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बाखबर: बालीवुड के पीछे क्या है

अपने चैनल भी ऐसे विचारों की दुकानें हैं, जो इन दिनों तरह-तरह के कोविड-विचार बेचती रहती हैं। आप जैसा विचार चाहें, खरीद लें! आप ठीक हों न हों, इसकी परवाह किसी को नहीं।

bakhabarपीएम मोदी के साथ चीन के राष्ट्रपति। टीवी चैनलों के डीबेट में चीन के मुद्दों पर बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं।

कांग्रेस का सौभाग्य कि जो पत्रकार उसे रोज कूटते हैं, वही उसके हमदर्द बन कर, एक चैनल पर, उसकी दुर्दशा पर आंसू बहाते थे और हंसते भी जाते थे।
कांगे्रस के एक पुराने प्रवक्ता रोए कि मैं चैनल में बैठा राहुल की बात ही कह रहा था, इस पर मुझे चैनल में बैठे-बैठे ही निकाल दिया… उनकी दीन दशा देख सभी बहसीले पत्रकार हंसने लगे!

एक पूर्व-भाजपाई ने समझाया कि अगर कांग्रेस अपने इतिहास से सीखे और परिवारवाद को छोड़ कर नए लोगों को जगह दे, तो कुछ हो सकता है! दूसरा बोला कि कैसी विडंबना है कि जो कांग्रेस के बाहर हैं वे कांग्रेस के लिए चिंतित हैं, लेकिन जो अंदर हैं, उन्हें परवाह नहीं है…
इसे कहते हैं उच्चकोटि की पत्रकारिता! पहले कांग्रेस को नित्य कूटो, जहां कांग्रेस की गुंजाइश तक न हो, वहां भी जगह निकाल कर कूटो, बहाना निकाल कर कूटो और जब कूट-कूट कर थक जाओ तो कांग्रेस के आंसू पोंछो!

रविवार को जैसे ही मंदिर का निर्माण करने वाली ट्रस्ट की बैठक की खबर ब्रेक हुई वैसे ही हिंदी के कई चैनल ‘मंदिरमय’ हो उठे। पांच अगस्त को भूमिपूजन के लिए पीएम को न्योता देने की खबर और उनकी स्वीकृति ने चैनलों को धार्मिक बहसों में व्यस्त कर दिया!

शरद पवार जी चुटकी लेते हुए विवाद में आए कि कुछ लोग समझते हैं कि मंंदिर जाने से कोरोना ठीक हो जाएगा, लेकिन चैनलों को मजाक की समझ कहां? वे पिल पड़े कि देखा, ये ‘मंदिर द्रोही’ फिर से मैदान में आ रहे हैं!

अगर ऐसी खबर भी धार्मिक रूप से विभाजनकारी बहसों का बहाना न बने, तो वह कैसी तो खबर और कैसे तो चैनल? सो, तुरंत ही चैनलों में धांय धांय होने लगी। दो अंग्रेजी चैनल ओवैसी के एक एमपी ‘कोरोना काल में मंदिर में जाने के खतरे’ दिखा कर मंदिर के भूमिपूजन के ‘विघ्न संतोषी’ बन कर बहसों में छा गए। उधर एंकर मौका देखते ही मुद्दे को ‘हिंदू-मुसलमान’ बना कर देर तक जूझते रहे। इसी बीच सपा के एक एमपी ने यूपी सरकार के मस्जिदों को बंद रखने के आदेश के विरोध में कह दिया कि ‘ज्यादा से ज्यादा लोग मस्जिदों में इकठ्ठा हों और अल्लाह से कोरोना को खत्म करने को कहेंं!’ फिर क्या था, ध्रूवीकृत बहसों ने चर्चाओं को और भी ध्रुवीकृत कर दिया!

इस बीच एक ऑक्सफोर्डीय भाव वाला चैनल दो दिन तक आक्सफोर्ड की वैक्सीन को जम कर बेचता रहा कि यह वैक्सीन अब आई कि तब आई। यों खबरों में ‘रूसी वैक्सीन’ और जर्मन वैक्सीन भी रहीं, पर ‘पंद्र्रह अगस्त तक आने वाली’ अपनी देसी वैक्सीन की कहानी, पता नहीं कहां खो गई!
यही नहीं, उसी चैनल पर एक विशेषज्ञ हमें समझाता रहा कि ‘कोविड की एंटीबॉडीज दो महीने से अधिक नहीं रहती।’ मतलब कि यह वैक्सीन भी कोई गारंटी नहीं! साफ है, वैक्सीन अब एक वैश्विक राजनीति का हिस्सा है! कौन किसको पहले बेच जाए, क्या पता?

और, अपने चैनल भी ऐसे विचारों की दुकानें हैं, जो इन दिनों तरह-तरह के कोविड-विचार बेचती रहती हैं। आप जैसा विचार चाहें, खरीद लें! आप ठीक हों न हों, इसकी परवाह किसी को नहीं।

इस बीच हमें एक चैनल पर ‘रफाल’ के दर्शन हुए। और, इन नए युद्धक विमानों की पहली खेप के लद्दाख में तैनात होते देख एक एंकर इस कदर उत्तेजित हो उठा कि लगा कि वह अभी रफाल उड़ा कर जाएगा और चीनी सेना को खत्म करके आएगा!

लेकिन इसके समांतर, एक चैनल हमें यह भी याद दिलाता रहा कि चीन कहीं नहीं गया है। वह जहां था वहीं जमा है। उच्च सेनाधिकारियों की बातचीत के बाद वह सिर्फ ‘दो किलोमीटर पीछे हटा है’, लेकिन ‘एक किलोमीटर अब भी घुसा हुआ है’। इस चर्चा के दौरान अपने एक पूर्व जनरल ने फरमाया कि चीन एक बड़ी ताकत है, वह धीरे धीरे ही हटेगा, यानी उसमें समय लगेगा… इसके जवाब में एक रक्षा विशेषज्ञ ने उक्त जनरल को ‘चीन का अपॉलॉजिस्ट’ कह कर नाराज कर दिया, लेकिन चर्चा का ‘टाइम अप’ होने के कारण एंकर उनको जवाब देने के लिए नहीं कह पाया!

कहते हैं कि कहानी कभी खत्म नहीं होती! कम से कम एक एंकर के लिए सुशांत सिंह राजपूत की ‘आत्महत्या’ की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है, बल्कि शुरू हुई है। एक शाम एंकर ने ताल ठोक कर कहा कि वह सुशांत की मौत के मुद्दे को यों ही नहीं मरने देगा। उसने साफ कहा कि सुशांत की ‘आत्महत्या’ आत्महत्या नहीं लगती, बल्कि ‘हत्या’ लगती है और पुलिस को अभी बहुत से सवालों के जवाब देने हैं…

और जिस तरह से शत्रुघ्न सिन्हा और शेखर सुमन कंगना के पक्ष में आए और जिस तेवर के साथ सुब्रहमण्यम स्वामी ने सुशांत की स्मृति में मोमबत्ती जलाई, उससे साफ है कि ‘बालीवुड माफिया’ से अभी लड़ाई बाकी है। हमें तो लगता है कि जब तक बिहार के चुनाव नहीं हो जाते, तब तक सुशांत की कहानी चलनी है! यद्यपि इस कहानी में यह कहीं नहीं कहा गया है, लेकिन ‘बालीवुड के पीछे क्या है’ यह कौन नहीं जानना चाहेगा?

लेकिन, गहलोत का जवाब नहीं। उन्होंने सचिन को ‘निकम्मा, नाकारा और गद्दार’ तक कह दिया और सचिन की ओर से एक जवाब नहीं आया। और अदालत! वहां एक दिन गहलोत की फतह दिखी, तो एक दिन सचिन की फतह दिखी। शुक्रवार की सुबह तो हाईकोर्ट ने स्पीकर को यथास्थिति बनाए रखने को कह दिया, जिसके तहत स्पीकर विद्रोही विधायकों पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं कर सकेंगे!

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