बाख़बर : पूरा लंदन ठुमकदा - Jansatta
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बाख़बर : पूरा लंदन ठुमकदा

चुनाव परिणाम आने की सुबह हमेशा से मजेदार रही है। एक्जिट पोल कुछ बताते हैं, परिणाम कुछ दिखाते हैं। एक मिनट पहले खुश दिखते चेहरे मुरझा जाते हैं और मुरझाए खिलते दिखते हैं..

Author दिल्ली | November 15, 2015 12:46 AM

चुनाव परिणाम आने की सुबह हमेशा से मजेदार रही है। एक्जिट पोल कुछ बताते हैं, परिणाम कुछ दिखाते हैं। एक मिनट पहले खुश दिखते चेहरे मुरझा जाते हैं और मुरझाए खिलते दिखते हैं। चैनलों को दिखाए बिना सब्र नहीं और अनुमानों पर सट्टा लगाने जैसी बहस कराए बिना पैसा वसूल नहीं। और दलीय प्रवक्ता हर वक्त हाजिर, क्योंकि जो न दिखा वह खत्म!

विपरीत परिणाम झेलने के लिए कलेजा चाहिए। शर्मिंदा होने की घड़ी में बेशर्म बने रहने के लिए अपने विपक्षी को बधाई देने के लिए एक सेकेंड में मुस्कान ओढ़ कर बधाई देने वाला बेशर्म चेहरा चाहिए!

पांच-पांच एक्जिट पोल! दो मोदी को जिताते हुए, तीन हराते हुए। एक घोषित होकर भी चैनल पर नहीं आया और वही सच निकला! लेकिन उसके सच पर जरा भी चर्चा नहीं।

एक्जिट पोल भी अराजनीतिक नहीं होते। टीवी का झूठ टीवी के सच की तरह ही पकड़ में नहीं आता! इसीलिए टीवी पर ज्यादा भरोसा नहीं करना चाहिए!

रविवार की सुबह: साढ़े नौ बजे तक बढ़त, फिर पिछड़ ही पिछड़! डेढ़ घंटे तक भाजपा प्रवक्ताओं के कमलमुख खिलते हुए। फिर अचानक मुरझाते हुए!

पूर्वाह्न में ही अर्णव ने अपनी पीठ थपथपाई और पूछा कि यह जो सुबह चुनाव परिणाम के आंकड़ों को दिखाने में गड़बड़ हुई है वह जानबूझ कर की गई है, जालबट््टा किया गया है। टाइम्स नाउ ने ही सही आंकड़ा दिया है। एबीपी, एनडीटीवी, इंडिया टुडे, आइबीएन सेवन, बाकी हिंदी चैनल पर एक ही एजेंसी के आंकड़े रहे। टाइम्स नाउ ने चुनाव आयोग की साइट से लिए और अचानक जीतने वाले हारने लगे, हारने वाले जीतने लगे। ऐसा घपला पहली बार हुआ। पोस्टल बैलट को ‘पोस्टल बैलट’ की तरह बार-बार लिख कर दिखाने-बताने में किसी का क्या जाता था?

यह तो वही महाभारत की ‘अश्वत्थामा हतो’ वाली बात हुई कि शेष शब्दों यानी ‘नरो वा कुंजरो’ को धीमे से बोला गया! यह छल था।

शाम तक एनडीटीवी के प्रणय ने माफी मांगते हुए कहा कि कुछ गड़बड़ रही, जिसकी जांच की जानी है। हम गड़बड़ के लिए माफी मांगते हैं।

रविवार की सुबह मोदीजी के आडवाणी-दर्शन से शुरू हुई। इधर परिणाम आ रहे हैं, उधर मोदीजी आडवाणीजी के जन्मदिन पर बधाई देते दिखते हैं। ऐन सुबह पूरे परिणाम नहीं आए हैं। सुबह भाजपा जीतती नजर आती है, दस बजे के आसपास लुढ़कती है, तो लुढ़कती जाती है।

फिर जेटली मैदान में आते हैं और हार का कारण बताते हैं कि पार्टी का गणित फेल कर गया!

रात तक लगभग हर चैनल पर एंकर बिहार की हार के बाद भाजपा की उस अंतर्कलह की एडवांस चर्चा कर चुके हैं, जिसकी सुगबुगाहट अगले दिन ही शुरू होती दिखती है। तीन दिन बाद मार्गदर्शक मंडल के चार देवता आडवाणी, शांता कुमार, जोशी और यशवंत का सामूहिक पत्र कि ‘दिल्ली की हार से कुछ न सीखा’ और ‘अतिकेंद्रीकृत कार्यप्रणाली की वजह से हारे’ कहता भाजपा के ऊपर बज्र की तरह गिरता है! एक बार फिर देर तक भाजपा के प्रवक्ता नजर नहीं आते।

गणित में फेल होने के जेटली के स्पष्टीकरण से मार्गदर्शक मंडल तुष्ट नजर नहीं आता। लाइन आती है कि नेतृत्व को मंडल से संवाद करना चाहिए।

भाजपा के जले पर नमक छिड़कने के लिए कांग्रेस के प्रवक्ता सिंघवी ने प्रधानमंत्री को लक्षित कर कहा कि उनको अपनी विदेश यात्रा पोस्टपोन कर देनी चाहिए!

इसके बाद गडकरीजी ने लाइन साफ की- मोदीजी और अमित शाह को हार के लिए जिम्मेदार मानना ठीक नहीं है! गडकरी ने विद्रोह करने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी कर डाली! राम माधव ने आग में यह कह कर पानी डाला कि मार्गदर्शक मंडल के चार सदस्यों से चर्चा की जा सकती है।

लेकिन प्रधानमंत्रीजी ने बोलने से अधिक अपनी आत्मविश्वास भरी देहभाषा से उठती शिकायतों का जवाब दिया:
पहले दृश्य में प्रधानमंत्री और सुषमा स्वराज हवाई अड्डे पर हंसते हुए बातचीत करते दिखे। उसके बाद प्रधानमंत्री सबको यथायोग्य करते हुए तेजी से दौड़ कर चौबीस सीढ़ियां चढ़ कर हाथ हिला कर अभिवादन करते हुए! यह उम्र और ऐसी फुर्ती! वह भी बिहार की हार के बाद! क्या बात है!

कर्नाटक में कर्नाड क्या बोल दिए कि लेने के देने पड़ने लगे। हर चैनल पर कर्नाड को धमकी बजने लगी। एनडीटीवी से लेकर एबीपी तक पर हर कहीं उनका वाक्य लिखा आता रहा कि अगर टीपू हिंदू होते तो शिवाजी की तरह माने जाते! इसके बाद धमकी की खबर!

यानी फिर वही असहिष्णुता और वही दनादन!

कैसे दिन आ गए हैं कि सुनने वाले ‘अति संवेदनशील’ होने लगे हैं। बोलने वालों को ऐसे ‘अतिसंवेदनशील’ श्रोता कब नसीब हुए कि वक्ता की एक-एक लाइन सुन कर तुरंत अपनी ‘आपत्ति’ दर्ज करें और वक्ता के बे-लाइन होते ही जान से मारने की धमकी रसीद करें!

आगे से, बोलने वालों को ही चाहिए कि जब कुछ बोलें तो सुनने वालों से पूछ कर बोलें! ध्यान रहे, इन दिनों श्रोता की जगह ‘सरोंता’ मिला करते हैं। जरा-सी बात पर किसी की भावना भड़क जाती है और धमकी दे दी जाती है।

हर बड़े चैनल का रिपोर्टर लंदन से बोल रहा है। वे प्रधानमंत्री से पहले ही उनकी अगवानी करने पहुंच गए हैं। एनडीटीवी की रिपोर्टर सबसे पहले दिखी है! एनडीटीवी ने शीर्षक भी गजब का लगाया है यानी ‘पीएम मोदी के लिए लंदन ठुमकदा!

एनडीटीवी पर लाइव कवरेज जारी है: मोदी लंदन पहुंचे। मोदी का ‘बिग बिजनेस पुश’ होगा। वे क्वीन के साथ लंच करेंगे।

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