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किताबें मिलीं: ‘तीरे तीरे नर्मदा’, ‘मैं कृष्ण हूं’, ‘संगीत शब्दकोश’ और ‘जिंदगी 50-50’

किताबों की समीक्षा।

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'मैं कृष्ण हूं' और 'तीरे तीरे नर्मदा'

तीरे तीरे नर्मदा
मृतलाल वेगड़ नर्मदा-व्रती चित्रकार-लेखक थे। वे नर्मदा की पूरी परिक्रमा कर चुके थे। नर्मदा-परिक्रमा पर आधारित उनके चित्र अनेक प्रदर्शनियों में प्रकाशित हो चुके हैं। कला के साथ लेखन में भी रुचि रखने वाले वेगड़ ने नर्मदा पदयात्रा वृत्तांत की तीन पुस्तकें लिखी हैं। एक अच्छी पुस्तक का यह लक्षण है- उसका जादुई चमत्कार- कि लेखक के साथ सिर्फ उसके सहयात्री ही नहीं, पाठकों का एक लंबा काफिला भी साथ हो लेता है और रास्ता दिखाने वाला वेगड़जी जैसा गाइड हो, तब तो सोने में सुहागा है, क्योंकि तब वह नर्मदा के अतुल सौंदर्य को एक निपट नई निगाह से देखने लगता है। क्या कभी हमने सोचा था कि- ‘‘प्रवाह नदी का प्रयोजन है। अपने अस्तित्व के लिए उसे बहना ही चाहिए। बहना उसकी अनिवार्यता है। लेकिन प्रपात उसका ऐश्वर्य है, उसका अतिरिक्त प्रदान है। यह अतिरिक्त प्रदान ही किसी चीज को सौंदर्य प्रदान करता है। जहां प्रयोजन समाप्त होता है, वहां सौंदर्य शुरू होता है।’’
यह प्रपात के अनुपम सौंदर्य का बखान तो है ही, स्वयं सौंदर्य की अवधारणा के बारे में एक उज्ज्वल अंतर्दृष्टि देता है, जो बखान हमारे साहित्य के प्रयोजनवादी आलोचकों को कुछ सिखा सके! वेगड़जी के यात्रा संस्मरणों में सहज ज्ञान और समझदारी के इस तरह के अनमोल रत्न हर जगह बिखरे दिखाई दे जाते हैं और तब पता चलता है कि नर्मदा हो या हिमालय, जो लोग प्रकृति के सान्निध्य में रहते हैं, उन्हें जीवन के गहन सत्य बूझने के लिए किसी कॉलेज या विश्वविद्यालय में जाने की जरूरत नहीं। उन्हें पत्थरों में पारस, सर्मन्स आॅन द स्टोन मिल ही जाते हैं।
वेगड़जी का यात्रावृत्त पढ़ते हुए एक और बात मन में आती है- केवल भारतीय परंपरा में रसा-पगा व्यक्ति ही प्रकृति की नैसर्गिक सत्ता को इतने आत्मीय सगेपन और श्रद्धा से देख सकता है। नदी, पहाड़, वन सिर्फ भूगोल के उपादान मात्र नहीं हैं, वे मनुष्य के समूचे मिथक-संस्कारों को अपने में प्रतिबिंबित करते हैं। इसलिए वेगड़जी की नर्मदा यात्रा सिर्फ एक नदी की परिक्रमा नहीं है, वह एक पुरातन संस्कृति की अटलता को उसकी सतत प्रवाहमयता में आंकने का ‘आंखों देखा’ वृत्तांत है।

तीरे तीरे नर्मदा : अमृतलाल वेगड़; भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 650 रुपए।

मैं कृष्ण हूं
स्टसेलर ‘मैं मन हूं’ और कई अन्य किताबों के लेखक, दीप त्रिवेदी की खास बात यह है कि वे जीवन के गहरे से गहरे पहलुओं को छूते हैं और उन्हें सरलतम भाषा में लोगों के सामने प्रस्तुत करते हैं, जिससे कन्फ्यूजन की कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं बचती है।
मनुष्य जीवन की गहरे से गहरी सायकोलोजी पर उनकी पकड़ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मनुष्य के जीवन, सायकोलोजी, आत्मा, प्रकृति के नियम, भाग्य तथा अन्य विषयों पर सर्वाधिक (लगभग 12038) कोटेशन लिखने का रेकॉर्ड उन्हीं के नाम पर दर्ज है। साथ ही मनुष्य जीवन पर सर्वाधिक लेक्चर्स और ‘भगवद्गीता’ पर सर्वाधिक लेक्चर्स देने का रेकॉर्ड भी उन्हीं के नाम पर है, जिसमें उन्होंने अट्ठावन दिनों में गीता पर एक सौ अड़सठ घंटे, अट्ठाईस मिनट और पचास सेकेंड तक एक लंबी चर्चा की है। इसके अलावा अष्टावक्र गीता और ताओ-ते-चिंग पर भी सर्वाधिक लेक्चर्स देने का रेकॉर्ड उन्हीं के नाम पर दर्ज है। ये सारे रेकॉर्ड्स और अंतरराष्ट्रीय रेकॉर्ड बुक्स में दर्ज हैं और ये तमाम भाषण भारत में प्रत्यक्ष श्रोताओं के सामने दिए गए हैं।
वे अपने लेख और लेक्चर्स में जिस अनोखी आध्यात्मिक-मनोवैज्ञानिक भाषा और अभिव्यक्ति का इस्तेमाल करते हैं, उससे उन्हें पढ़ने तथा सुनने वालों में उसका तात्कालिक प्रभाव भी होने लगता है और यही बात उन्हें इस क्षेत्र का पायनियर बनाती है।
अब इसमें महत्त्वपूर्ण बात यह कि इन ग्रंथों में भी कृष्ण के जीवन से संबंधित कई बातों में विरोधाभास है। लेकिन मैंने यह विशाल कहानी लिखते वक्त उनके जीवन की जो बातें या किस्से उनके व्यक्तित्व से मेल खाते हैं, उन्हें ही चुना है। मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं एक मनोवैज्ञानिक हूं तथा अध्यात्मिक मनोविज्ञान लिखता, बोलता और जानता हूं और आध्यात्मिक मनोविज्ञान का अर्थ है कि संसार में कुछ भी रहस्य नहीं, यानी कोई ऐसी बात नहीं जो जानी और कही न जा सके।

मैं कृष्ण हूं: दीप त्रिवेदी; आत्मन इनोवेशंस, 7वीं मंजिल, तनिश्क शोरूम के ऊपर, न्यू लिंक रोड, अंधेरी (प.), मुंबई; 349 रुपए

संगीत शब्दकोश
ब्दों का अपना एक इतिहास होता है, अत: उनकी संज्ञाएं और अर्थ काल-प्रवाह में बदलते भी रहते हैं। संगीत संबंधी कोश के निर्माण में जो एक कठिनाई सामने आती है, वह है उसका विस्तार। रागों की संख्या, तालों की संख्या, वाद्यों की संख्या; संगीत के शास्त्रकार, गायक, वादक और नर्तकों की संख्या; इसके अलावा कर्नाटक संगीत से संबंधित आवश्यक जानकारी और वर्तमान काल में प्रचलित तथा अप्रचलित पारिभाषिक शब्द एवं संगीत के घरानों से संबंधित परंपराओं आदि के आधार पर ‘संगीत कोश’ के निर्माण में किस प्रक्रिया को अपनाया जाए और क्या ग्रहण किया जाए, जैसा चिंतन लेखक के सामने एक चुनौती के रूप में प्रकट होता है।
शब्द-व्यापार के माध्यम से ही हम संगीत-कला की प्रयुक्त परिभाषाओं को समझ पाते हैं। इसीलिए तत्संबंधी पारिभाषिक शब्दावली का महत्त्व बढ़ जाता है। एक छोटा-सा शब्द हमें क्रियाशील बना देता है, जो शास्त्र तथा गुरुउपदिष्ट मार्ग से प्राप्त होता है। ‘तराना’ या ‘तिल्लाना’ कहते ही उसकी गायन-विधा स्पष्ट हो जाती है। ‘आलाप’ या ‘झाला’ शब्द हमें तत्संबंधी वाद्यगत क्रिया का संकेत दे देते हैं। इसी प्रकार ‘अलारिप्पु’ या ‘तत्कार’ नृत्य गतियों का स्मरण कराने में सक्षम होते हैं।
प्रस्तुत कोश में राग और तालों को स्थान नहीं दिया गया है, क्योंकि उनकी कोई निश्चित संख्या नहीं है, वे निर्मित होते रहते हैं और होते रहेंगे, क्योंकि वे अनंत हैं। कालांतर में उनका स्वरूप भी बदलता रहता है। इसी प्रकार कोश में केवल ऐतिहासिक महान कलाकारों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है, जिनके बारे में जानना आवश्यक है। लोक में प्रचलित ऐसे शब्दों को भी ग्रहण किया गया है, जो केवल विभिन्न संप्रदायों की परंपरा में प्रचलित रहे हैं। भरत ने संगीत को नाट्य की शैया बताया है। संगीत तथा नाट्य का अभिन्न संबंध भी हमें स्पष्ट दिखाई देता है। इस दृष्टि से नाट्य से संबंधित ऐसे शब्दों को भी इस कोश में स्थान दिया गया है। प्रस्तुत कोश में छह हजार के लगभग शब्द हैं।
संगीत शब्दकोश : डॉ. लक्ष्मीनारायण गर्ग; संगीत कार्यालय, हाथरस; 500 रुपए।

जिंदगी 50-50
वनाएं, जरूरतें, महत्त्वाकांक्षाएं- ये सब एक स्त्री की- लेकिन शरीर पुरुष का! एक बेहद दर्दनाक परिस्थिति, जिसमें जिंदगी, जिंदगी नहीं, समझौता बन कर रह जाती है। ऐसे इंसान और उसके घरवालों को हर मुकाम पर समाज के दुर्व्यवहार और जिल्लत का सामना करना पड़ता है। अनमोल इस बात को अच्छी तरह समझते हैं, क्योंकि उनकी अपनी एकमात्र संतान और छोटा भाई, दोनों की यही वास्तविकता है, दोनों किन्नर हैं। भाई को पल-पल पिसते, घर और बाहर प्रताड़ित और अपमानित होते हुए देख अनमोल यह दृढ़ निश्चय करते हैं कि वह अपने बेटे को अधूरी जिंदगी नहीं, बल्कि भरपूर जिंदगी जीने के लिए हर तरह से सक्षम बनाएंगे! किन्नर होना कोई अभिशाप है और ऐसे तमाम सवाल इस किताब में उठाए गए हैं।
जिंदगी 50-50 : भगवंत अनमोल; राजपाल एंड संज, 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेट, दिल्ली; 225 रुपए।

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