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वक़्त की नब्ज़ : प्रशासनिक बदलाव की ज़रूरत

क्या नरेंद्र मोदी भूल गए हैं कि उनको पूर्ण बहुमत क्यों दिया था इस देश के मतदाताओं ने? क्या भूल गए हैं कि वे क्यों पहले प्रधानमंत्री बने तीस वर्ष बाद, जिनको ऐसा जनमत मिला?..
Author नई दिल्ली | September 6, 2015 09:28 am
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के न्यूयॉर्क के पैलेस होटल में ठहरने के दौरान कुल 6.13 करोड़ रुपए खर्च हुए। वहीं जर्मनी में होटल किराए पर लेने में 1.31 लाख रुपए प्रतिदिन के हिसाब से खर्च हुए।

क्या नरेंद्र मोदी भूल गए हैं कि उनको पूर्ण बहुमत क्यों दिया था इस देश के मतदाताओं ने? क्या भूल गए हैं कि वे क्यों पहले प्रधानमंत्री बने तीस वर्ष बाद, जिनको ऐसा जनमत मिला? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामने अपनी सरकार का हिसाब-किताब पेश करने के बदले अगर इस देश के आम आदमी के बीच थोड़ा घूमते प्रधानमंत्री, तो जान जाते शीघ्र ही कि जनता को अभी तक वह प्रशासनिक परिवर्तन नजर नहीं आ रहा है, जिसकी उम्मीद से उनको वोट मिला था। यह शायद उनको नहीं दिखता, जो लुटियन्स दिल्ली की शांत, स्वच्छ गलियों में महफूज हैं, लेकिन जब भी मैं लटयन्स दिल्ली की धोखेबाज सीमाओं के बाहर निकलती हूं इन दिनों, मुझे उस निराशा के आसार दिखते हैं, जो 2014 के आम चुनाव के पहले देश भर में दिखते थे।

इस हफ्ते श्रीनगर में हूं, सो यहां का हाल दर्शा कर शुरू करती हूं यह लेख। इत्तेफाक से पहुंची यहां, पिछले साल के खौफनाक बाढ़ की पहली सालगिरह पर। मौसम सुहाना है, झेलम का पानी शांत, चिनार के दरख्त हरे-भरे और शहर का माहौल बिल्कुल वैसा जैसे हुआ करता था दहशत और हिंसा शुरू होने से पहले। लेकिन जब मैंने लोगों से बात करनी शुरू की तो मालूम हुआ कि बाढ़ पीड़ितों को राहत के नाम पर अभी तक या तो मुआवजा मिला ही नहीं है या इतना थोड़ा मिला कि मजाक बन कर रह गया है।

कई लोगों ने शिकायत की कि जिस ‘पैकेज’ का प्रधानमंत्री ने बिहार को देने का एलान किया है, उसका आधा हिस्सा भी कश्मीर को मिलता तो राहत पूरी होती। थोड़ी और जानकारी लेने के बाद पता चला कि समस्या पैसों की नहीं, प्रशासनिक तरीकों में तब्दीली न आने की है। यानी राहत बांटने के काम में वही लापरवाही है, जो देश भर में सरकार के हर काम में दिखती है।

दशकों के कांग्रेस राज की पहचान बन चुकी थी यह लापरवाही और जनता को उम्मीद थी कि मोदी के आने से फौरन परिवर्तन आ जाएगा, क्योंकि सबने सुना था कि गुजरात में उन्होंने कमाल कर दिया था। ऐसा किया भी था, लेकिन शायद एक राज्य में प्रशासनिक परिवर्तन लाना आसान है और भारत जैसे विशाल देश में कठिन। कारण कोई भी हो, सरकारी कामकाज में परिवर्तन जब तक नहीं आएगा, तब तक विकास की गाड़ी वैसे ही चलेगी जैसे मोदी के आने से पहले चलती थी। धीरे, धीरे।

यहां आरएसएस के बड़े नेता प्रधानमंत्री की कोई मदद नहीं कर सकते हैं, सो उनके सामने अपना हिसाब-किताब पेश करना बेकार है। संघ के सदस्य जितने भी राष्ट्रवादी, जितने भी भारत माता को प्यार करने वाले हों, इनको जरा भी जानकारी नहीं है प्रशासनिक, आर्थिक और राजनीतिक सुधारों की। इन क्षेत्रों में जब तक सुधार नहीं आएंगे, मोदी सरकार की तमाम योजनाएं कामयाब नहीं हो पाएंगी। सुधार तभी ला पाएंगे प्रधानमंत्री, जब वे अपने इर्द-गिर्द इकट्ठा करेंगे ऐसे विशेषज्ञ, जो इन चीजों में अमल लाने के काबिल हों।

फिलहाल प्रधानमंत्री कार्यालय को चला रहे हैं वही भारत सरकार के आला अधिकारी, जिनको परिवर्तन शब्द सुनते ही डर लगने लगता है, क्योंकि इसका मतलब उनकी नजरों में सिर्फ यह है कि उनकी शक्ति, उनकी शान कम हो जाएगी। सो, एक तरफ प्रधानमंत्री दुनिया भर में कहते फिरते हैं कि भारत में ऐसा माहौल बनाना चाहते हैं, जिसमें निवेशकों के लिए लालफीताशाही नहीं लाल कालीन होगा, लेकिन दूसरी तरफ हैं ऐसे लोग भारत सरकार में, जो लाल कालीन बिछने नहीं दे रहे हैं।

मोदी के मंत्रियों से जब मैं पूछती हूं कि अर्थव्यवस्था में मंदी के आसार क्यों दिखने लगे हैं, तो अक्सर दो चीजें कहते हैं, ‘‘अरे भाई पिछली सरकार से हमको विरासत में कई ऐसे कानून मिले हैं, जो नुकसान पहुंचाते हैं अर्थव्यवस्था को और अब विपक्ष इनको बदलने नहीं दे रहा है।’’ या फिर वैश्विक आर्थिक मंदी का हवाला देते हैं। कभी स्वीकार नहीं करते ये महाशय कि असली समस्या सिर्फ यह है कि प्रशासनिक तरीकों में जो नयापन आना चाहिए था, जो परिवर्तन आना चाहिए था, वह अभी आया नहीं है।

श्रीनगर आने से पहले मैंने लद्दाख में कुछ दिन बिताए और लेह शहर का हाल देख कर गुस्सा आया। इसलिए कि मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने बार-बार टूरिज्म का जिक्र इस अंदाज से किया है कि गरीबी हटाने का यह बहुत अच्छा औजार बन सकता है। लद्दाख ऐसा शहर है, जिसमें टूरिज्म की इतनी संभावनाएं हैं कि किसी और देश में होता तो एक भी लद्दाखी गरीब नहीं होता।

वैसे भी दूर-दूर से पर्यटक आते हैं यहां पहाड़ों में ट्रैकिंग करने, हेम्मीस और अल्ची जैसे गोंपाओं को देखने, लेकिन कोई सौ गुना ज्यादा आते, अगर सरकार कुछ बुनियादी सुविधाएं यहां उपलब्ध कराती। मिसाल के तौर पर अगर लेह में इंटरनेट है तो नाम के वास्ते और सेलफोन सिग्नल भी इतनी बार गायब रहता है कि लद्दाख में पहुंचने के बाद ऐसा लगा मुझे कि बाकी दुनिया से नाता टूट ही गया है।

ऊपर से यह भी समस्या है कि लद्दाख तक पहुंचना इतना महंगा है कि भारतीय पर्यटकों के लिए भी बैंकाक जाना ज्यादा सस्ता लगता है। लेह दुनिया के सबसे सुंदर शहरों में गिना जा सकता है, लेकिन समस्या है उसकी गंदगी, उसकी टूटी सड़कें, उसके बेहाल बाजार। इनको देख कर विदेशी पर्यटक घबरा जाते हैं। स्वच्छ भारत आंदोलन इस शहर तक नहीं पहुंचा है बावजूद इसके कि यहां से सांसद भारतीय जनता पार्टी का है।

सो प्रधानमंत्रीजी, विनम्रता से अनुरोध है आपसे कि आप अपने कार्यालय में ऐसे लोग जल्दी ही इकट्ठा करें, जो आपके अपने हों। न संघ के कार्यकर्ता हों, न भारत सरकार के अधिकारी। ऐसे लोगों को ढूंढ़िए, जो प्रशासनिक सुधार लाने में माहिर हों।

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