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किताबें मिलींः ‘खर्रा और अन्य कहानियां’, ‘हरी मुस्कराहटों वाला कोलाज’ और ‘जीवनपुरहाट जंक्शन’

कोई भी रचना अगर सलीके से सवाल उठाने में कामयाब हो जाए तो वह अपने सामाजिक दायित्व की पूर्ति कर लेती है।

Author September 16, 2018 4:13 AM
हरी मुस्कराहटों वाला कोलाज

खर्रा और अन्य कहानियां

कोई भी रचना अगर सलीके से सवाल उठाने में कामयाब हो जाए तो वह अपने सामाजिक दायित्व की पूर्ति कर लेती है। ‘खर्रा और अन्य कहानियां’ संग्रह की सभी कहानियां समकालीन जीवन के छोटे-छोटे संदर्भों को बड़े परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करती हैं। इन कहानियों के लेखक सुभाष शर्मा यथार्थवादी लेखक हैं। कहानी में कथानक, सामाजिक सरोकार, विवरणधर्मिता और युक्तिसंगत समापन में उनका भरोसा है। यही कारण है कि सुभाष की कहानियां बेहद पठनीय हैं और पाठक की चेतना को झकझोरती हैं।
इस संग्रह की सभी कहानियां व्यवस्था और सत्ता के भीतरी सच को बयान करती हैं। अनेक कहानियां शिक्षा तंत्र के तहखानों को रोशनी में लाती हैं। योग्यता, अवसर और दायित्व का उपहास करती स्थितियों और मनोवृत्तियों को पूरी संवेदनशीलता के साथ कहानीकार ने उजागर किया है। इस संग्रह में स्त्री के संघर्षमय संसार को चित्रित किया गया है। बिना किसी विमर्श के जाल में उलझे हुए लेखक ने स्मरणीय कहानियां लिखी हैं।

‘खर्रा और अन्य कहानियां’ संग्रह की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह भी है कि बिना लाउड हुए या बिना प्रचारात्मक हुए सुभाष शर्मा ने वर्तमान राजनीति के बहुलांश चरित्र को कहानियों में उतार दिया है। इस चरित्र को चित्रित करने में लेखक की अर्थगर्भित भाषा महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ‘दास्तान-ए-सुबूत’ में लेखक कहता है, ‘पहले कार्यकाल में वह जान गए थे कि खजाना कहां-कहां है। चुनाव, मुकदमा, राजनीतिक षड्यंत्र आदि में जितना खर्च हुआ था, उसकी भरपाई उन्होंने सुपरसोनिक गति से करना शुरू कर दिया।’ ऐसी व्यंजक भाषा में रची गई ये कहानियां यथार्थ को पूरी प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं।

खर्रा और अन्य कहानियां : सुभाष शर्मा; किताबघर प्रकाशन, 4855-56/24, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली; 460 रुपए।

हरी मुस्कराहटों वाला कोलाज

प्रस्तुत कहानी संग्रह के लेखक गौतम राजऋषि भारतीय सेना में कर्नल हैं। उनकी अभी तक अधिकांश पोस्टिंग कश्मीर के आतंकवाद ग्रस्त इलाकों और बर्फीली ऊंचाइयों पर ‘लाइन आॅफ कंट्रोल’ पर हुई है। उन्होंने दुश्मनों के साथ कई मुठभेड़ों का डट कर सामना किया और एक बार तो गंभीर रूप से घायल भी हुए। ‘पराक्रम पदक’ और ‘सेना मेडल’ से सम्मानित कर्नल गौतम राजऋषि की राइफल के अचूक निशाने की तरह ही उनकी कलम भी अपना प्रभाव छोड़ती है। एक तरफ जहां वे अपनी ड्यूटी पर तैनात रहते हैं, वहीं जो भी फुरसत की घड़ियां मिलती हैं, उनमें कलम उठा लेते हैं।

चुनौतीपूर्ण फौजी जीवन को उन्होंने करीब से जिया और देखा है। इस बीच कई ऐसी घटनाएं हुर्इं और ऐसे पात्र मिले जो यादगार बन गए। इन्हीं अनुभवों और स्मृतियों को लेकर उन्होंने कहानियां लिखीं, जो इस पुस्तक में सम्मिलित हैं। इन कहानियों में फौजी जीवन की वह झलक मिलती है, जो आम नागरिक से बहुत अलग है और जिसे पढ़ते हुए पाठक फौजी माहौल में पहुंच जाता है। यह उनकी दूसरी पुस्तक है। उनकी पहली पुस्तक ‘पाल ले इक रोग नादान’ जो गजलों का संकलन थी, काफी लोकप्रिय और चर्चित रही।

हरी मुस्कराहटों वाला कोलाज: गौतम राजऋषि; राजपाल एंड सन्स, 1590, मदरसा रोड, कश्मीरी गेड, दिल्ली; 195 रुपए।

जीवनपुरहाट जंक्शन

जीवनपुरहाट जंक्शन एक युवा मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव के हवाले से अस्सी के दशक का ऐसा वितान प्रस्तुत करता है, जो अब शायद हमारी स्मृतियों से गुम हो चुका है। जीवनपुरहाट जंक्शन स्मृति और आख्यान का ऐसा अप्रतिम समन्वय है, जो लेखक के जीवन में आए ऐसे पात्रों की उपस्थिति दर्ज करता चलता है जिसे अक्सर हम भुला देते हैं। लेकिन लेखक के तौर पर अशोक भौमिक ने अपनी इस नवीनतम कृति में उन्हें एक मुकाम दिया है। एक नजर में ये पात्र महत्त्वपूर्ण नहीं लगते, लेकिन जैसे-जैसे हम उनको पढ़ते चलते हैं- वे एकाएक लेखक के जीवन में महत्त्वपूर्ण बनते चले जाते हैं। सुरजीत, शरफुद्दीन, आंटीजी, मास्टर जी जैसे न जाने कितने ही चरित्र हैं जो इस पुस्तक में आए हैं और अपनी उपस्थिति से हर बार कुछ नया सबक दे जाते हैं। चूंकि लेखक खुद एक चित्रकार भी हैं इसलिए उनकी भाषा की बारीकियां और उसके तहों में लिपटे रंगों का सौंदर्य सुख पाठकों को अंत तक बांधे रखने में सक्षम है।

इस पुस्तक को ‘स्मृति-आख्यान’ कहा गया है, पर यह अपने शिल्प में कहानी का आस्वाद लिए हुए है। लेखक का इस पुस्तक के बारे में कहना है कि ‘मैंने जीवनपुरहाट जंक्शन पर क्या पाया-क्या खोया, इसे बताने के लिए ये कहानियां नहीं हैं। बल्कि इन कहानियों के जरिए मुझे बस इतना ही बताना था कि मेरे रंगों के पैलेट में जितने रंग हैं, उससे कहीं ज्यादा विविध रंगों में ये जिंदगी हमसे मिलती रहती है- जिसके किसी भी मोड़ पर कोई पूर्वानुमान काम नहीं आता।… अन्यायी, दुराचारियों और लंपटों को यश और सफलता की शीर्ष पर बंशी बजाते देखा, तो वहीं लाखों मेहनती, ईमानदार और प्रतिभाशाली लोगों को मिट जाते देखा।’

जीवनपुरहाट जंक्शन : अशोक भौमिक; भारतीय ज्ञानपीठ, 18 इंस्टीट्यूशनल एरिया, लोदी रोड, नई दिल्ली; 300 रुपए।

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