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किताबें मिलीं: ‘स्त्रीशतक’, ‘ऑपरेशन ब्लैकहोल’, ‘तुलसी विमर्श’ और ‘काला ताज’

किताबों की समीक्षा

Author October 28, 2018 3:53 AM
काला ताज पुस्तक का कवर पृष्ठ

स्त्रीशतक

पवन करण का नया कविता संग्रह ‘स्त्रीशतक’ हिंदी की अनिवार्य दस्तावेजी कृति है। इस किताब से स्त्रियों के प्रति हमारी दृष्टि में जो परिष्कार हो सकता है, वह संभवत: प्रचलित साहित्यिक स्त्री शिक्षाओं और कोरे तर्कों, विमर्शों से उतना संभव नहीं। इसमें हमारी सभ्यता और इतिहास के वे अनछुए पहलू बहुत साहस के साथ बेबाक शैली में कवि ने उजागर कर दिए हैं, जिनमें देश की आधी आबादी की भूली-बिसरी कथाएं और व्यथाएं सिमटी हुई हैं। यह सत्य है कि अपने उदात्त मूल्यबोध, चिंतन के विलक्षण प्रकर्ष और काव्यकल्पनाओं की अगम्य उड़ानों में संस्कृत का साहित्य जितना विशाल तथा संपन्न है, उतना ही वह एकांगी भी है, क्योंकि वह पुरुष समाज के वर्चस्व और पुरुषवाद का साहित्य है। स्त्री को दिया जाने वाला सम्मान इस समाज में पुरुष के अधिकार और अनुग्रह का सापेक्ष है।

स्त्री के उन्मुक्त चिंतन और नारी स्वातंत्र्य का जो विचार सभ्यता के आधुनिक विमर्श ने आज के साहित्य में संचारित किया, उसके आधार पर उसका आकलन करना तो उसके साथ अन्याय ही होगा, पर इस अपार विशाल साहित्य के हाशियों, परिपार्श्वों या पृष्ठभूमि में असंख्य महनीया महिलाओं की वेदनाएं, कराहें, उत्तप्त अश्रु तथा आहें हैं, उन्हें तो अवश्य देखा-परखा जाना चाहिए। ये वेदनाएं, कराहें, उत्तप्त अश्रु तथा आहें उस धरती की कोख में दबी रह गई हैं, जिस पर उठ कर पुरुष नाना पराक्रम करता है, अपने विधि-विधान और व्यवस्थाएं रचता है।

एक-एक कर जिन पात्रों की छवियां ‘स्त्रीशतक’ में अंकित की गई हैं, उनमें पिप्लादि की मां और दधीचि की पत्नी सुवर्चा है, धृतराष्ट्र की प्रेमिका वैश्य दासी नयना है, बालविधवा उलूपी है, कामरूप देश की सोलह हजार स्त्रियां हैं, घटोत्कच की पत्नी मौर्वी है, विदुर की मां इंदु है, जमदग्नि की पत्नी रेणुका है। हमारे आख्यान हमारी मांओं और बहनों की व्यथा-कथा को ही अनदेखा नहीं करते, वे उनके साहस की गाथाओं को भी दबा देते हैं। पवन करण ने इस किताब में उनकी कतिपय साहस गाथाएं भी गूंथी हैं। मित्रवृंदा और जांबवती जैसी स्वाधीन महिलाएं भी इस पुस्तक में हैं।

स्त्रीशतक : पवन करण; भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 370 रुपए।

ऑपरेशन ब्लैकहोल

वरिष्ठ कथाकार महावीर राजी की कहानियां अपने अद्भुत शिल्प और शिल्प के कंगारू-गोद में दुबके अछूते कथ्यों की वजह से निश्चित रूप से सचेत पाठक वर्ग का ध्यान आकर्षित किए बिना रह नहीं सकतीं। राजी के पास रूपकों और बिंबों में गुंथी सशक्त मुहावरेदार भाषा है, जो कहानियों के बहुआयामी कथ्यों को कलात्मकता के साथ पाठकों के अंत: में इस कदर उतारती है कि पाठक एकबारगी सन्न रह कर खुद ही अंतर्मुखी होता कथा-तत्त्वों के साथ एकाकार होता चला जाता है। राजी जमीन से जुड़े दृष्टिसंपन्न कथाकार हैं और अपने ‘तीसरे’ नेत्र से गिरगिट की तरह पल-पल रंग बदलते समग्र परिवेश पर पोस्टमार्टमी नजर रखते हैं। इसीलिए इनकी कहानियों में दलितों (सूखा, पानीदार), कृषकों (भाग्य विधाता), शोषितों (तंत्र, वामन अवतार) और तलछट के कमजोर वर्गों (दस कदमों का फासला, ऑपरेशन ब्लैकहोल) की कबूतर के नुचे पंखों सी तार-तार असहाय चीखों के साथ-साथ ‘अच्छे दिनों’ के टूटते सपनों का पूरी शिद्दत के साथ संवेदनशील चित्रण हुआ है। बेशक राजी किसी वाद या विमर्श-विशेष के प्रवक्ता नहीं हैं, लेकिन इनकी कहानियां संवेदना को झकझोरती पाठकों को स्वयमेव ही गहरे विमर्श के लिए विवश करती हैं और यही इन कहानियों की सार्थकता और सफलता है।

ऑपरेशन ब्लैकहोल : महावीर राजी; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 395 रुपए।

तुलसी विमर्श

यह पुस्तक घनश्यामदास पालीवाल का तुलसी केंद्रित राम-राग है। इस राग का अपना व्याकरण है, स्वर-लिपि है और उनका अपना संगीत भी है। वैसे मैथिलीशरण गुप्त ने ठीक ही लक्षित किया था कि- राम तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है/ कोई कवि बन जाय सहज संभाव्य है। दरअसल यह रामचरित की ही अनंत महिमा के विस्तार और नवीन व्याख्याओं का एक सराहनीय संयोजन है। सामान्यत: रामकाव्य केंद्रित काव्य एवं आलोचना परंपरा में राम का चरित्र सदैव प्रभावी और प्रेरक रहा है। पर इस पुस्तक में विद्वान लेखक ने तुलसी को केंद्र में रखा है। उसी केंद्र में रामकाव्य के अनंत आंगन की एक मनोरम छवि सहृदयों के लिए उकेरी है।

यह पुस्तक तुलसी के काव्य के अंतर्लोक और बहिर्लोक दोनों की यात्रा कराती है। सामान्यतया विद्वतजन या तो काव्य के आंतरिक पक्ष पर गहरे चले जाते हैं या फिर बाहरी पक्ष पर। ऐसे में यह एक संतुलित तुलसी विचार को हमारे विचार केंद्र में स्थापित ही नहीं करती, बल्कि कई अछूती, अस्पर्शी, अलक्षित विचार-सरणियों से हमारा परिचय बढ़ाती है। यह पुस्तक अपनी दृष्टि और भाषा में गहन गंभीर निहितार्थों को तो हमारे सामने रखती ही है, साथ ही रामकथा के महत्त्वपूर्ण व्यावहारिक और दार्शनिक आशयों की भावपरकता का निर्वहन भी करती है। हमारे समय के तथाकथित आकादमिक आलोचकों ने अपने वर्णन कौशल से जो क्षति रामकाव्य को पहुंचाई है, यह पुस्तक उसकी पूर्ति की दिशा में उठा एक महत्त्वपूर्ण कदम है। गंभीर और शास्त्रीय विमर्शों से परे यह पुस्तक अपने पाठक को एक प्रीतिकर और अनूठा अनुभव देती है।

तुलसी विमर्श : घनश्यामदास पालीवाल; सर्जना, शिवबाड़ी रोड, बीकानेर; 300 रुपए।

काला ताज

कथाकार अजय गोयल का यह दूसरा कहानी संग्रह है। अपने विशिष्ट कथ्य के कारण उनकी कहानियां एक जादुई प्रभाव डालती हैं और पाठक की संवेदना को गहराई से झकझोरती हैं। वे आसपास की घटनाओं का सूक्ष्म अवलोकन करते हैं, लेकिन उन्हें सीधे अपनी कथा में दर्ज नहीं करते हैं, बल्कि उसके आधार पर मानवीय संबंधों, विशेष रूप से बच्चों और अभिभावकों के बीच के रिश्तों में आने वाले परिवर्तनों की गहरी पड़ताल करते हैं और उसे ही अपनी कथा का प्रस्थान बिंदु बनाते हैं। इसीलिए उनकी कहानियां कहीं-कहीं फंतासी का रूप लेती प्रतीत होती हैं, लेकिन अभिव्यक्ति के स्तर पर वे जटिलता से सायास बचते हुए भी दिखाई देते हैं।

जिसे हम आज की कविता की विशेषता के रूप में रेखांकित करते हैं- ‘जटिल मनोभावों की सरल अभिव्यक्ति’, अजय अपनी कहानियों में उसे साधने में सफल होते दिखते हैं। यानी वे मनोभावों की जटिलता का सरलीकरण किए बगैर अभिव्यक्ति को सरल-सहज बनाए रखते हैं। इसीलिए उनकी कहानियां हमारे समय में अपनी अलग पहचान बनाती हैं। ‘काला ताज’, ‘हरम’ और ‘ओबामा का डिनर’ जैसी कहानियां बहुत कम शब्दों और सहज संरचना में, समय और समाज की जटिल सच्चाइयों को व्यक्त करने में सफल होती हैं।

अजय गोयल पेशे से शिशु एवं बाल्य रोग चिकित्सक हैं। वे बच्चों की शारीरिक संरचना और व्याधि के साथ-साथ उनके मनोभावों, आकांक्षाओं और अपेक्षाओं को भी समझने का प्रयास करते हैं। उनकी कई कहानियों के केंद्र में बच्चे हैं। लेकिन वे बालमनोविज्ञान मात्र के कथाकार नहीं हैं, बल्कि उनके सामने पूरा समाज है, जिसमें बच्चे भी शामिल हैं। इस तरह वे अपनी पेशेवर दक्षता और समझ के साथ हिंदी की कथा-भूमि का विस्तार भी करते हैं।

काला ताज : अजय गोयल; प्रकाशन संस्थान, 4268-बी/3, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 200 रुपए।

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