ताज़ा खबर
 

किताबें मिलींः ‘मुलाकात’, ‘सिर्फ कहानी नहीं’, ‘एक अतिरिक्त ‘अ’’ और ‘भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं महिलाएं’

लेखक ने ‘एक बार फिर’ जैसी कहानियों में हमारे समय की ऐतिहासिक वस्तु को निर्ममता के साथ चित्रित किया है। वे अपराधी समझे जाने वाले पात्र का मानसिक विश्लेषण करने में सिद्धहस्त हैं

Author September 30, 2018 1:54 AM
पुरुषसत्तात्मक समाज वेश्याएं तो बनाता है, पर उनके लिए समाज में कोई स्थान निश्चित नहीं कर पाता। यह कड़वी सच्चाई बयान करती है ‘रंडिया औरत नहीं होतीं’ शीर्षक कहानी।

मुलाकात

समय के साथ हिंदी कहानी ने जो संवेदनात्मक और संरचनात्मक संश्लिष्टता अर्जित की है, संजय सहाय की कहानियां उसकी उम्दा मिसाल हैं। प्रस्तुति का ढंग ऐसा है मानो सब कुछ आपके सामने घटित हो रहा है। यही नहीं, पढ़ते हुए या घटनाओं को ‘देखते’ हुए आपको ऐसा लगता है मानो आप सिर्फ द्रष्टा नहीं, उस दारुण नाट्य-कथा के खुद कोई पात्र हैं। यह तभी संभव है, जब रचना में डिटेल्स विश्वसनीय हों। विश्वसनीयता- कह देने की नहीं, उसे दिखा देने की होती है। यह दिखा देना निर्णायक है, क्योंकि ‘नाट्य’ के बिना दृश्यता नहीं आ सकती। और नाट्य में सिर्फ सीक्वेंस नहीं होता। उसमें कुतूहल, स्वाभाविकता या ऐसी अप्रत्याशिता होती है, जो असाधारण तो हो, किंतु असंभव नहीं। यह शिल्प संजय सहाय की कहानियों में सार्थक इसलिए होता है क्योंकि उनकी कहानियों की कथा-वस्तु कल्पित नहीं, इतिहास- हमारे समय की वास्तविकता है। वर्तमानता की धार रचना की वस्तु होती है।

इस संग्रह की पांच कहानियों में से एक भी ऐसी नहीं है, जो एकरेखीय कथा-विकास का सहारा लेती हुई आपको किसी निर्द्वंद्व निर्णय तक ले जाती हो। बुनियादी मानवीय नैतिकता और न्यायसंगत पक्षधरता के प्रश्नों पर यहां कोई धुंधलका नहीं है, लेकिन उससे आगे, कथा-स्थितियों और चरित्रों के चुनाव-रचाव-बरताव में सीधे-सादे फैसले तक पहुंचने की सहूलियत से सख्त और परिपक्व परहेज है। ‘पूछने के लिए जनाब कुछ भी पूछा जा सकता है, पर जरूरी नहीं कि हर सवाल का पका-पकाया जवाब आसानी से मिल ही जाए!’ ‘मुठभेड़’ कहानी के आखिरी हिस्से में आए सर्वज्ञ वाचक के इस कथन को हम संजय सहाय की कहानियों का सूत्र-वाक्य मान सकते हैं। संरचना के स्तर पर भी इन कहानियों का नवाचार गौरतलब है।

लेखक ने ‘एक बार फिर’ जैसी कहानियों में हमारे समय की ऐतिहासिक वस्तु को निर्ममता के साथ चित्रित किया है। वे अपराधी समझे जाने वाले पात्र का मानसिक विश्लेषण करने में सिद्धहस्त हैं। उनका अपराध-विश्लेषण या अंकन अपराध-स्वीकार या कनफेशन तक नहीं रुकता। उनके रचनाकार की प्रामाणिकता उनकी कहानियों के इस प्रभाव में है कि अपराध ऐसा आहत करता है कि उसकी भरपाई कनफेशन में या पश्चात्ताप में भी नहीं समाती। आहत होने की यातना अमिट, अमार्जनीय है। ‘मुलाकात’ और ‘गांठ’ सर्रियल अवकाश में चलती कहानियां हैं, जिनमें अचेतावस्था की युक्ति कथ्य को बेहद ताकतवर तरीके से व्यक्त करने का साधन बन जाती है। ये कहानियां कहानियां होने के साथ-साथ नाटक या फिल्म की पटकथा भी हैं, कहन-शिल्प के कारण। खास बात यह है कि अपने पाठक से योग्यता के एक स्तर की अपेक्षा रखने के बावजूद इन कहानियों में भरपूर पठनीयता है। किसी सुधी के लिए यह कृशकाय संग्रह एक लंबी बैठक से ज्यादा का सामान नहीं।

मुलाकात: संजय सहाय; राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, दरियागंज, नई दिल्ली; 125 रुपए।

सिर्फ कहानी नहीं

प्रस्तुत संग्रह की कहानियां हमें भयावह यथार्थ से रूबरू कराती हैं। इन कहानियों को पढ़ते हुए कहीं भी अस्वाभाविकता या कृत्रिमता का बोध नहीं होता। ये कहानियां बौद्धिक, नैतिक तथा भावनात्मक अन्वेषण पर केंद्रित हैं तथा समाज की विडंबनाओं और विद्रूपताओं पर प्रकाश डालती हैं। ‘मिले- ईश्वर को’ कहानी पढ़ कर अहसास होता है कि हम बाहर से तो खूब मॉडर्न दिखते हैं तथा अल्ट्राटेक युग में जी रहे हैं, फिर भी हम प्रेम को दिल से स्वीकार नहीं करते। इसी विरोधाभास की परिणति फिर ऑनर किलिंग जैसे घिनौने अपराध के रूप में सामने आती है।

पुरुषसत्तात्मक समाज वेश्याएं तो बनाता है, पर उनके लिए समाज में कोई स्थान निश्चित नहीं कर पाता। यह कड़वी सच्चाई बयान करती है ‘रंडिया औरत नहीं होतीं’ शीर्षक कहानी। एक ग्रामीणेतर व्यक्ति जो कि लोन व्यवस्था में न चाहते हुए भी फंसा हुआ होता है, स्वयं को ‘ट्रैक्टर और सुहागा’ शीर्षक कहानी के किसान के नजदीक, बहुत ही नजदीक खड़ा पाता है। कैसी विडंबना है कि ‘कार्टून’ जैसे पात्र के लिए हमारी व्यवस्था कोई हल सुझाती हुई नहीं प्राप्त होती है। ‘मुझे माफ करना बेटी’ जहां लैंगिक असमानता को रेखांकित करती है, ‘बोल रे सरपंच…’ ठेठ ग्रामीण जीवन की कहानी है जो औरत को एक स्वतंत्र इकाई के रूप में स्थापित करती है। ‘सिर्फ कहानी नहीं’ कहानी के काम-पिपासु, बलात्कारी नायक से आप चाह कर भी नफरत नहीं कर पाते हैं। कहानी का यही बिंदु एक विमर्श को आमंत्रित करता है।

सिर्फ कहानी नहीं: रामकुमार आत्रेय; नेशनल पेपरबैक्स, 1, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 350 रुपए।

एक अतिरिक्त ‘अ’

रश्मि भारद्वाज की कविता में एक ऐसे दुख से हमारी मुलाकात होती है, जिसके अनुपस्थित होने पर बड़ी कविता की रचना मुमकिन नहीं हुई है, लेकिन वह दुख अपने को प्रचारित नहीं करता, बल्कि अपनी विविध छवियों के साथ ‘किसी की अनुपस्थिति में खुद को सहेज लेता है- हमेशा उपस्थित रहने के लिए।’ ऐसे दुख में एक अंतर्निहित शक्ति चमकती है। शायद इसीलिए ये कविताएं पाठक की संवेदना में अंतत: हताशा पैदा नहीं करतीं। मिर्ज़ा ग़ालिब ने कभी कहा था- ‘मैं हूं अपनी शिकस्त की आवाज।’ रश्मि की ज्यादातर कविताओं में निराशा और शिकस्त का जो ‘भिन्न षडज’ बजता रहता है, वह इस तरह है- ‘सबसे हारे हुए लोगों ने रचीं सबसे भव्य विजय गाथाएं/ टूटते थकते रहे/ लेकिन पन्नों पर रचते रहे प्रेम और जीवन।’ यह सिर्फ निजी हताशा नहीं है, बल्कि अपने समय की उदासी है।

इस कविता का अनुभव संसार महानगरों के जीवन में सांस लेता है, लेकिन उसमें एक कस्बे या छोटे शहर की स्मृतियां अंतर्धारा की तरह बहती रहती हैं। यहां एक तरफ अपने भावी और शहराती पति को खुश करने के लिए कांटे-छुरी से पित्जा खाने की विफल कोशिश करती एक लड़की दिखती है, तो दूसरी तरफ एक रात के लिए देवी का रूप लेती हुई स्त्री का जीवन भी है, जो पाठक को गहरे विचलित कर देता है। ज्यादातर कविताओं में एक नयापन है और वह इसके नाम ‘एक अतिरिक्त अ’ से ही शुरू हो जाता है।

एक अतिरिक्त ‘अ’: रश्मि भारद्वाज; भारतीय ज्ञानपीठ, 18, इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 240 रुपए।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं महिलाएं

भारत में राष्ट्रीय चेतना के कारण ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का जन्म हुआ। कांग्रेस प्रारंभ से ही राष्ट्रीय संस्था के रूप में अपना राष्ट्रीय चरित्र बनाने में सफल रही, जिसके कारण महिलाएं भी राजनीति में रुचि लेने लगीं। बीसवीं शताब्दी में धीरे-धीरे महिलाओं में सामाजिक जागृति के साथ-साथ राष्ट्रीय चेतना के लक्षण दृष्टिगोचर होने लगे। उनके उत्थान एवं जागरण अभियान में अनेक महिलाओं ने भाग लिया, जिनमें पंडिता रमाबाई, स्वर्ण कुमारी देवी, सरला देवी, पार्वती देवी आदि ने अपूर्व कार्य किया। भारत के बाहर की महिलाएं भी भारतीय महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत बनीं, जिनमें एनी बेसेंट, मीरा बेन (मेडलीन स्लेड), मारग्रेट कुजिंस आदि महत्त्वपूर्ण थीं।

इस समय विदेशों में भी अनेक नारीवादी आंदोलन चल रहे थे। श्रीमती सरोजिनी नायडू ने भी महिलाओं के लिए स्त्री मताधिकार के पक्ष में अपने विचार प्रस्तुत किए। गांधीजी के आह्वान से भी कांग्रेस में महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहन मिला। गांधीजी अहिंसा को क्रांतिकारी अस्त्र के रूप में प्रयोग करना चाहते थे, क्योंकि ये महिलाओं के लिए उपयुक्त परिस्थिति निर्माण करने में सहायक था। धीरे-धीरे राष्ट्रीय चेतना एवं सामाजिक जागृति ने महिलाओं की भूमिका में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किया। सामाजिक कार्यों में भाग लेने के कारण उनके आत्मसम्मान और आत्मविश्वास में वृद्धि हुई। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में महिलाओं की भूमिका विषय पर डॉ. श्वेता ने एक महत्त्वपूर्ण कालावधि (1920-1950 तक) का अध्ययन कर एक बड़े अभाव की पूर्ति की है।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस एवं महिलाएं: डॉ. श्वेता; वाणी प्रकाशन, 4695, 21-ए, दरियागंज, नई दिल्ली; 695 रुपए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App