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किताबें मिलीं: अतीत का दरवाजा, मेरी दृष्टि तो मेरी है, खजाना और सच, समय और साक्ष्य

अपने यात्रा वृत्तांतों से हिंदी में एक नई शुरुआत करने वाले असगर वजाहत अपने आपको सामाजिक पर्यटक या सोशल टूरिस्ट कहते हैं

Author July 29, 2018 4:15 AM
इस संग्रह में मनोज कुमार पांडेय की आठ कहानियां संकलित हैं।

अतीत का दरवाजा

अपने यात्रा वृत्तांतों से हिंदी में एक नई शुरुआत करने वाले असगर वजाहत अपने आपको सामाजिक पर्यटक या सोशल टूरिस्ट कहते हैं। वे जिस जगह जाते हैं वहां का कोरा विवरण नहीं लिखते, बल्कि यात्रा वृत्तांतों के माध्यम से उन जगहों की सांस्कृतिक विविधता और जीवन के रंग दिखाने का प्रयास करते हैं, जिससे पाठक उनके साथ उनकी यात्रा में पूरी तरह जुड़ जाता है। ‘अतीत का दरवाजा’ में असगर वजाहत अपने पाठकों को मध्य एशिया में जॉर्डन, यूरोप के रूमानिया- हंगरी के मारामोरोश क्षेत्र और दक्षिण अमेरिका के मैक्सिको की यायावरी पर ले जाते हैं। तीनों जगहें जितनी यायावरी की दृष्टि से आकर्षक हैं, उतना ही उनका ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्त्व भी है और यहां पर मानव-सभ्यता के अनेक पुरातत्त्व अवशेष मिलते हैं।

ये यात्रावृत्त कितने रोचक हैं, इसका अंदाजा असगर वजाहत की इस बात से लगाया जा सकता है- कुछ लोग शायद यह मानते हैं कि घूमने के लिए बहुत पैसा चाहिए होता है, लेकिन मेरे विचार से पैसे से अधिक इच्छा और लगन आवश्यक है। अगर कोई व्यक्ति यात्रा करना चाहता है, तो उसे सैकड़ों मददगार मिल जाते हैं और वह कम से कम पैसे में या कभी-कभी तो बिना पैसे के भी यात्राएं कर सकता है। उदाहरण के लिए मैं इस्फहान शहर के एक होटल में ठहरने गया। होटलवाले ने कमरे का जो किराया बताया वह मेरे हिसाब से बहुत अधिक था। मैंने उससे कहा कि मैं इतना किराया नहीं दे सकता। जब मैं जाने लगा तो उसने मुझे रोका और कहा कि मैं केवल पांच डॉलर देकर डॉरमेट्री में भी रह सकता हूं। मैंने डॉरमेट्री में रात बिताई और सोचा कि काफी कम पैसे में रात बीत गई। कमरे से बाहर निकला तो देखा होटल के बरामदे में जमीन पर साइकिल वाले टूरिस्ट अपने-अपने स्लीपिंग बैगों में घुसे सो रहे हैं। मैंने सोचा, ‘इन लोगों ने मुझसे भी कम पैसे में रात बिताई होगी।’ शहर में घूमता हुआ एक पार्क में पहुंचा तो देखा एक टूरिस्ट पेड़ के नीचे स्लीपिंग बैग में सो रहा था। निश्चित रूप से उसने सबसे कम पैसे या मुफ्त में रात बिताई होगी।

अतीत का दरवाजा : असगर वजाहत; राजपाल एंज सन्ज, 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली; 215 रुपए।

मेरी दृष्टि तो मेरी है

थाकार कुसुम अंसल की अधिकतर कहानियां उच्चवर्गीय स्त्री की वेदना को व्यक्त करती हैं। इसके पूर्व हिंदी कथा-साहित्य में मध्यवर्गीय मानसिकता ही कथा के केंद्र में रही है। उन्होंने उच्चवर्गीय स्त्री के-जो चेहर चमकते, दमकते नजर आते हैं, लोग कहते हैं इन्हें क्या दुख होगा, उनके तनाव, संघर्ष और निरंतर अकेले होते जाने की पीड़ा को पाठकों के साथ साझा किया है। यहां संवेदनशील कथाकार वैभव के बीच रह कर भी अपने भीतर एक सांस्कृतिक अलगाव लगातार महसूस करती है। उच्च वर्ग में जाने के लिए स्त्री क्या-क्या समझौते कर रही है, जबकि उसमें प्रतिभा भी है- यह सब उनकी कहानियों में मिलता है। उनकी कहानियों में जीवन का वैविध्य और विस्तार और दर्शन की बृहत्त्रयी है। कुसुम अंसल की कहानियां बाहर से भीतर की ओर चलती हैं और उसकी परतों को व्यक्त करती हैं। यह एक तरह से भीरत की भाषा है- एक अद्भुत सौंदर्यात्मकता से आपूरित है। वे अपनी कहानियों में सारी अनकही बातें कहती हैं, पर उनमें कहीं भदेस चित्र-दृश्य नहीं है।

कुसुम अंसल कहती हैं- ‘जाने क्या होती है यह रचना-प्रक्रिया कि मैं एक इल्यूसिव या भ्रमित-सी जिंदगी के किनारे-किनारे चल पड़ती हूं- रास्ता अपने-आप बनता जाता है। वैसे तो आज के आधुनिक परिवेश में भूमंडलीकरण और प्रगति, विज्ञान और टेक्नोलॉजी, बाजारवाद या आविष्कारों से लदा-फंदा एक संसार मेरे वजूद को चकाचौंध कर जाता है। मैं चाहती हूं कि उसके इस ज्वलंत परिवेश से जान-पहचान कर लूं, पर मेरे सरोकार अलग-थलग खड़े हो जाते हैं। मेरा मनोविज्ञान, मेरी चेतना, हृदय में आलोड़ित होतीं कोमल मानवीय भावनाओं के सहज, परंतु नैसर्गिक ज्ञान को ही जीना चाहता है, और मेरे पात्र, ‘आइडिंटिटी पॉलिटिक्स’ के शिकार होने से बच जाते हैं। उनकी पहचान, व्यक्ति-साधारण से व्यक्ति के रूप में ही बन पाती है वह जो केवल धड़कती हुई इंसानियत जीता है। तो मेरी रचना की कथायात्रा डैलिवरेट या जानबूझ कर लिखी गई किस्सागोई न रह कर पुख्ता कहानी बन जाती है। हां, मैं नहीं, वह मुझे रचयिता बनाती है। यही मेरे कथाकार होने का सच है।’

मेरी दृष्टि तो मेरी है : कुसुम अंसल; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 395 रुपए।

खजाना

मनोज कुमार पांडेय अपने समय की धड़कनों को नए भाषा-शिल्प में उतार कर सहज ही कहानी में ढाल देते और फिर उसके जरिए विमर्श रचते हैं। उनकी कहानियां प्राय: लंबे कालखंड को घेरती हैं। जीवन के बारीक से बारीक रेशे को वे पकड़ते हैं, सूक्ष्म से सूक्ष्म अनुभवों को भाषा में उतारते और बड़े कौशल के साथ उन्हें कथा के प्रवाह में तिरा देते हैं। इस तरह उनकी कहानियां अक्सर विमर्श रचती चलती हैं। मगर वे विमर्श में पक्षकार बनते कहीं नजर नहीं आते, इस विमर्श से कथा का प्रवाह कहीं बाधित भी नहीं होता। वे घटनाओं, स्थितियों का बहुत इत्मीनान के साथ वर्णन करते हैं, वे उनका हिस्सा बन जाते हैं, इस तरह उनका अनुभव सहज ही पाठक का अनुभव बन जाता है और वह उन स्थितियों को जीने लगता है।

इस संग्रह में मनोज कुमार पांडेय की आठ कहानियां संकलित हैं। प्राय: सभी की विषय-वस्तु मानव जीवन की दैनंदिन घटनाएं हैं। उनमें गांव-शहर की कोई फांक नहीं है। उनके केंद्र में मनुष्य है, उसकी जद्दोजहद है, उसकी आशाएं-आकांक्षाएं, प्रेम लालसा, उमंग-उत्साह है। मनोज कुमार पांडेय ने भाषा को कुछ इस तरह साधा है कि बहुत सरल शब्दों और सहज वाक्य विन्यास में बड़ी से बड़ी बात कह जाते हैं और उन पर अटक कर देर तक सोचना पड़ता है।

खजाना : मनोज कुमार पांडेय; आधार प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, एससीएफ, 267, सेक्टर-16, पंचकूला (हरियाणा); 120 रुपए।

कवि शैलेंद्र शरण की शख्सियत एक ऐसे व्यक्ति की है, जो मुखर नहीं संयमित, छींटाकशी नहीं जिज्ञासा, उत्सुकता, विनम्रता और भरसक कोशिश रहती है कि हरेक के लिए उसके पास स्थान हो। उनकी कविता में भी यही बात है। ‘अक्सर खबर नहीं होती/ अपनों के हित में उठाया कदम/ कब तब्दील हो जाता है पीड़ा में… दुनिया बसाने के प्रयास में/ कैसे उजड़ता है कोई..।’

कवि शैलेंद्र को पढ़ते हुए कवि कुंवर नारायण की याद बरबस आती है। हालांकि कुंवर जी और शरण में कहीं समानता नहीं, न शरण उनसे प्रभावित हैं, फिर भी कवि कुंवर नारायण की प्रेम कविताओं में जो नैतिकता की उपस्थिति होती है, वह शैलेंद्र की कविताओं में अलग से रेखांकित की जा सकती है ‘सब कुछ/ कहां रहता है एक जैसा/ बस/ एक प्रेम ही है/ जो बदलने नहीं देता कुछ’

हालांकि शैलेंद्र ने राजनीति और सामाजिक विषमताओं पर कविताएं लिखीं हैं, पर उनका मूल स्वर प्रेम का ही है, एक छटपटाहट, एक छूटे हुए को अवेरने की कोशिश, हताशा में भी हिम्मत-सा प्रस्फुटित हो जाता प्रेम, थके-हारे में जैसे आता है दम- ठीक उसी मानिंद। अपेक्षा, उलाहना, तंज, गुस्से पर पांव धरता कवि प्रेम को पाना नहीं जीना भी चाहता है। बारिश में भीगा दिन, सहज भाव से इस तरह से शैलेंद्र की कविता में आता है के नए अर्थ की खोज करता, कुछ स्वत: हुआ-सा लगता है। भाषा की सहजता शैलेंद्र की कविताओं में बहुदा मिलती है। शैलेंद्र की कविताएं इस सीलन भरे समय में एक खिड़की खोलने का जतन करती हैं। कवि प्रेम की मार्फत इस जतन में लगा है।

सच, समय और साक्ष्य : शैलेंद्र शरण; शिवना प्रकाशन, पीसी लैब, सम्राट कॉम्प्लेक्स बेसमेंट, बस स्टैंड, सीहोर (मप्र); 175 रुपए।

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