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किताबें मिलींः ‘मोदी की विदेश नीति’, ‘रेखना मेरी जान’ और ‘युद्ध में अयोध्या’

वेदप्रताप वैदिक विदेश मामलों के गहन अध्येता हैं। प्रखर पत्रकार होने के नाते वे भारत और अन्य देशों की विदेश नीतियों पर लगातार लिखते रहे हैं। विदेश मामलों पर वे कई किताबें लिख चुके हैं।

Author September 10, 2018 7:17 AM
वैदिक कहते हैं प्रधानमंत्री मोदी ने ‘कुछ ऐसी पहल की है, जो अब तक किसी अन्य प्रधानमंत्री ने नहीं की। इसलिए जहां-जहां हमारी विदेश नीति लड़खड़ाती हुई दिखाई दी हैं, मैंने दो-टूक आलोचना भी की है।’

मोदी की विदेश नीति

वेदप्रताप वैदिक विदेश मामलों के गहन अध्येता हैं। प्रखर पत्रकार होने के नाते वे भारत और अन्य देशों की विदेश नीतियों पर लगातार लिखते रहे हैं। विदेश मामलों पर वे कई किताबें लिख चुके हैं। वर्तमान सरकार की नीतियों पर इसलिए भी वे लगातार लिखते रहे हैं कि प्रधानमंत्री का दूसरे देशों से संबंध प्रगाढ़ करने पर अधिक जोर रहा है। उन्होंने अनेक देशों की यात्राएं की, अनेक व्यापारिक और सुरक्षा संबंधी समझौते किए हैं। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जुटाने पर उनका सबसे अधिक जोर रहा है। इस पुस्तक में सिर्फ वर्तमान सरकार की विदेश नीति से जुड़े लेख हैं। वैदिक ने इसमें वर्तमान सरकार की विदेश नीतियों पर लिखते हुए शुरू के लेखों में बहुत सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्हें सरकार से कई उम्मीदें नजर आती हैं। पाकिस्तान और चीन के रिश्तों पर बात करते हुए वैदिक भारत सरकार को ललकारते हैं, उत्साह बंधाते हैं। पर बाद के लेखों में वे कुछ अनुत्साहित नजर आने लगते हैं।

वैदिक कहते हैं प्रधानमंत्री मोदी ने ‘कुछ ऐसी पहल की है, जो अब तक किसी अन्य प्रधानमंत्री ने नहीं की। इसलिए जहां-जहां हमारी विदेश नीति लड़खड़ाती हुई दिखाई दी हैं, मैंने दो-टूक आलोचना भी की है।’ वैदिक जी खरा-खरा लिखते हैं, इसलिए उनके लेखों में न सिर्फ सरकार की विदेश नीति का विश्लेषण और आलोचना होती है, बल्कि अनेक बार वे सलाह भी देते चलते हैं कि ऐसे मामलों में सरकार को क्या कदम उठाने चाहिए। इसलिए ये लेख महत्त्वपूर्ण बन गए हैं। इनमें न तो शोधपूर्ण तथ्यात्मक गरिष्ठता है और न कोई वैचारिक दुराव, इसलिए यह किताब निष्पक्ष और सुरुचिपूर्ण बन गई है।

मोदी की विदेश नीति : वेदप्रताप वैदिक; डायमंड पॉकेट बुक्स, एक्स-30, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, फेज-2, नई दिल्ली; 250 रुपए।

रेखना मेरी जान

मुहब्बत की एक नई कहानी रत्नेश्वर अपने उपन्यास ‘रेखना मेरी जान’ में लेकर आए हैं। एक ऐसी प्रेम कहानी, जो पहले नहीं कही गई। एक ऐसी प्रेम कहानी, जो आपके अंदर की कोमल-संवेदन भावनाओं को जगा कर आपको प्रेम की ओर उन्मुख कर दे। एक ऐसी प्रेम कहानी, जो आपके भीतर हर चुनौती का सामना करने की ताकत भर दे।

आज पृथ्वी ग्लोबल वार्मिंग के दुष्प्रभाव के बहुत करीब पहुंच चुकी है। कई देश और शहर बढ़े हुए जल-स्तर के कारण डूबने के कगार पर हैं। वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर अगले कुछ वर्षों में यह भयावह स्थिति हमारे सामने होगी, जब हम डूब रहे होंगे और अपने लिए जमीन की तलाश में इधर-उधर भाग रहे होंगे। हम आज भी मनुष्य से मनुष्य के बीच की खाई को बनाए रखने के लिए युद्धरत हैं। देश, जाति, संप्रदाय, रंग, लिंग, भाषा आदि रेखाओं को चौड़ा करने में हमारी सारी ऊर्जा लगी है, जबकि हमारे सामने समूल पृथ्वी पर एक बार फिर जीवरहित होने का खतरा मंडरा रहा है। ग्लोबल वार्मिंग से जूझते समाज की आधार कथा के साथ एक अद्भुत प्रेम कहानी है- रेखना मेरी जान।

कहते हैं, प्रेम किसी भी सीमा को नहीं मानता। मुहब्बत ही है जो हमारी खींची गई विविध रेखनाओं को ध्वस्त कर नई कहानी गढ़ती है। एक कदम- मुहब्बत की ओर!

रेखना मेरी जान : रत्नेश्वर; ब्लूवर्ड प्रकाशक, ताराभवन, अशोक राजपथ, पटना; 225 रुपए।

युद्ध में अयोध्या

अयोध्या का मतलब है, जिसे शत्रु जीत न सके। युद्ध का अर्थ हम सभी जानते हैं। योध्य का मतलब, जिससे युद्ध किया जा सके। मनुष्य उसी से युद्ध करता है, जिससे जीतने की संभावना रहती है। यानी अयोध्या के मायने हैं, जिसे जीता न जा सके। पर अयोध्या के इस मायने को बदल कर ये तीन गुंबद राष्ट्र की स्मृति में दर्ज हैं। ये गुंबद हमारे अवचेतन में शासक बनाम शासित का मनोभाव बनाते हैं। सौ वर्षों से देश की राजनीति इन्हीं गुंबदों के इर्द-गिर्द घूम रही है। आजाद भारत में अयोध्या को लेकर बेइंतहा बहसें हुर्इं। सालों-साल नैरेटिव चला। पर किसी ने उसे बूझने की कोशिश नहीं की। ये सब कुछ इन्हीं गुंबदों के इर्द-गिर्द घटता रहा। अब भी घट रहा है। अब हालांकि गुंबद नहीं हैं, पर धुरी जस-की-तस है।

इस धुरी की तीव्रता, गहराई और सच को पकड़ने का कोई बौद्धिक अनुष्ठान नहीं हुआ, जिसमें इतिहास के साथ-साथ वर्तमान और भविष्य को जोड़ने का माद्दा हो, ताकि इतिहास के तराजू पर आप सच-झूठ का निष्कर्ष निकाल सकें। उन तथ्यों से दो-दो हाथ करने के प्रामाणिक, ऐतिहासिक और वैधानिक आधार के भागी बनें।

प्रखर आलोचक नामवर सिंह कहते हैं- ‘मंदिर बने न बने, यह राम जानें! लेकिन हेमंत शर्मा की इस पुस्तक का मंदिर अमर है। ऐसा मंदिर एक लेखक ही बना सकता है। भगवान राम अयोध्या में रहे, लेकिन उन्हें आम लोगों तक काशी ने पहुंचाया। तुलसीदास ने काशी में रामचरितमानस रची और अब पांच सौ साल से भी ज्यादा समय बाद बनारस के ही लेखक हेमंत शर्मा की यह पुस्तक आई है। राम और उनकी जन्मभूमि पर ऐसी प्रमाणिक पुस्तक पहले कभी नहीं आई।’

युद्ध में अयोध्या : हेमंत शर्मा; प्रभात पेपरबैक्स, 4/19, आसफ अली रोड, नई दिल्ली; 500 रुपए

 

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