ताज़ा खबर
 

किताबें मिलींः ‘रास्ते फिसल रहे हैं’, ‘उद्भ्रांत का बाल साहित्य’ और ‘कुछ आखिरी नहीं होता’

यह उमेश प्रसाद सिंह के ललित निबंधों का नवीनतम संग्रह है। आधुनिक हिंदी गद्य विधा के आरंभ से ही ललित निबंध की एक लंबी परंपरा रही है, जहां विधागत रूप से ललित निबंध कठोर साधना की अपेक्षा रखता है।

Author October 7, 2018 3:33 AM
संग्रह के निबंधों में चिंतन का परिप्रेक्ष्य व्यापक है। इनमें मनुष्य जाति की गौरवशाली विरासत की गरिमा का यशगान भी है और सामयिक जीवन के विडंबना बोध की गहन अभिव्यंजना भी।

रास्ते फिसल रहे हैं

यह उमेश प्रसाद सिंह के ललित निबंधों का नवीनतम संग्रह है। आधुनिक हिंदी गद्य विधा के आरंभ से ही ललित निबंध की एक लंबी परंपरा रही है, जहां विधागत रूप से ललित निबंध कठोर साधना की अपेक्षा रखता है। ललित निबंधकार सृजन के आकाश में उन्मुक्त एवं स्वछंद रूप से पक्षी की तरह उड़ता है और उड़ कर इसी जमीन, इसी लोक में आत्मीय लोक में आता है। उमेश प्रसाद सिंह ललित निबंधकार के रूप में अपनी अलग पहचान कायम कर चुके हैं। डॉ. जितेंद्रनाथ मिश्र के शब्दों में, ‘इनके निबंध हिंदी के ललित निबंधों के इतिहास में नई भंगिमा के द्योतक हैं। उमेश प्रसाद सिंह आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, शिवप्रसाद सिंह, आचार्य विद्यानिवास मिश्र, कुबेरनाथ राय, विवेकी राय और ठाकुर प्रसाद सिंह जैसे समर्थ ललित निबंधकारों की पंक्ति में अपना एक स्थान रखते हैं। वे सभी से भावित एवं प्रभावित होते हैं, किंतु वे किसी के जैसे नहीं अपितु स्वयं अपने जैसे हैं।’

संग्रह के निबंधों में चिंतन का परिप्रेक्ष्य व्यापक है। इनमें मनुष्य जाति की गौरवशाली विरासत की गरिमा का यशगान भी है और सामयिक जीवन के विडंबना बोध की गहन अभिव्यंजना भी। निबंधों की भाषा में लालित्य के लास्य के साथ तीखी चुभन भी है। हर कहीं अर्थ-संदर्भ में ध्वनि की वक्रता बहुस्तरीय व्यंजन के संकेत देती है। गद्य में लयात्मक भाषा का संक्षिप्त संयोजन और आवर्ती स्वर-विधान इन निबंधों की सर्वथा नई विशिष्टता है। इनमें जीवन स्थितियों को एक अलग धरातल से देखने-समझने का उत्फुल्ल आमंत्रण है।

रास्ते फिसल रहे हैं : उमेश प्रसाद सिंह; प्रतिश्रुति प्रकाशन, 7 ए, बेंटिक स्ट्रीट, कोलकाता; 150 रुपए।

उद्भ्रांत का बाल साहित्य

उद्भ्रांत ने हिंदी साहित्य की अनेक विधाओं पर लेखनी चलाई है, किंतु मूलत: वे कवि हैं। यह बात उनके बाल साहित्य पर भी लागू होती है। बच्चों के लिए लिखना उनका प्रदेय अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। बच्चों के लिए लिखना लेखक के लिए सरल को स्वीकार करना नहीं, वरन अपनी लेखनी की अग्नि-परीक्षा में खरा उतरना सिद्ध करना है। इस खरे उतरने के क्रम में लेखक काव्य, नाटक, उपन्यास, कहानी, संगीत-रूपक आदि समस्त विधाओं में रचना करते हुए डेढ़ दर्जन से अधिक बालोपयोगी कृतियां साहित्य को भेंट कर चुके हैं। यह पुस्तक उद्भ्रांत की वह प्रस्तुति है, प्रयाग में त्रिवेणी का वह स्थल- जहां यमुना, गंगा और अनदेखी त्रिवेणी का अनुभव किया जा सकता है।

बाल साहित्य की यमुना साहित्य की गंगा में समर्पित हो जाती है। लेखक के विशाल व्यक्तित्व में यमुना भी है, गंगा भी है और सरस्वती भी है। उनकी बाल-साहित्य की यमुना-यात्रा यमुनोत्री से प्रारंभ होकर उत्तरांचल, हिमाचल और हरियाणा पार करके उत्तर प्रदेश के प्रयाग में समाप्त हो जाती है। साहित्य की मुख्यधारा में नामशेष हो जाती है। लेकिन उनकी यमुना संस्मरणों और स्मरणीय रचनाओं की गुणवत्ता को संजोए गतिमान रही है। उस यात्रा का अपना महत्त्व है। प्रस्तुत पुस्तक को तीन खंडों में विभाजित किया गया है। पहले खंड ‘चिंतन’ में विभिन्न लेखकों के संस्मरणात्मक-मूल्यांकनपरक आलेख हैं। दूसरे खंड में बाल-काव्य एवं तीसरे खंड में बालोपयोगी गद्य-साहित्य है।

उद्भ्रांत का बाल-साहित्य : सृजन और मूल्यांकन : संपादक- डॉ. जयप्रकाश भारती, डॉ. राष्ट्रबंधु; इंडिया नेटबुक्स, सी-122, सेक्टर-19, नोएडा; 550 रुपए।

कुछ आखिरी नहीं होता

ओमप्रकाश शर्मा ‘प्रकाश’ की कविताएं जिंदगी की जमीन से उगी हुई कविताएं हैं। जो चारों ओर घटित हो रहा है, जो आपके आसपास बिखरा-पसरा है, उनके अक्स कविताओं में मिलेंगे। यह वास्तविक जीवन की अक्कासी है। प्रकृति के उपकरण हमारे जीवन से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं। उन्हीं में हम जीते और अंतत: विलीन हो जाते हैं। उनसे बाहर हमारी कोई गति नहीं। यहां आप पक्षियों की आवाजें सुन सकते हैं- मोर, तोते, कबूतर, चिड़ियां, कुत्ता आदि सब। कवि उन्हें सखा-सहचर के रूप में देखता है। सीधी-सादी कविताओं के विषय-शीर्षक आम हैं; एकदम आसपास के। कविताओं में स्थान-स्थान पर समकाल ताक-झांक करता मिलेगा। कहीं व्यक्तिगत सुख-दुख तो कहीं पीड़ा-प्रसन्नता भी है। कहीं दूसरों की बातें हैं, जिन्हें लेखक ने अपने नजरिए से रखा है। कहीं युग और जीवन की समस्याएं और चिंताएं हैं।

मानवीय संबंध और उनकी जटिलताओं का सामना हर कोई जब-तब करता है। कई बार ये उलझनें व्यक्ति को परेशान करती हैं। वह इनसे समायोजन और इनके समाधान के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहता है। कई कविताओं की विषय-वस्तु व्यक्तिगत संबंधों के संवाद और संकेत हैं। प्रस्तुत कविताएं सरल और सुबोध हैं किंतु प्राय: अभिप्रेत सतह पर नहीं हैं। इसके बावजूद ये किसी दार्शनिक जटिलता या बौद्धिक कलाबाजियों का शिकार नहीं हुई हैं। क्योंकि ये अनुभव जनित हैं, इसलिए वास्तविक लगती हैं और हृदय को स्पर्श करती हैं। पाठक को लग सकता है कि हां, इस स्थिति का सामना तो मुझे भी करना पड़ता है। इनमें जिंदगी के वे सवाल हैं जिनका दायरा व्यक्ति-विशेष से बढ़कर पूरी मानवता तक फैलता है।

कुछ आखिरी नहीं होता : डॉ. ओमप्रकाश शर्मा ‘प्रकाश’; पांडुलिपि प्रकाशन, 77/1, ईस्ट आजाद नगर, दिल्ली; 295 रुपए।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App