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दूसरी नजर: बड़े सुधार की जरूरत

जब कार्यपालिका अपने विशुद्ध प्रशासनिक या नीतिगत फैसले पर बिना विधिशास्त्र आधारित समीक्षा चाहती है तो उसे अपने विधि अधिकारियों के जरिए कार्यपालिका को सुप्रीम कोर्ट का सामना करना चाहिए।

supreme courtसुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय पर करीबी नजर रखने वाले इस पर सहमत होंगे कि पिछले दो दशकों में अदालत की भूमिका, कामकाज और कार्यवाही में उल्लेखनीय रूप से बदलाव आया है। गौर करने लायक कुछ बिंदु ये हैं-
-जजों को मामले दिए जाने की व्यवस्था, खासतौर से अध्यक्षता कर रहे जज,
-खंडपीठों का गठन,
-अदालतों के न्याय क्षेत्र का विस्तार,
-निश्चित फैसलों में न्यायशास्त्र की स्थापना, और
-कार्यपालिका की शक्तियों का क्षरण।
पुरानी चिंताएं बरकरार

कई अध्येताओं ने न्यायिक सुधारों को लेकर काफी कुछ लिखा है। केंद्र और राज्य सरकारों ने कई सुधारों की शुरुआत भी की, जैसे- विशेष अदालतों का गठन, ज्यादा जजों की नियुक्ति आदि। इसी तरह संसद ने कई कानून बनाए, और सुप्रीम कोर्ट ने खुद से डिजिटलीकरण, केसों का प्रबंधन और अब आभासी अदालतों की शुरुआत कर इन सुधारों को बढ़ाया है। फिर भी, परेशान करने वाली स्थितियां जस की तस हैं, उनमें हर स्तर पर बड़ी संख्या में लंबित पड़े मामले, बड़ी तादाद में जजों के खाली पड़े पद और दिए गए न्याय की गुणवत्ता को लेकर वादियों में सामान्य असंतोष है।

ताजा चिंता न्यायपालिका की ‘स्वतंत्रता’ को लेकर जताई गई है। इस चिंता के कारण अधीनस्थ न्यायपालिका, उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के स्तर पर अलग-अलग हैं। इस वक्त मेरा ध्यान सुप्रीम कोर्ट पर है। जहां तक मौलिक अधिकारों का संबंध है, और अब मानव, पशु और पर्यावरण/ पारिस्थिकीय अधिकारों के मामले भी बढ़ रहे हैं, सुप्रीम कोर्ट एक सजग प्रहरी की तरह निगरानी करता है। वह इस भूमिका को तभी निभा सकता है, जब अदालत पूर्णरूप से स्वतंत्र हो, और मेरे विचार से, ऐसी स्वतंत्रता तभी संरक्षित और प्रदर्शित की जा सकती है, जब कुछ बड़े सुधार हो रहे हों। यहां पेश हैं कुछ वांछित सुधार-

संवैधानिक अदालत की जरूरत
1- सुप्रीम कोर्ट का दर्जा बढ़ा कर संवैधानिक अदालत का किया जाना चाहिए। इसे सिर्फ उन्हीं मामलों की सुनवाई करनी और फैसला देना चाहिए, जिनमें भारत के संविधान की व्याख्या से संबंधित प्रश्न हों, और गाहे-बगाहे ऐसे मामलों में जो सार्वजनिक महत्त्व के कानूनी विषयों और उनके नतीजों से संबंधित हों। मेरे इस प्रस्ताव के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के सात जज एक अदालत के रूप में बैठेंगे, खंडपीठों में नहीं।

तत्काल एक सवाल यह उठेगा कि हाईकोर्टों के फैसलों पर दायर अपील कौन सुनेगा? अपीलीय न्यायक्षेत्र वास्तव में एक महत्त्वपूर्ण कार्य है, खासतौर से संघीय व्यवस्था में, और हाईकोर्ट टकराव भरे फैसले दे सकते हैं। इसका जवाब यह है कि अपीलीय अदालतें बनाई जाएं, पांच अपीलीय अदालतें, इनमें हर अदालत में छह जज हों जो तीन-तीन जजों के दो खंडपीठ में बैठें, सभी तीस जज एक साथ। उस देश के लिए यह कोई बड़ी संख्या नहीं है, जिसकी आबादी एक सौ इकसठ करोड़ के शीर्ष पर पहुंचने की संभावना है।

इस तरह सैंतीस जजों (सुप्रीम कोर्ट के जजों की स्वीकृत संख्या इस वक्त चौंतीस है) वाली सर्वोच्च अदालत की अपीलीय अदालत और एक संवैधानिक अदालत के रूप में भूमिका तय कर सुधार किया जा सकता है।

2- खंडपीठों को मामले ‘देने’ की प्रथा को खत्म किया जाना जरूरी है। नई व्यवस्था में न तो कोई खंडपीठ होगा और न ही मास्टर ऑफ रोस्टर की जरूरत पड़ेगी। (आलोचकों का कहना है कि मास्टर ऑफ रोस्टर की व्यवस्था रोस्टर आफ द मास्टर में तब्दील हो गई है।) प्रधान न्यायाधीश के रूप में अपने अठारह दिन के संक्षिप्त कार्यकाल में न्यायमूर्ति केएन सिंह ने अपने खंडपीठ को कुछ मामले दिए थे और इन पर फैसले किए थे, उनकी सेवानिवृत्ति के बाद उनमें से कई फैसलों की समीक्षा की गई और उन्हें पलट दिया गया।

कोई यह कैसे स्पष्ट कर सकता है कि एक मामले में न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा, जिसमें उनके ही खिलाफ आरोप हैं, दूसरे खंडपीठ के न्यायिक आदेश को दरकिनार करते हुए अपनी अध्यक्षता में पांच जजों का खंडपीठ बना कर एक प्रशासनिक आदेश जारी करते हैं और फिर उसे तीन जजों वाले खंडपीठ को सौंप देते हैं? और कोई कैसे न्यायमूर्ति रंजन गोगोई को माफ कर सकता है, जिसमें उन्होंने अपनी अध्यक्षता वाले खंडपीठ को वह मामला सौंप दिया, जिसमें उनके अपने ही खिलाफ आरोप लगे थे।

इस पीठ में दो और जज भी थे, और यह पीठ सिर्फ इन दोनों जजों के हस्ताक्षरों से आदेश पास करता रहा और सुनवाई करता रहा? ये वाकई बेहद खराब उदाहरण हैं, लेकिन हमें सुप्रीम कोर्ट के खंडपीठों को मामले आबंटित करने की व्यवस्था को खारिज करना चाहिए।
अन्य सुधार

3- चूंकि खंडपीठ मामलों की सुनवाई करते हैं, इसलिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा घोषित कानून अनिश्चित होता है। हर शीर्ष अदालत ने अपनी पूर्व की व्यवस्थाओं को पलटा है, लेकिन आमतौर पर इस तरह का बदलाव युगों के बदलावों या फिर व्यापक स्तर पर लोगों के विरोध के कारण हुआ है।

हालांकि भारत में फैसले इसलिए पलटे गए हैं, क्योंकि दो या तीन सदस्यों वाले खंडपीठ ने संवैधानिक पीठों के फैसलों को नहीं माना, या तीन जजों वाले खंडपीठ में पूर्व वाले विचारों से अलग राय बन गई। इसका एक उदाहरण है, जिसमें भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापना कानून 2013 के अधिकार की धारा 24 शामिल थी। वकील इसकी कानूनी अनिश्चितता को लेकर चिंतित थे। अपने निजी और कारोबारी मामलों को सुलटाने वाले लोगों के मस्तिष्क में भी ऐसी अनिश्चितता रहती है, जबकि कानून उसकी व्याख्या और पुनर्व्याख्या अलग-अलग तरीके से करता है।

4- जब कार्यपालिका अपने विशुद्ध प्रशासनिक या नीतिगत फैसले पर बिना विधिशास्त्र आधारित समीक्षा चाहती है तो उसे अपने विधि अधिकारियों के जरिए कार्यपालिका को सुप्रीम कोर्ट का सामना करना चाहिए। अगर कार्यपालिका की नीतियां या फैसले गलत हैं, तो इसे सही करने की जगह संसद या विधायिका या मतदान केंद्र हैं।

5- सुप्रीम कोर्ट के जजों को सेवानिवृत्ति के बाद ईनाम देने की कार्यपालिका की प्रवृत्ति खत्म होनी चाहिए। सेवानिवृत्ति के बाद सुप्रीम कोर्ट के हर जज को ताउम्र उसका पूरा वेतन और भत्ते दिए जाने चाहिए, लेकिन वह कोई जिम्मा, पद या संवैधानिक दायित्व नहीं ले सकता। यह बहुत ही मामूली वित्तीय लागत है, जिसे देश खुशी-खुशी वहन करेगा, ताकि सुप्रीम कोर्ट की स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया जा सके।

आपको और सुधारों के बारे में सोचना चाहिए, क्योंकि हम सबको एक स्वतंत्र सुप्रीम कोर्ट की जरूरत है।

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