकते हैं अमेठी जैसे चुनाव क्षेत्र से, जो दशकों से गांधी परिवार का गढ़ रहा है। शायद जान गए होते कि वंशवाद की शक्ति भी कम हो गई है, इतनी कि महाराष्ट्र में शरद पवार जैसे महारथी अपने परिवार से सिर्फ अपनी बेटी को जिता पाए हैं। बिहार में लालू यादव की बेटी तक हार गई इस बार। आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में अगर जगनमोहन रेड्डी और स्टालिन जैसे राजनीतिक वारिस जीत कर आए हैं तो शायद सिर्फ इसलिए कि इन राज्यों में विकल्प नहीं दिखा लोगों को।

बहुत कोशिश की इस चुनाव अभियान में विपक्ष के तमाम राजनेताओं ने सेक्युलरिज्म के नाम पर लोगों को बहकाने की, लेकिन यह भी मुद्दा कमजोर पड़ गया मोदी के नए भारत के सपने के आगे। विपक्ष के राजनेता स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि हिंदुत्व के बल पर नहीं जीते हैं मोदी, लेकिन हकीकत यह है कि इस चुनाव में न हिंदुत्व मुद्दा था, न राम मंदिर। इन मुद्दों के बारे में अगर इस लंबे चुनाव अभियान में किसी को बात करते सुना है मैंने, तो सिर्फ दिल्ली में और वह भी राजनेताओं और राजनीतिक पंडितों को। आम लोगों को नहीं। देहातों में जहां भी गई हूं, लोगों ने आर्थिक मुद्दों पर बातें की हैं। जिस परिवर्तन का वादा मोदी ने 2014 में किया था, राजनीतिक तौर पर आ ही गया है। आर्थिक तौर पर इतना नहीं आया है जितना आना चाहिए था, लेकिन उसके आने के आसार दिखने लगे हैं। इसकी वजह से लोगों की उमीदें नहीं टूटी हैं। कई जगह वही पुरानी समस्याएं आज भी हैं, जो दशकों से चली आ रही हैं। बिजली, पानी, सड़क, स्कूल, स्वास्थ्य सेवाओं की समस्याएं। मगर चूंकि कुछ हद तक इनमें सुधार दिखने लगा था मोदी के पहले कार्यकाल में, तो लोगों को विश्वास है कि सुधार होता रहेगा। कहने का मतलब यह है कि जिस पुराने भारत में विपक्ष के राजनेता अब भी जी रहे हैं, उस पुराने भारत के अंतिम संस्कार हो गए हैं इस चुनाव में और बहुत अच्छी बात है कि ऐसा हुआ है।

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