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किताबें मिलींः ‘वह लड़की’, ‘नीदरलैंड डायरी’ और ‘घोंसला और बबूल का जंगल’

इस किताब में अनेक नए मुद्दे उठाए गए हैं। स्त्री शोषण पहले भी था, अब भी हो रहा है। नई पीढ़ी की लड़कियां शिक्षित होकर स्वावलंबी बन रही हैं। साथ ही सबल और जाग्रत भी हो रही हैं।

वह लड़की

इस किताब में अनेक नए मुद्दे उठाए गए हैं। स्त्री शोषण पहले भी था, अब भी हो रहा है। नई पीढ़ी की लड़कियां शिक्षित होकर स्वावलंबी बन रही हैं। साथ ही सबल और जाग्रत भी हो रही हैं। मोनी, बबली, निम्मी, प्रिया, इक्कीसवीं शताब्दी की जाग्रत युवा पीढ़ी की लड़कियां हैं। वे स्त्री-पुरुष असमानता और लिंग भेद को समाप्त करने के कदम उठाती हैं। निशा ‘महिला आंदोलन’ से जुड़ कर शोषित-पीड़ित महिलाओं को जाग्रत और सबल बनाने की मुहिम चलाती है। शैला घर और परिवार की जिम्मेदारी उठाने के साथ, ‘दलित आंदोलन’ और ‘महिला आंदोलन’ में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ममता की बेटी प्रिया डॉक्टर बनने के बाद शोषित-पीड़ित महिलाओं की मदद करके, समाज सेवा का कार्य करना चाहती है। ममता की बेटी निम्मी विवाह के बाद पति के साथ अपने माता-पिता के घर में रहने की शर्त रख कर, सामाजिक परंपराओं को बदलने की बात कहती है।

शम्मा की बेटी बबली ‘गुप्ता परिवार’ के विष्णु गुप्ता के साथ विवाह करके, अंतरजातीय विवाह द्वारा वर्णभेद, जातिभेद मिटाने का कदम उठाती है। शैला की बेटी मोनी स्वयं मां बनने की अपेक्षा, स्लम बस्ती की गरीब और उपेक्षित बच्ची को दत्तक लेकर, उसका उत्तम भविष्य बनाने का कार्य करती है। शैला भी अपने बेटे पुनीत का विवाह ‘अनाथ आश्रम’ की अनुराधा से करना चाहती है। वह ‘अनाथ आश्रम’ के वातावरण में फैले मनुवाद और हिंदूवाद का विरोध करके अपने उद्देश्य में सफल होती है।
इसलिए प्रस्तुत उपन्यास स्त्री प्रश्न को व्यापक परिप्रेक्ष्य में, तटस्थ दृष्टि से नए दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत करता है।

वह लड़की : सुशीला टाकभौरे; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 450 रुपए।

नीदरलैंड-डायरी

वैश्विक एकीकरण की दौड़ में आत्मनिष्ठ और व्यक्तिवादी होते जा रहे निष्ठुर समय में नीदरलैंड देश ने सरलता और सहजता की ऐसी आत्मीय शैली विकसित की है, जिसमें जीवन की सरसता का स्वाद मिलता है। विश्व में पसर रहे अमानवीय सांस्कृतिक प्रदूषण के भयानक समय में भी कई देशों की विभिन्न संस्कृतियों को साधे हुए यह देश किस तरह से अपनी सांस्कृतिक पहचान बनाए और बचाए हुए है, इसकी झलक भी इस पुस्तक से मिलती है।

‘नीदरलैंड-डायरी’ पुस्तक से गुजरते हुए महसूस होता है कि देश के ट्यूलिप फूलों की व्यावसायिक किसलई से आत्मनिर्भर होकर फूलों की खेती के नवीन प्रतिमान स्थापित किए हैं। सड़कों के किनारे गायों, भेड़ों और घोड़ों के चरागाहों से इस देश के ग्रामीण चरित्र की सरलता का आभास होता है। वाहनों के आधुनिक उपभोक्तावादी युग में साइकिलों को, आम से खास नागरिकों के वाहन के रूप में पहचान दिला कर पर्यावरण संरक्षित करने की आचरण संहिता की जानकारी भी दी है।

एक ओर यदि चीज (कास) मार्केट का व्यवसाय स्थापित करने वाले अलकमार शहर में चीज बाजार के साप्ताहिक अनुष्ठान का वैश्विक आकर्षण के रूप में उल्लेख है तो दूसरी ओर खेलों की संस्कृति रचने वाले देश में फुटबाल खेल के संदर्भ में रोमांचकारी जानकारी है।

नीदरलैंड-डायरी : पुष्पिता अवस्थी; किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 600 रुपए।

घोंसला और बबूल का जंगल

प्रस्तुत संग्रह की कहानियों में हमारे आसपास का परिवेश और उसमें रहते आम जन खुद जैसे अपने किस्से को बयान करते प्रतीत होते हैं। कहानियों के किरदार इतने सीधे, सच्चे और वास्तविक लगते हैं, जिनसे आम पाठक खुद को बड़ी सहेजता से जोड़ लेता है। ‘सलीब पर लटका आदमी’ के लालवानी जी हों या ‘दुर्गंध’ की सुजाता या ‘मेज नंबर 7’ का कथावाचक, सभी पात्र आम जन के सरोकारों में गहरे धंस कर उनके दुख-दर्द, कही-अनकही वेदना, आर्थिक दुरवस्था और बेबसी के कई चित्रों को साकार कर देते हैं। ‘वान्या’ जैसी स्त्री के माध्यम से गरीबी से त्रस्त निम्न मध्यवर्ग से आई लड़की की बेबसी या परवशता का दोहन करने वाले उसके रिश्तेदार द्वारा किए गए दुतरफा शोषण की निर्ममता से चीरफाड़ की गई है।

‘आखिरी पड़ाव’ कहानी में जहां दो पीढ़ियों के मूल्यों से जुड़े विमर्श पर व्यावहारिक समाधान की राह नजर आती है तो ‘सदानंद सनकिया गए हैं’ कहानी में आर्थिक असुरक्षा से संत्रस्त पात्र मेहनत के बावजूद हताश और बेबस नजर आता है। ‘उपलब्धियां’ कहानी में भौतिक सफलता के बावजूद जीवन में पसरी रिक्तता, खोखलेपन और मूल्यहीनता पर लेखकीय चिंता नजर आती है। इसी तरह की कहानी है ‘तस्मै श्री गुरूवे नम:’ जिसमें शिक्षा के व्यावसायीकरण पर तीखी टिप्पणी गौरतलब है। ‘दाग’ कहानी में आधुनिक दौर में सहशिक्षा और प्रेम विवाह पर नए समय की दस्तक साफ सुनाई देती है। ‘घोंसला और बबूल का जंगल’ कहानी में गरीबी से त्रस्त आमजन की दुरवस्था और तकलीफों को उभारते हुए रचनाकार ने एक नए अलक्षित हकीकत से पाठकों को अवगत कराया है। ‘शिफ्ट’ कहानी में जहां देश की बड़ी आबादी अभाव ग्रस्तक्ता है तो वहीं मुट्ठी भर लोग खोखली व रिक्तक्ता भरी जिंदगी जीने को मजबूर हैं।

घोंसला और बबूल का जंगल : गोविंद उपाध्याय; अनन्य प्रकाशन, ई-17, पंचशील गार्डन, नवीन शाहदरा, दिल्ली; 250 रुपए।

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