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पुस्तकायन : नए रास्ते की तलाश में

इस पुस्तक में संकलित निबंधों का फलक विस्तृत है। ये विविधवर्णी हैं। निबंधों के केंद्र में तो व्यक्ति है, पर निबंधकार के चिंतन का दायरा विस्तृत है।

Author नई दिल्ली | June 12, 2016 2:40 AM
शरद प्रसाद सिंह का लेख भारत की नई राष्ट्रभाषा

उमेश प्रसाद सिंह का नया निबंध संग्रह है भारत की नई राष्ट्रभाषा। आज जब निबंध विधा में लेखन क्षीण-सा हो गया है, यह संग्रह भविष्य में इस विधा के वजूद के कायम रहने का आश्वासन देता है। इस पुस्तक में उमेश प्रसाद सिंह के इक्कीस निबंध संकलित हैं। वही लेखन अच्छा माना जाता है जो कम शब्दों में अधिक और महत्त्वपूर्ण बात कहे। इस पुस्तक का शीर्षक चौंकाने वाला है। पुस्तक देखते ही जेहन में यह सवाल उमड़ने लगता है कि उमेश प्रसाद सिंह भारत की किस नई राष्ट्रभाषा की बात कर रहे हैं। एक राष्ट्रभाषा के होते हुए क्या जरूरत आ पड़ी नई राष्ट्रभाषा के निर्माण की? इस सवाल से टकराते हुए आगे बढ़ने पर पुस्तक में इसी शीर्षक से लिखा गया एक निबंध मिलता है। इसमें उमेश द्वारा किए गए व्यंग्य की मारक क्षमता का आभास तो मिलता ही है, भारत की मौजूदा स्थिति का भी खुलासा होने लगता है।

सालों साल कचहरी के चक्कर काटने के बाद भी भारतीय जन की समस्याओं का निराकरण नहीं होता, यह भारतीय व्यवस्था की जग जाहिर कमजोरी है। कचहरी में लेखक की भेंट एक ऐसे व्यक्ति से होती है, जिसने भारतीय शासनतंत्र और व्यवस्था-तंत्र के बारे में नए सिरे से विचार किया है। वह लेखक से तीन प्रश्न पूछता है- भारत का प्रधानमंत्री कौन है? भारत का राष्ट्रीय ध्वज क्या है और भारत की राष्ट्र भाषा क्या है? इन प्रश्नों के जवाब पाठक को नए ढंग से सोचने पर मजबूर करते हैं। भारत के प्रधानमंत्री का नाम वह लक्ष्मीनारायण लाल बताता है। चाहे जो प्रधानमंत्री हो, राज लक्ष्मीनारायणों का ही होगा। इसी तरह वह राष्ट्रीय ध्वज के रूप में बेहयाई और राष्ट्रभाषा के रूप में घूस की बात करता है। आज दफ्तरों में इसी नई राष्ट्रभाषा का बोलबाला है। बिना इसके ज्ञान के आप चाहे जितनी भाषाओं के ज्ञाता हों, बड़े विद्वान हों, निरर्थक हैं। काटते रहिए ऐसे ही साल दर साल चक्कर, कौन पूछता है!

इस संग्रह का सबसे अधिक ध्यान आकर्षित करने वाला निबंध है- ‘मेरे पिताजी नहीं रहे’। शीर्षक से लगता है कि घोर व्यक्तिव्यंजक निबंध होगा। लेखक के पिता नहीं रहे, तो नहीं रहे। दूसरों को क्या फर्क पड़ता है। पर यह निबंध है, कोई सूचना नहीं। लेखक का ‘आत्म’ किस तरह गल कर ‘पर’ हो जाता है, इसे इस निबंध में बखूबी देखा जा सकता है। उमेश के निबंध में अनेक ऐसे सूत्रवाक्य बिखरे हुए हैं, जिनके मायने हमें बहुत दूर तक ले जाते हैं। वे लिखते हैं- ‘जिसकी सत्यता ही संदिग्ध हो, उसकी उच्चता का अर्थ बहुत मतलब नहीं रखता। उसे गले के नीचे उतारना मुझे आसान नहीं लगता। व्यवहार की रूढ़ियों की तरह भाषा की रूढ़ियों का अनुवर्तन मुझे अभीष्ट नहीं है।’

अपने पूर्व पुरुषों के प्रति श्रद्धा और अगाध आस्था रखना भारतीय जनमानस का सहज स्वभाव है। उमेश भारतीय जन मानस की इस सदाशयता की अभ्यर्थना तो करते हैं, पर उसे पूरी तरह स्वीकार नहीं कर पाते। इसीलिए वे अपने पिता के नाम से पहले स्वर्गीय नहीं लिख पाते। हां, वे इस बात का उल्लेख जरूर करते हैं- ‘वे तो निश्चय ही इस पृथ्वी पर आजीवन स्वर्गिक प्राणी की तरह थे ही। स्वर्ग में रहने वाले प्राणियों की प्रकृति उनके स्वभाव में थी। स्वर्गीय सुगंधि उनके आचरण-व्यवहार में अनायास ही व्यक्त थी।’

संग्रह के कुछ निबंध अच्छे संस्मरण का आस्वाद देते हैं। ऐसा ही एक निबंध है-‘परमहंस के संदेश दूत’। परमहंस परमानंदजी महाराज से प्रारंभ होकर निबंध स्वामी सच्चिदानंद जी महाराज, स्वामी भगवानानंद जी महाराज और स्वामी अड़गडानंदजी महाराज से होते हुए डॉ. रमाशंकर सिंह पर आकर अपना वैभव बिखेरने लगता है। निबंधकार को डॉ. रमाशंकर सिंह के साथ बिताए दिनों की एक-एक घटना याद आती है और वह उनका विस्तार से वर्णन करता है। उसके वर्णन से डॉ. रमाशंकर सिंह के व्यक्तित्व की परत-दर-परत खुलती चली जाती है। निबंधकार के जीवन में अनचाहे प्रवेश करने वाले डॉ. रमाशंकर सिंह शीघ्र ही उसके आत्मीय बन जाते हैं। उमेश स्वीकार करते हैं: ‘मेरे और उनके बीच बहुत-सी असहमतियां थीं, मगर असहमतियों के बावजूद समानधर्मा सहमतियों के सूत्र इतने मधुर और आकर्षक थे कि वे हमें चेतना की गहराई में इतनी मजबूती से जोड़े हुए थे कि उनसे विलग हो सकना संभव ही न था।’ इस निबंध के अंतिम वाक्य निबंधकार की भावना को पूरी तरह व्यक्त कर देते हैं- ‘वे दिव्यता की सुगंधि के, आस्था के आस्वाद के और अलौकिक प्रकाश के सम्मोहन के आमंत्रण थे। मैं अमूर्त के इस महिमावान मूर्त आमंत्रण को अपनी प्रणति निवेदित करता हूं।’

इस पुस्तक में संकलित निबंधों का फलक विस्तृत है। ये विविधवर्णी हैं। निबंधों के केंद्र में तो व्यक्ति है, पर निबंधकार के चिंतन का दायरा विस्तृत है। उसके चिंतन में पूरा राष्ट्र है। व्यक्ति और राष्ट्रीय अनुषंगों के बीच से ही उमेश अपने निबंधों की आधारभूमि तैयार करते हैं। उनकी यही आवाजाही निबंधों के फलक को विस्तृत बना देती है। हमारे प्रतिदिन के जीवन का आघात-प्रतिघात तो यहां मौजूद है ही, राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय हलचलों की अनुगूंज भी है। उमेश प्रसाद सिंह अपने निबंधों की पीठिका आसपास की वस्तुओं से तैयार करते हैं, पर जीवन की हलचलों, इतिहास और मिथक से उसे इस तरह संगुंफित और प्रमाणपुष्ट कर देते हैं कि वर्तमान अपने वास्तविक रूप में हमारे सामने आ जाता है। चाहे जहां तक की यात्रा करिए, कर लीजिए, पर आएंगे वहीं जहां निबंधकार आपको ले आना चाहता है।

इस संग्रह के निबंधों की भाषा साफ-सुथरी, परिमार्जित और प्रांजल है। भाषा पर लेखक का अद्भुत अधिकार है। वह बड़ी आसानी से गंभीर से गंभीर बात को भी प्रवाहपूर्ण, सरल और सहज ढंग से कह लेता है। ऐसा लगता है कि इन निबंधों के माध्यम से निबंधकार अर्थव्यंजना के नए रास्तों की तलाश कर रहा है। व्यंजित होने वाला स्वर ही इन निबंधों का प्राण है।

ओमप्रकाश सिंह

भारत की नई राष्ट्रभाषा: उमेश प्रसाद सिंह; विद्या विकास एकेडमी, दरियागंज, नई दिल्ली; 300 रुपए।

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