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दूसरी नजर: समावेशी बनें या न बनें

परिणाम पूर्व नतीजे इसके दो दिन बाद, 19 मई को आए और उनमें कम से कम दो पूरी तरह सटीक थे : भाजपा को 300 सीटें, सहयोगी दलों को मिला कर 350 और कांग्रेस को लगभग 50 सीटें।

Author May 26, 2019 5:04 AM
पी चिदंबरम और नरेंद्र मोदी।

इस महीने की 17 तारीख को मध्यप्रदेश के खरगौन में एक रैली को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा, कश्मीर से कन्याकुमारी तक, कच्छ से कामरूप तक, पूरा देश यह कह रहा है, ‘अब की बार 300 पार, फिर एक बार, मोदी सरकार’। उनका चुनाव विश्लेषण एकदम सटीक निकला, लेकिन भूगोल गलत। आखिरी नतीजे बताते हैं कि उनके चुनावी गणित को पूरे दस नंबर मिलने चाहिए। लिहाजा, मोदी, भाजपा, पार्टी के लाखों कार्यकर्ता और सहयोगी बधाई के पात्र हैं। अब जबकि वे दूसरा कार्यकाल शुरू करने जा रहे हैं, मेरी कामना है कि प्रधानमंत्री सफलता से जनता की सेवा में सरकार चलाएं। परिणाम पूर्व नतीजे इसके दो दिन बाद, 19 मई को आए और उनमें कम से कम दो पूरी तरह सटीक थे : भाजपा को 300 सीटें, सहयोगी दलों को मिला कर 350 और कांग्रेस को लगभग 50 सीटें। इन दो सर्वेक्षणों ने सांख्यिकीय नमूनों और चुनावी पूर्वानुमान में जनता के भरोसे को थोड़ा-बहुत बहाल किया।

प्रतिस्पर्धी दृष्टिकोण
एक और यात्रा आज शुरू हुई है। यह अनवरत यात्रा है। हर पांच वर्ष के अंतराल पर छोटा-सा विश्राम और यात्रा पुन: शुरू। भारत पर शासन करने के अधिकार को लेकर विभिन्न पार्टियों में मतभिन्नताएं रही हैं और आगे भी रहेंगी। ये मतभिन्नताएं किसी भी बहुदलीय लोकतंत्र की पहचान हैं, खासकर बहुलवादी और विविधतावादी जीवंत लोकतंत्र की। एक पार्टी, विविधताओं को स्वीकार करने से इनकार करने के बावजूद यदि राष्ट्रीय चुनावों में विजय प्राप्त करती है, तो इसका मतलब यह नहीं होता कि विविधताएं वास्तविक नहीं हैं। भारत के लिए भाजपा की दृष्टि है : एक देश, एक इतिहास, एक विरासत, एक नागरिक संहिता, एक राष्ट्रभाषा और ‘एकात्मता’ के विभिन्न अन्य आयाम। कांग्रेस का नजरिया अलग है : एक देश, इतिहास की विविध व्याख्याएं, विविध उप-इतिहास, विभिन्न संस्कृतियां, विभिन्न भाषाएं और विविधता के तमाम अन्य आयाम, जो एकता की आकांक्षा को पूरा करते हैं। क्षेत्रीय दलों का अपना दृष्टिकोण है : यद्यपि इनका नजरिया हर राज्य में अलग-अलग हो सकता है, लेकिन एक चीज उनके सभी राजनीतिक वक्तव्यों में समान दिखती है : राज्य के लोगों का इतिहास, भाषा और संस्कृति सर्वोच्च सम्मान की अधिकारी है और खासतौर से राज्य की भाषा को पुष्पित-पल्लवित करते हुए उसे प्रमुखता दी जाए।

भाषा की प्रासंगिकता
भाषा खासतौर से एक भावनात्मक मुद्दा है। संस्कृति, साहित्य, कला और लोगों के जीवन के प्रत्येक पहलू भाषा के इर्द-गिर्द ही घूमते रहते हैं। यह सिर्फ तमिल लोगों के बारे में नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों जो तेलुगु, मलयालम, कन्नड़, उड़िया, बांग्ला और जहां तक मैं समझता हूं, यह कोई भी प्राचीन भाषा बोलने वाले सभी लोगों के बारे में सच है। राजनीति में और खासकर राजनीतिक संवाद में भाषा की प्रासंगिकता को खारिज नहीं किया जा सकता। तमिल लोगों के बारे में थोड़ा ठीक-ठाक जानता हूं। भाषा उनकी सभ्यता और संस्कृति के मूल में है। तमिल बोलने वाले तमिझन की पहचान तमिल है। कर्णाटिक संगीत के तीन महान संगीतकार तमिलनाडु में जन्मे और उन्होंने अपनी रचनाएं संस्कृत और तेलुगु में लिखी। तमिल गौरव और उसके प्राधान्य की प्रतिष्ठा के लिए ही तमिल साई (संगीत) आंदोलन का जन्म हुआ। मंदिरों में अर्चनाएं संस्कृत में की जाती थीं और अब भी यह भाषा ज्यादातर मंदिरों के अर्चकों और श्रद्धालुुओं की पहली पसंद है; सरकार ने विकल्प के रूप में तमिल में अर्चना का प्रावधान किया और इन नीति को सभी लोगों ने स्वीकार किया। हिंदू धर्म, जिसे आज हम इस रूप में जानते हैं, वह शैव और वैष्णव था और तमिल इतिहास और धार्मिक साहित्य में इसे इसी रूप में दर्ज किया गया है। वस्तुत: तमिल क्लैसिक उत्कृष्ट साहित्य का एक उदाहरण होने के अलावा धर्म की भी धुरी थे। इसके अतिरिक्त तमिल साहित्य को समृद्ध करने में ईसाई और मुसलिम विद्वानों एवं लेखकों का भी महती योगदान है। यहां तमिलों और तमिल भाषा के बारे में मैंने जो कहा वह केरल, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल के लोगों और उनकी भाषाओं के बारे में भी उतना ही सत्य है। अपने किसी मित्र से पूछ लें। अब मुझे विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिस्पर्धी दृष्टिकोणों पर लौटने दें। 2019 चुनाव के नतीजों को यह नहीं माना जा सकता कि यह अन्य नजरियों पर एक निर्णायक विजय है। इससे भी ज्यादा सच यह है कि धर्म कभी भी भाषा और संस्कृति पर प्रभुत्व स्थापित नहीं कर सकता।

इक्कीसवीं सदी में धर्मनिरपेक्ष
धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा भारत में नहीं जन्मी। यह किसी भी आधुनिक लोकतंत्र और गणराज्य की कसौटी है और इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण यूरोपीय देश हैं। कोई यह नहीं कह सकता कि यूरोपीय देशों के लोग अधार्मिक हैं, लेकिन वे अपनी राजनीति और शासन प्रणाली में धर्मनिरपेक्षता के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ हैं। वास्तव में धर्मनिरपेक्षता का मूल अर्थ ही है, ‘धार्मिक और आध्यात्मिक मामलों से अलगाव’। कालांतर में, खासतौर से यूरोप में इसका अर्थ हो गया राज्य और चर्च के बीच अलगाव। आजकल, खासतौर से बहुलवादी और विविधतावादी समाजों में धर्मनिरपेक्ष का अर्थ हो गया है किसी भी तरह के अतिवाद से दूरी और समावेशी होना। यहां मेरी सारी दलीलों के मूल में यह है कि भारत- भारत सरकार और शासन प्रणाली के तमाम संस्थान- हमेशा और हर हाल में समावेशी बने रहें। हाल ही में संपन्न हुए चुनावों में क्या समावेशन के लिए कोई मुद्दा था? मुझे संशय है। कई खबरों के अनुसार भाजपा के 302 सांसदों में मुसलिम समुदाय से कोई सांसद नहीं होगा। दलित, आदिवासी, बंटाई पर खेती करने वाले और खेतिहर मजदूरों जैसे कई और भी तबके हैं, जिन्हें लगता है कि उन्हें उपेक्षित छोड़ दिया गया है। बहुत से ऐसे तबके हैं, जिन्हें जाति, गरीबी, अशिक्षा, बुढ़ापे, कम संख्या या सुदूर होने की वजह से वास्तव में विकास की प्रक्रिया से बाहर छोड़ दिया गया है। इस कारण से मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री को अपने पुराने नारे ‘सबका साथ, सबका विकास’ को एक बार फिर दोहराने की आवश्यकता है। मुझे डर है कि भाजपा यह चुनाव एक विलगाववादी एजंडे के साथ लड़ी। मुझे उम्मीद है कि शासन की प्रक्रिया समावेशी होगी।

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